New Agriculture Bill 2020: कृषि मूल्य प्राधिकरण के गठन पर हो विचार, पढ़े एक्सपर्ट की राय

खाद्य उत्पादों के वर्गीकरण पर जोर। फाइल

Kisan Andolan मान लीजिए कि केंद्र सरकार ऐसा कर देती है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर कोई ट्रेडिंग नहीं करेगा। तब भी इस बात की गारंटी कौन लेगा कि मंडियों में आई हुई फसल कौन खरीदेगा।

Sanjay PokhriyalWed, 21 Apr 2021 10:24 AM (IST)

चंडीगढ़, इन्द्रप्रीत सिंह। तीन कृषि सुधार कानूनों को लेकर देशभर में किसानों को उनकी फसल की उचित कीमत, खरीद और सब्सिडी आदि को लेकर बड़ी बहस छिड़ी हुई है। दिल्ली की सीमाओं पर धरने-प्रदर्शन जारी हैं। अखबारों, इलेक्ट्रॉनिक व इंटरनेट मीडिया पर भी लोग अपनी अपनी समझ के मुताबिक राय दे रहे हैं। यह अच्छा है कि तीन कृषि कानूनों के बहाने भारत जैसे कृषि प्रधान देश में इस विषय पर बहस छिड़ी हुई है।

पिछले दिनों भारतीय किसान संघ ने भी इसी तरह का एक प्रयास किया जिसमें विभिन्न राज्यों के कृषि नीति से संबंधित माहिरों को बुलाकर उन्होंने फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए कैसी नीति सरकार निर्धारित करे, इस पर चर्चा करवाई। एक बात पर लगभग सभी माहिर सहमत थे कि किसानों की आय को बढ़ाया जाए, मगर कैसे? इस पर सभी के विचार अलग अलग थे। कोई ठोस चीज सामने नहीं आ सकी। ज्यादातर माहिरों का यह विचार था कि केंद्र सरकार एक कानून लाकर 23 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करे और इसे कानूनी मान्यता दी जाए। यानी चाहे सरकार खरीद करे या प्राइवेट सेक्टर, कोई भी न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर खरीद न करे।

यह विचार सुनने में जितना अच्छा लगता है, व्यावहारिक रूप से उतना अच्छा है नहीं। मान लीजिए कि केंद्र सरकार ऐसा कर देती है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर कोई ट्रेडिंग नहीं करेगा। तब इस बात की गारंटी कौन लेगा कि मंडियों में आई हुई फसल कौन खरीदेगा। यानी अगर प्राइवेट सेक्टर मंडियों में आई फसल की खरीद नहीं करता तो क्या सरकार इसकी खरीद करेगी। अगर सरकार खरीद नहीं करेगी तो फसलों का क्या होगा। अगर खरीद कर लेती है तो उसका करेगी क्या? क्या सभी अनाज को सार्वजनिक वितरण प्रणाली में देने की व्यवस्था केंद्र करेगी।

ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब स्पष्ट नहीं हो पाया है। लिहाजा इस तरह की कोई नीति बनाने से पहले केंद्र सरकार को राज्यों को भरोसे में लेकर पूरे देश में 23 फसलों की मांग का ब्यौरा एकत्रित करना होगा। इस मांग के अनुसार ही फसलों के वर्गीकरण करने की जरूरत होगी। इसके दो तरीके हो सकते हैं। पहला, जिस राज्य में जिस चीज की पैदावार अच्छी हो सकती है, उस राज्य में उसी की खेती पर जोर दिया जाए। संबंधित राज्य की सरप्लस फसल को उन राज्यों में भेजा जाए जहां इनकी खेती कम होती है। दूसरा, सभी राज्य अपनी अपनी जरूरत के अनुसार हर फसल पैदा करने की कोशिश करें।

अगर हर राज्य को पता होगा कि उसकी अपनी अनाज, तिलहन और दलहन आदि की जरूरत कितनी है तो उतनी फसल को अपने राज्य में पैदा करने का प्रयास करेगा। इससे एक या दो फसलों पर निर्भरता कम होगी। उदाहरण के तौर पर पंजाब में तिलहन की जितनी जरूरत है उसके लिए दो लाख हेक्टेयर जमीन की जरूरत है। जबकि हाल ही में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने विधानसभा में जो आंकड़ा दिया है उसमें कहा गया है कि पंजाब में तिलहन केवल 2,690 हेक्टेयर में लगाया जा रहा है। यानी पंजाब अपनी शेष जरूरत को या तो दूसरे राज्यों या देशों से लाकर पूरा करता है। लगभग यही हाल दालों का भी है। यह केवल पंजाब का उदाहरण नहीं है। अन्य राज्यों में भी ऐसा ही हो रहा है।

कहा जा रहा है कि भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया, जबकि हकीकत यह है कि न तो हम दलहन पर आत्मनिर्भर हैं और न ही तिलहन पर। लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये की ये दोनों खाद्य वस्तुएं हम विदेशों से आयात कर रहे हैं। केवल धान और गेहूं पर न्यूनतम समर्थन मूल्य व खरीद की गारंटी देने के चलते देश में खाद्य वस्तुओं का असंतुलन हो गया है। गेहूं और चावल आज हमारे पास जरूरत से ज्यादा हो गए हैं तो दलहन और तिलहन के लिए हम आज भी विदेश पर निर्भर हैं। इससे हमारी विदेशी मुद्रा का नुकसान हो रहा है।

अगर हमने सभी राज्यों की जरूरत के मुताबिक दालों और तिलहन का भी वर्गीकरण किया होता तो आज यह समस्या नहीं होती। सवाल सिर्फ किसानों को एक निश्चित आय प्रति एकड़ से मिलने का है। यह कैसे होगा। इसके लिए एग्रीकल्चर प्राइस अथॉरिटी यानी कृषि मूल्य प्राधिकरण बनाने की आवश्यकता है। इस प्राधिकरण को भी उसी तरह की शक्तियां देने की जरूरत है जैसी कई अन्य प्राधिकरण को मिली हुई है। हर राज्य में नोडल विभाग हों, जो मंडी में अगर प्राइवेट सेक्टर संबंधित कीमत पर फसल की खरीद नहीं करता तो सरकार का वह विभाग यह खरीद करे। खरीदी हुई फसल को अपने सरकारी स्कूलों के मिड डे मील प्रोग्राम, जेल, पुलिस, सेना, आंगनबाड़ी आदि के लिए उपलब्ध करवाए। कर्नाटक सरकार ने इसका सफल प्रयोग किया है। इसमें केंद्र सरकार भी राज्यों की वित्तीय मदद कर सकती है। इससे जहां किसानों को उनकी फसल की उचित कीमत मिल सकेगी, वहीं मांग के अनुसार फसलें पैदा होने से कीमतें भी नहीं गिरेंगी।

[स्टेट ब्यूरो प्रमुख, पंजाब]

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