वीरचक्र विजेता रिटायर्ड कर्नल पंजाब सिंह का निधन, भारत-पाक युद्ध में दिखाया था शौर्य और पराक्रम

वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान अपने शौर्य और पराक्रम से वीर चक्र हासिल करने वाले रिटायर्ड कर्नल पंजाब सिंह का निधन हो गया है। वह कोरोना से संक्रमित हुए थी। हालांकि अब ठीक थे पर कोरोना के प्रभावों के कारण वह अस्वस्थ थे।

Kamlesh BhattTue, 25 May 2021 08:11 PM (IST)
कर्नल पंजाब सिंह को अंतिम श्रद्धांजलि देते सैन्य अधिकारी व कर्नल पंजाब सिंह की फाइल फोटो। जागरण

चंडीगढ़ [विकास शर्मा]। भारत-पाक युद्ध 1971 में अपनी वीरता को लोहा मनवाने वाले वीर चक्र विजेता रिटायर्ड कर्नल पंजाब सिंह (79) का निधन हो गया। सेक्टर-25 के श्मशानघाट में सैन्य सम्मान के साथ रिटायर्ड कर्नल पंजाब सिंह का अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे, स्टेशन कमांडर कर्नल पुष्पेंद्र सिंह समेत कई अन्य सैन्य अधिकारी व पूर्व सैन्य अधिकारी मौजूद रहे और उन्हें श्रद्धांजलि दी।

पंजाब सिंह कुछ दिन पहले कोरोना पॉजिटिव हुए थे, इसके बाद चंडीमंदिर सिंह कमांड अस्पताल में इलाज के बाद वह पूरी स्तर स्वस्थ होकर घर वापस लौटे थे, लेकिन कोरोना होने के बाद होने वाले प्रभावों के चलते उनका देहांत हो गया। इतना ही 21 मई को उनके बड़े बेटे अनिल कुमार की भी कोरोना से मौत हो गई थी।

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कर्नल पंजाब सिंह को वीर चक्र से सम्मानित करते तत्कालीन राष्ट्रपति। फाइल फोटो

कर्नल पंजाब सिंह ने कमिशन पास कर वर्ष 1967 में 6 सिख बटालियन ज्वाइन की थी। उन्होंने इस बटालियन को 12 अक्टूबर 1986 से 29 जुलाई 1990 तक कमांड किया। हिमाचल प्रदेश के रहने वाले कर्नल पंजाब सिंह सेना से रिटायर होने के बाद राज्य सैनिक वेलफेयर बोर्ड के डायरेक्टर रहे। इसके अलावा वह हिमाचल प्रदेश दक्षिणी एरिया के इंडियन सर्विस लीग के वाइस प्रेसिडेंट भी थे।

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अपने शौर्य के लिए हमेशा याद किए जाते रहेंगे पंजाब सिंह

भारत-पाक युद्ध 1971 में आपरेशन कैक्टस लिली के दौरान रिटायर्ड कर्नल पंजाब सिंह पुंछ में तैनात थे, भारत में घुसने के लिए यह प्वाइंट्स बेहद महत्वपूर्ण था, लेकिन इसके बावजूद पंजाब सिंह दीवार की तरह डटे रहे, 6 सिख बटालियन के आधे से ज्यादा सैनिक शहीद हो गए। उनका असला भी खत्म हो गया था। पाकिस्तानी सेना ने 72 घंटों में नौ बार हमला किया, लेकिन उन्होंने पाकिस्तानी सेना को इसमें कामयाबी हासिल नहीं होने दी। इस आपरेशन के तहत उन्होंने पुंछ की चोटियों पर 13 किलोमीटर का एरिया कब्जा किया। इसी बहादुरी और साहस के लिए उन्हें वीरचक्र से नवाजा गया था।

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