चंडीगढ़ की रहनुमा का टैंलेट, दोनों हाथ नहीं, पैरों से बनाती हैं पेंटिंग, घर की माली हालत खराब, बनना चाहती हैं आर्टिस्ट

रहनुमा आर्टिस्ट बनना चाहती है लेकिन घर के माली हालत ठीक नहीं है। ऐसे में घर के हालात उसके सपने में रोड़ा बन रहे हैं। रहनुमा के पिता मजदूरी करते हैं। परिवार में मां और दो भाई भी हैं। पिता की मजदूरी से पूरा घर चल रहा है।

Ankesh ThakurMon, 27 Sep 2021 01:27 PM (IST)
रहनुमा सेक्टर-10 स्थित गवर्नमेंट आर्ट्स कालेज में बीए सेकंड इयर की छात्रा है।

वैभव शर्मा, चंडीगढ़। जिनके हौसले बुलंद हो और उनके दिल में कुछ कर गुजरने की लालसा हो तो फिर कोई भी राह मुश्किल नहीं होती। भगवान भी उनका साथ देते हैं जो हिम्मत नहीं हारते। ऐसा ही एक उदाहरण चंडीगढ़ के  मौलीजागरां में रहने वाली रहनुमा रानी पेश कर रही हैं। रहनुमा के दोनों हाथ नहीं हैं लेकिन उनकी कला ही उनकी पहचान बन चुकी है। रहनुमा सेक्टर-10 स्थित गवर्नमेंट आर्ट्स कालेज में बीए सेकंड इयर की छात्रा है और वह कॉलेज के बेहतरीन आर्टिस्टों में से एक है। जो काम आम इंसान हाथों से सही ढंग से नहीं कर पाते वह काम रहनुमा अपने पैरों से करती हैं। पैरों से ही रहनुमा काम के साथ बेहतरीन पेंटिंग, स्कैच भी बनाती हैं।

रहनुमा आर्टिस्ट बनना चाहती है लेकिन घर के माली हालत ठीक नहीं है। ऐसे में घर के हालात उसके सपने में रोड़ा बन रहे हैं। रहनुमा के पिता मजदूरी करते हैं। परिवार में मां और दो भाई भी हैं। पिता की मजदूरी से पूरा घर चल रहा है। हालांकि घर के हालात ठीक नहीं होने के चलते दोनों भाइयों ने पढ़ाई छोड़ दी है और घर का खर्च चलाने के लिए काम करना शुरू कर दिया है। घर की समस्याओं को लेकर रहनुमा का हौसला कई बार डगमगाया लेकिन उसने हार नहीं मानी। 

बचपन से ही हाथों के बिना कर रही काम

 

रहनुमा के दोनों हाथ बचपन से ही नहीं थे, बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने पैरों से ही वह सभी काम किए जो हाथों से किए जाते हैं। रहनुमा ने बताया कि जब वह छोटी थी तो आस पड़ोस वाले उनकी मां को ताना मारते थे कि वह अपनी दिव्यांग बेटी को क्यों पढ़ा रही हैं। इसके हाथ नहीं है तो कैसे पढ़ेगी लेकिन पड़ोसियों के इन तानों को दरकिनार करते हुए मांं ने कभी रहनुमा की पढ़ाई से नहीं रोका और हमेशा से ही उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रही।

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ड्राइंग टीचर को देखकर सीखा पेंटिंग और स्कैच बनाना

 

रहनुमा ने कहा कि जब वह आठवीं क्लास में थी तो उनकी ड्राइंग की टीचर पूनम रानी को देखकर वह इन सबके प्रति आकर्षित हुई। धीरे धीरे कर पेंटिंग करना, स्कैच बनाने के साथ ही सभी प्रकार की ड्राइंग आइट्म को बनाने में रुचि बढ़ने लग गई। वहीं ड्राइंग टीचर पूनम ने भी उन्हें बहुत सहयोग दिया और उनको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रही।

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पिता अस्पताल में थे भर्ती, लंगर से खाया खाना

 

एक समय ऐसा भी आ गया था जब रहनुमा के पिता बीमार पड़ गए और अस्पताल में भर्ती हो थे। इस दौरान घर में खाना भी नहीं था, तो मां ने लंगर से खाना लाकर खिलाया। बावजूद रहनुमा ने अपनी हिम्मत नहीं हारी। अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह मेहनत करती रही। 

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