पटियाला की डा. रवनीत कौर जज से करती थी प्यार, बाद में करवा दी हत्या, पैरोल पर हाई कोर्ट ने की महत्वपूर्ण टिप्पणी

जज हत्याकांड में सजा काट रही डा. रवनीत कौर की याचिका पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पैरोल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कहा कि यह सुधारवादी सिद्धांत का हिस्सा है जरूरी नहीं कि सभी कैदियों को यह विशेषाधिकार दिया जाए।

Kamlesh BhattFri, 25 Jun 2021 07:10 AM (IST)
हत्या मामले में सजा काट रही महिला की पैरोल पर हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी। सांकेतिक फोटो

दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पैरोल किसी कैदी का अधिकार नहीं है, पैरोल सजा के सुधारवादी सिद्धांत का एक हिस्सा है और यह आवश्यक नहीं है कि सभी दोषियों को यह विशेषाधिकार दिया जाना चाहिए। हाई कोर्ट का मानना है कि एक कैदी अपने निहित अधिकारों के रूप में विशेषाधिकार या छूट और पैरोल का दावा नहीं कर सकता है।

हाई कोर्ट ने कहा कि अधिकारों को दो श्रेणियों के तहत वर्गीकृत किया जाता है, संविधान के तहत मौलिक अधिकार या कानून द्वारा प्रदत्त संवैधानिक अधिकार। दूसरी ओर, कुछ शर्तों के तहत राज्य द्वारा एक विशेषाधिकार दिया जाता है और राज्य द्वारा वापस लिया जा सकता है। विशेषाधिकार कुछ विशिष्ट आधारों पर दिया जा सकता है। पैरोल सजा के सुधारवादी सिद्धांत का एक हिस्सा है। यह आवश्यक नहीं है कि सभी दोषियों को यह विशेषाधिकार प्राप्त हो। इन लाभों से इन्कार किया जा सकता है, यदि इनकार उचित कारण पर आधारित है। हाई कोर्ट ने कहा कि इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं हो सकता।

हाई कोर्ट के जस्टिस अरुण खेत्रपाल व जस्टिस अर्चना पुरी की खंडपीठ ने ये आदेश 2005 में अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश विजय सिंह की सनसनीखेज हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रही डॉ. रवदीप कौर द्वारा दायर पैरोल याचिका को खारिज करते जारी किया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपित की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए पैराल नहीं दी जा सकती। वह पहले भी पैरोल लेकर भाग गई थी और देश से भागने का प्रयास करते हुए नेपाल की सीमा से गिरफ्तार की गई थी।

पीठ ने कहा कि पैरोल दिए जाने पर वह देश से भाग सकती है। अपनी याचिका में डॉ. रवदीप कौर ने छह सप्ताह की अवधि के लिए पैरोल पर रिहा करने और जिला मजिस्ट्रेट, पटियाला द्वारा पैरोल के लिए उसके मामले को खारिज करने के 3 सितंबर, 2020 के आदेश को रद करने की मांग की थी। वह वर्तमान में सेंट्रल जेल, पटियाला में आजीवन कारावास की सजा काट रही है।

डॉ. रवदीप कौर के वकील ने तर्क दिया कि पटियाला के जिला मजिस्ट्रेट ने पैरोल देने के उसके अनुरोध को गलत तरीके से अस्वीकार कर दिया है। वास्तव में, इसे पंजाब गुड कंडक्ट प्रिज़नर्स (अस्थायी रिहाई) अधिनियम, 1962 की धारा 6 के तहत उल्लिखित आधार पर ही अधिकारियों द्वारा अस्वीकार किया जा सकता है, जब उसकी रिहाई से राज्य सरकार की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव को खतरा होने की संभावना है, जबकि उसकी रिहाई से ऐसा कोई खतरा नहीं है।

मामले की सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि उसे पहले 6 दिसंबर, 2014 को दो सप्ताह की आपातकालीन पैरोल पर रिहा किया गया था और 21 दिसंबर 2014 को आत्मसमर्पण करने वाली थी, लेकिन उसने पैरोल की रियायत का दुरुपयोग किया। 4 फरवरी 2015 नेपाल सीमा से कुछ नकली दस्तावेजों के साथ गिरफ्तार किया गया।

13 अक्टूबर 2005 को चंडीगढ़ श्रम न्यायालय में पीठासीन अधिकारी के रूप में कार्यरत अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश विजय सिंह की हत्या ग्रंथी मंजीत सिंह ने कर दी थी। उन्हें रवदीप कौर ने 5 लाख रुपये का भुगतान किया था। पटियाला में नर्सिंग होम चलाने वाली रवदीप जज से प्यार करती थी और उनसे शादी करना चाहती थी। विजय सिंह पहले से शादीशुदा थे और उनकी तीन बेटियां हैं। बाद में 30 मार्च 2012 को चंडीगढ़ की एक अदालत ने डॉ. रवदीप कौर और मंजीत सिंह दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

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