बिजली समझौतों पर‍ सियासत के होंगे गंभीर साइड इफेक्‍ट, पंजाब को भारी पड़ सकता है बिजली कंपनियों से Agreement रद करना

Punjab Power Agreements पंजाब में अगले साल हाेने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर खूब राजनीति हो रही है। इसके दबाव में कैप्‍टन सरकार भी दिखती है। सीएम कैप्‍टन अमरिंदर सिंह तलवंडी साबो थर्मल प्‍लांट का समझौता रद करना पंजाब को भारी पड़ सकता है।

Sunil Kumar JhaSun, 01 Aug 2021 12:53 PM (IST)
पंजाब को बिजली कंपनियों से समझौतों को रद करना भारी पड़ सकता है। (फाइल फोटो)

चंडीगढ़, [इन्द्रप्रीत सिंह]। पंजाब में निजी कंपनियों से बिजली समझौतों को लेकर खूब सियासत हो रही है। 2022 में हाेेनेवाले पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस सहित सभी दल निजी कंपनियों से हुए समझौतों पर सवाल उठाते हुए इन्‍हें रद करने की मांग कर रहे हैं। पंजाब कांग्रेस के अध्‍यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू भी इस मामले को उठाते रहे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 1920 मेगावाट के तलवंडी साबो थर्मल प्लांट से किए गए समझौते को रद करने के आदेश दे दिए। इसके अलावा सोलर, कोजेनरेशन आदि के लिए 122 बिजली के समझौतों की भी समीक्षा करने को कहा गया है। इस तरह का कदम पंजाब को काफी भारी पड़ सकता है और इससे राज्‍य में निवेश पर असर पड़ सकता है।

तलवंडी साबो प्‍लांट का समझौता रद करने के आदेश से इन्‍वेस्‍ट पंजाब के अधिकारी आहत

'इन्वेस्ट पंजाब' (Invest Punjab) के अधिकारी इस फैसले से काफी आहत हैं। उन्हें हैरानी है कि कुछ ही समय पहले खुद मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ऐलान किया था कि बिजली प्लांटों के साथ किए गए समझौते रद नहीं किए जाएंगे क्योंकि इससे निवेश पर असर पड़ता है और बड़ी कंपनियों का पंजाब पर विश्वास डगमगाता है।

जिस तरह से विपक्षी पार्टियों के साथ-साथ कांग्रेस की अपनी पार्टी के नेताओं ने बिजली समझौते रद करने को लेकर सरकार पर दबाव बनाया हुआ है उसमें मुख्यमंत्री ने इन समझौतों को रद करके फरवरी महीने में बनने वाली नई सरकार के पाले में गेंद सरका दी है। चूंकि अब बरसातें अच्छी होने के कारण बिजली की मांग में कमी आ गई है और यह सरकार अपने स्रोतों से पूरी करती रहेगी। सर्दियों में भी कोई समस्या नहीं आएगी लेकिन मार्च महीने में नई सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी।

इससे पहले किसान आंदोलन के कारण पंजाब में निवेश को गहरी चोट लगी है। इन्वेस्ट पंजाब के एक सीनियर अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि निवेशकों को प्रदेश में निवेश करने के लिए मनाना कितना मुश्किल होता है यह हम ही जानते हैं। अगर लुधियाना में लगने वाले बिरला ग्रुप के पेंट के कारखाने और राजपुरा में

सीमेंट के प्लांट को छोड़ दिया जाए तो कोई भी बड़ा प्लांट नहीं आया है।

पंजाब की इंडस्ट्री पहले से ही आतंकवाद और पहाड़ी राज्यों को दिए गए टैक्स हॉलीडे के कारण बहुत पिछड़ गई है। आतंकवाद प्रभावित राज्‍य का टैग अभी भी पंजाब के माथे से उतर नहीं पाया है। इसलिए ऑटोमोबाइल का कोई भी बड़ा ग्रुप राज्य में नहीं आया है। चाहे बात टाटा नैनो की हो या वोक्सवैगन की, दोनों ग्रुुप अपने प्लांट यहां स्थापित करने के इच्छुक थे लेकिन बात सिरे नहीं चढ़ी।

आतंकवाद अभी खत्म ही हुआ था कि 2002 में वाजपेयी सरकार ने पहाड़ी राज्यों में उद्योग लगाने वालों को कर रियायतें का ऐलान करके रही सही कसर भी पूरी कर दी। पंजाब से बहुत से यूनिटों ने राज्य में विस्तार न करके हिमाचल प्रदेश के बद्दी , नालागढ़ आदि में निवेश किया। 2016 में ये रियायतें खत्म हुईं और राज्य में निवेश की संभावनाएं बढ़ ही रही थीं कि पहले किसान आंदोलन और अब बिजली के समझौतों को रद करने से बिजली की कमी से से उभरी निवेश को प्रभावित कर सकती है।  पहले ही राज्य की इंडस्ट्री शिफ्ट कर गई है, लेकिन अब बिजली की कमी और समझौते रद करने जैसे कदम पंजाब के लिए घातक हो सकते हैं।

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