अबोहर की आभा नगरी की पहचान पंजपीर की मजार

अबोहर के आभा नगरी होने की यदि कोई पहचान बाकी है तो वह है पंजपीर की मजार।

JagranFri, 30 Jul 2021 10:00 AM (IST)
अबोहर की आभा नगरी की पहचान पंजपीर की मजार

राज नरूला, अबोहर : अबोहर के आभा नगरी होने की यदि कोई पहचान बाकी है तो वह है पंजपीर की मजार। हिदू-मुस्लिम आस्था के प्रतीक पांच पीरों की इस मजार के अस्तित्व की कहानी जितनी प्राचीन है उतनी दिलचस्प भी। पांच पीरों की मजार पर हर वर्ष 15 सावन अर्थात 30 जुलाई को भारी मेला लगता है, लेकिन कोरोना के कारण इस बार यह मेला बिलकुल सादगी पूर्ण लगाया जाएगा।

पांच पीरों के इतिहास के अनुसार स्थानीय धर्म नगरी मेएक बहुत बड़ा टीला हुआ करता था, जो आज थेह के नाम से जाना जाता है। कभी यह राजा बाबा चंदनी का महल था, जो आबू नगरी व आभा नगरी कहलाता था। जन श्रुति अनुसार सूर्यवंशी राजा बाबा चंदनी के बाद राजा हरीचंद ने राज-पाठ संभाला, राजा हरीचंद की केवल एक बेटी ही थी। आखिरी समय में राजा को कोढ़ हो गया। शाही हकीमों के इलाज भी बेअसर हुए। किसी ने राजा को सलाह दी कि मुलतान (पाकिस्तान) के पांच पीरों के घोड़ों के खून से इस बीमारी का इलाज संभव है। शहजादी को जब इस बात का पता चला तो वह राजस्थान के सूरतगढ़ के ठाकुर की मदद से पांच पीरों के पास गई, मांगने पर घोड़े न देने पर वह छल से उनके घोडे़ यहां ले आई। इससे राजा का कोढ़ तो ठीक हो गया, लेकिन कुछ अरसे बाद उसकी मौत हो गई। ठाकुर शहजादी से विवाह करके आबू नगरी में रहने लगा। पांच पीरों ने बार-बार घोड़े लौटाने का संदेश भिजवाया, लेकिन ठाकुर व शहजादी ने घोड़े नहीं लौटाए। इस पर पांच-पीर अपनी पत्नियों को उनके पीछे ना आने की नसीहत देकर स्वयं घोड़े लेने आबू नगरी आ पहुंचे और टीले पर डेरा डाल दिया। काफी समय बाद भी जब पीर वापस मुल्तान नहीं पहुंचे तो उनकी पत्नियां उन्हे ढूंढते-ढूंढते आबू नगरी आ पहुंची। पंजपीरों ने जब अपनी पत्नियों को देखा तो वह गुस्से से बेकाबू हो गए और उन्हे श्राप देकर भस्म कर दिया। उधर, शहजादी द्वारा घोड़े न लौटाने कि जिद से गुस्साए पंजपीरों ने आबू नगरी को नष्ट होने का श्राप दे दिया, लेकिन उसका कोई असर न हुआ, जब पांच पीरों ने अपनी दिव्य ²ष्टि से देखा तो उन्हें पता चला कि उनका मामा अलीबख्श अपनी अदृश्य शक्ति से आबू नगरी को बचा रहा है। इस पर उक्त पीरों ने अपने मामा को धिक्कारा तो वह नगर छोड़ कर चला गया। उसके जाते ही आबू नगरी राख हो गई। महल व घर खंडहर में तबदील हो गए। तब से पंजपीरों व उनकी पत्नियों की मजारें यहां पर लोगों की श्रद्धा का केंद्र है। हर वर्ष लगने वाले मेले में यहां हजारों श्रद्धालु आकर शीश नवा कर मन्नतें मांगते है।

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पंजपीरों की दरगाह पर आज सादगी पूर्ण मनाया जाएगा मेला

दरगाह के सेवादार ओम प्रकाश का कहना है कि इस बार भी कोरोना के कारण मेला सादगी पूर्ण ढंग से मनाया जाएगा। उन्होंने संगत से अपील की है कि वह कम से कम संख्या में आएं क्योंकि दरबार रोजाना खुलता है व ज्यादा भीड़ न करें। उन्होंने दुकानदारों से अपील की है कि वह स्टाले वगैरह लगाने से गुरेज करें व उन्होंने श्रद्धालुओं से अनुरोध किया है कि वह रास्तों में लंगर वगैरह लगाने से परहेज करें।

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