PGI चंडीगढ़ के डॉक्टरों की स्टडी, Pancreatitis के इलाज में अब सर्जरी की नहीं पड़ेगी जरूरत

पीजीआइ चंडीगढ़ के सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के हेड प्रोफेसर डॉ राजेश गुप्ता ने स्टडी के बारे में बताया कि स्ट्रेप्टोकिनेज का उपयोग 1960 के दशक के शुरुआत में पल्मोनरी थ्रोम्बोम्बोलिज़्म मायोकार्डियल इंफार्क्शन और डीप वेन थ्रॉम्बोसिस में इंट्रा-वास्कुलर थ्रॉम्बोसिस के विघटन के लिए किया जाता था।

Ankesh ThakurMon, 21 Jun 2021 12:55 PM (IST)
पीजीआइ डॉ. सुरेंद्र राणा और डॉ राजेश गुप्ता ने यह स्टडी की है।

चंडीगढ़, [विशाल पाठक]। पीजीआइ चंडीगढ़ के सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग ने गंभीर तीव्र अग्नाशयशोथ की खतरनाक बीमारी के प्रबंधन में स्ट्रेप्टोकिनेज की भूमिका पर नई स्टडी की है। देश भर में पीजीआइ पहला चिकित्सा संस्थान है, जिसने यह स्टडी की है। स्ट्रेप्टोकिनेज एक ऐसी दवा है जिसका इस्तेमाल रक्त वाहिकाओं में बनने वाले हानिकारक रक्त के थक्कों को तोड़ने के लिए किया जाता है। यह ऐसे रोगियों के इलाज के लिए उपयोग किया जाता है, जो हाल ही में हार्ट अटैक से पीड़ित हुए हैं।

पीजीआइ चंडीगढ़ के सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के हेड प्रोफेसर डॉ राजेश गुप्ता ने स्टडी के बारे में बताया कि स्ट्रेप्टोकिनेज का उपयोग 1960 के दशक के शुरुआत में पल्मोनरी थ्रोम्बोम्बोलिज़्म, मायोकार्डियल इंफार्क्शन और डीप वेन थ्रॉम्बोसिस में इंट्रा-वास्कुलर थ्रॉम्बोसिस के विघटन के लिए किया जाता था। सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग ने मेडिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के साथ मिलकर वर्ष 2013 में स्ट्रेप्टोकिनेस का ऑफ-लेबल उपयोग शुरू किया। गंभीर तीव्र अग्नाशयशोथ के रोगियों में स्ट्रेप्टोकिनेज का उपयोग करने का विचार तब आया जब पल्मोनोलॉजिस्ट द्वारा छाती में इसके सफल उपयोग को देखा।

वर्ष 2013 में पहली बार की गई थी स्टडी

डॉ. राजेश गुप्ता ने बताया पहली बार वर्ष 2013 में प्रायोगिक कार्य किया था, ताकि सर्जरी के समय हटाए गए अग्नाशयी परिगलन पर स्ट्रेप्टोकिनेज के प्रभाव को देखा जा सके। इसके परिणाम उस समय बेहतर आए। इसने दो रोगियों में स्ट्रेप्टोकिनेज का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जो गंभीर थे और सर्जरी के लिए उपयुक्त नहीं थे। स्टडी में पाया गया कि पेट की नली में तरल पदार्थ में स्ट्रेप्टोकिनेज मिलाने से उनकी नैदानिक स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ और दोनों मरीज बिना सर्जरी के ठीक हो गए। इस स्टडी को वर्ष 2014 में अग्नाशय की बीमारी के एक शीर्ष पत्रिका में प्रकाशित किया था, जिसका नाम पैनक्रिएटोटोलॉजी है। वर्ष 2015 में पहले अध्ययन की योजना बनाई और बाद में मेडिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और रेडियोलॉजी के सहयोग से सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी में दो एम सीएच थीसिस सहित तीन और अध्ययन किए।

पीजीआइ के इन डॉक्टरों की स्टडी में रही अहम भूमिका

इस स्टडी में प्रोफेसर सुरिंदर राणा, प्रोफेसर मनदीप कांग, डॉ उज्ज्वल गोरसी, प्रोफेसर रिताम्ब्रा नाडा और अध्ययन में शामिल सभी सीनियर और जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर की टीम की अहम भूमिका रही। डॉ राजेश गुप्ता ने बताया कि स्ट्रेप्टोकिनेस के उपयोग से सर्जरी की जरूरत कमी आई थी। इस स्टडी में 100 से अधिक रोगियों को शामिल किया गया था। ये सभी मरीजों में प्रभावशाली साबित हुआ।

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