Punjab Congress: लोकलुभावन फैसलों से छवि सुधारने की कवायद; बेअदबी, अवैध खनन, बिजली समझौतों पर अब भी सवाल कायम

Punjab Politics अचानक नेताओं में यह जनता प्रेम और सब धर्म स्थलों के प्रति आस्था कैसे जागृत हो गई जनता सब जानती है। यह भी जानती है कि असल मुद्दों को कालीन के नीचे दफना कर सियासी कदमताल हो रहा है।

Sanjay PokhriyalWed, 27 Oct 2021 09:27 AM (IST)
चरणजीत सिंह चन्नी (बाएं) की सरकार के प्रति आक्रामक हैं नवजोत सिंह सिद्धू।फाइल

चंडीगढ़, विजय गुप्ता। पंजाब में मुख्यमंत्री बदले एक माह हो गया है, लेकिन सत्तारूढ़ कांग्रेस में करीब छह माह से चले आ रहे नाटक का अंत नहीं हो रहा और न ही हो रही है राज्य के असल मुद्दों को हल करने की शुरुआत। पंजाब में अनुसूचित जाति का पहला मुख्यमंत्री बनने के बाद चरणजीत सिंह चन्नी ने इस बात पर पूरा ध्यान दिया है कि लोग उन्हें आम आदमी का मुख्यमंत्री मानें।

‘आम आदमी की सरकार’ ने पिछले एक माह में जो लोकलुभावन फैसले किए हैं उनमें दो किलोवाट तक खपत के बिजली बिल माफ करना, पेयजल के बकाया बिल माफ करना, 125 गज तक के मकानों में रहने वालों को मुफ्त पानी देना, लाल लकीर के भीतर मकान बनाने वालों को उनका मालिकाना हक देना प्रमुख हैं। इनसे बड़ी आबादी लाभान्वित होगी, लेकिन इनमें वे 18 मुद्दे नहीं हैं, जो कांग्रेस हाईकमान ने विधायकों से फीडबैक के बाद सूचीबद्ध करके कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार को काम करने के लिए दिए थे। यहां तक कि बेअदबी जैसे मामले को लेकर भी कुछ खास नहीं हुआ। हालांकि मुख्यमंत्री बनते ही चन्नी ने इस मामले में शीघ्र न्याय दिलाने का वादा किया था।

कांग्रेस हाईकमान ने संगठन और सरकार का चेहरा तो बदल दिया, लेकिन असल मुद्दों पर स्थिति कमोबेश वैसी ही रही। प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू की यह प्रतिक्रिया भी कुछ ऐसा ही रेखांकित करती है कि राज्य के असल मुद्दों पर काम नहीं हो रहा। यानी उनकी नजर में नए मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का एक माह का प्रदर्शन भी अपेक्षानुरूप नहीं है। अपने 13 सूत्रीय एजेंडे के साथ वे आक्रामक हैं, सरकार और हाईकमान को आगाह कर रहे हैं। सिद्धू की ही तरह आनंदपुर साहिब से सांसद और कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता मनीष तिवारी भी हाईकमान से लेकर प्रदेश कांग्रेस तक को सरकार के कामकाज पर आईना दिखाते हुए मुद्दों पर आने की बात कर रहे हैं।

सवाल यही है कि बेअदबी और उसके उपरांत हुई पुलिस फायरिंग के मामले में न्याय दिलाने, नशे तथा अवैध खनन पर लगाम लगाने के लिए ठोस कदम उठाने और निजी कंपनियों से हुए बिजली समझौतों को रद करने जैसे मुद्दे अब गौण क्यों हो गए? इसलिए, क्योंकि जिस समय सरकार को इन पर एक-एक करके निर्णय लेने चाहिए उस समय अनेक मंत्रियों का जोर कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मोर्चेबंदी पर है। उप मुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा ने ट्वीट करके इस मामले को तूल दिया कि पाकिस्तानी महिला पत्रकार और कैप्टन की दोस्त अरूसा आलम के पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के साथ कथित संबंधों की जांच होनी चाहिए। जो नाम अभी तक राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में प्रतिबंधित सा था, अब कैप्टन अमरिंदर सिंह खुद उसके बारे में खुलकर बात कर रहे हैं। उसके फोटो सोनिया गांधी और अन्य कई लोगों के साथ ट्विटर पर डाल जवाब दे रहे हैं कि देख लें किस-किस से संबंध रहे हैं।

अरूसा के अलावा एक मसला सीमा सुरक्षा बल की जांच का दायरा बढ़ाने का भी उठा है। हालांकि यह स्पष्ट हो चुका है कि इससे पंजाब पुलिस के अधिकारों या अधिकार क्षेत्र में कोई कमी नहीं आने वाली, बल्कि इससे दोनों बल बेहतर समन्वय के साथ तस्करी और घुसपैठ को रोक सकेंगे, लेकिन इस पर भी राजनीति हो रही है।

पंजाब के असल मुद्दे इसी सब में दब से गए हैं और सवाल उठने लगे है। नेता निरुत्तर हैं। उप मुख्यमंत्री ओपी सोनी से जब सवाल किया गया कि बेअदबी के मामले में सरकार क्या कर रही है तो उनका जवाब था कि कानून अपना काम करेगा। जब पूछा गया कि कानून तो कैप्टन अमरिंदर सिंह के समय में भी अपना काम कर रहा था तो वे कुछ न कह सके। तीखे सवाल विधायकों से भी जनता करने लगी है। पठानकोट जिले के सुजानपुर विधानसभा क्षेत्र में एक किशोर ने विधायक से पूछ लिया कि ‘तू की कीता’ तो विधायक ने उसे थप्पड़ मार दिया। फाजिल्का जिले के बल्लुआना विधानसभा क्षेत्र में विधायक के लिए लोगों ने गेट बंद कर दिए और कहा कि पौने पांच साल तो उन्हें देखा नहीं।

तीन माह बाद होने वाली परीक्षा पहाड़ जैसी दिखाई दे रही है तो ऐसी घटनाओं से सबक लेकर कई नेता जनता के करीब होने का अहसास करा रहे हैं। नेताओं में आम आदमी जैसा दिखने की होड़ लगी है। चन्नी युवाओं के साथ डांस करने लगते हैं तो सफर के बीच में गाड़ी रोककर लोगों से मिल रहे हैं। अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल लोगों के बीच जाकर चाट-पकौड़ी खा रहे हैं तो सांसद हरसिमरत कौर बादल जालंधर, लुधियाना जाकर महिलाओं के साथ चूड़ियां खरीद रही हैं। अब जनता के सुख-दुख में नेताओं के शामिल होने का दौर आ गया है। नेता सर्वधर्म सद्भावना का संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं। हिंदुओं, सिखों, दलितों के आस्था के केंद्रों में आवाजाही बढ़ गई है। [वरिष्ठ समाचार संपादक, पंजाब]

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