राजनीतिक संरक्षण में अवैध निर्माण, मंत्री आशु सहित 19 अफसरों की मिलीभगत

चंडीगढ़ [अमित शर्मा]। स्थानीय निकाय मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा अवैध निर्माण और सीएलयू (Change of land use) के मामले में करवाई जांच में एक कैबिनेट मंत्री और तीन सीनियर IAS अफसरों के अलावा 16 अफसरों की शमूलियत सामने आई है। स्थानीय निकाय विभाग के विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार जांच रिपोर्ट में जहां कैबिनेट मंत्री भारत भूषण आशु, पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार रहे कंवलजीत सिंह कड़वल द्वारा बिल्डर और अधिकारियों को 'राजनीतिक संरक्षण' देने और 'मिलीभगत' करने की बात सामने आई है वहीं IAS अफसरों को सरकार से तथ्यों को छिपाकर गलत ढंग से साइट का नक्शा पास करवाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे सरकारी राजस्व को भारी चपत लगी है। लुधियाना में गिल रोड पर विवादित ग्रैंड मैनर होम्स के मामले में मिली शिकायतों के बाद सिद्धू ने 13 जुलाई 2018 को विभाग के चीफ विजिलेंस अफसर (CVO) को जांच के आदेश दिए थे। इसके साथ ही जांच कम से कम DSP स्तर के अफसर से करवाने को कहा था।

जांच के बाद सोमवार को मंत्री सिद्धू को सौंपी गई गोपनीय रिपोर्ट में कहा गया है कि तीन IAS अफसर करणेश शर्मा (डायरेक्टर स्थानीय निकाय विभाग), कंवलप्रीत कौर बराड़ (नगर निगम कमिश्नर) और जसकरण सिंह (पूर्व नगर निगम कमिश्नर) ने साल भर चले अवैध निर्माण और सीएलयू लेने के लिए हुए पूरे फर्जीवाड़े से नजरें फेर रखी थीं। साथ ही प्रोजेक्ट के सीएलयू को लेकर मंत्री सिद्धू को गलत जानकारी देकर सरकार से सीएलयू पर अनुमति दिलवाई गई।

इस मामले में जिन अन्य 16 अफसरोंं को दोषी पाया गया, उसमें राजस्व विभाग, जिला प्रशासन और नगर निगम के उच्च अफसरों समेत विवादित टाउन प्लानर एसएस बिंद्रा शामिल हैं। बिंद्रा के घर पर पिछले दिनों आयकर टीम भी दबिश दे चुकी है और उसे इस पूरे प्रकरण का मास्टरमाइंड बताया गया है। रिपोर्ट में बिंद्रा के खिलाफ अलग से जांच करवाने की सिफारिश करते हुए जांच अधिकारी ने करीब एक दर्जन प्राइम प्रापर्टी का जिक्र किया है, जिनका निर्माण अवैध तरीके से करवाने के पीछे कथित तौर पर बिंद्रा का हाथ रहा है। इन प्रापर्टी के साक्ष्य को दबाकर उन्होंने सीएलयू की सरकारी अनुमति के लिए सिफारिश की।

ऐसे हुआ फ्राड

रिपोर्ट में कहा गया कि ग्रैंड मैनर होम्स की जमीन की रजिस्ट्री भी फ्राड थी। यह बात डीसी द्वारा अपने स्तर पर करवाई गई जांच में भी सामने आ चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार 17 जनवरी 2018 को उक्त जमीन की सीएलयू के लिए आवेदन किया गया। आवेदन में जमीन की रजिस्ट्री लगाना अनिवार्य होता है लेकिन सीएलयू के आवेदन की फाइल प्रोसेसिंग के साथ रजिस्ट्री नहीं लगाई गई।

आवेदन 17 जनवरी को किया गया और जबकि जमीन की रजिस्ट्री दो दिन बाद 19 जनवरी को हुई। मामले में शोर पडऩे के बाद आनन फानन में पहला पन्ना फाड़कर उसमें नया पन्ना जोड़ दिया गया, लेकिन आवेदन के दस्तावेज पुराने ही लगाए गए। जो फाइल पास हुई उसमें सीएलयू के रेवेन्यू रिकार्ड और रजिस्ट्री का रेवेन्यू रिकार्ड आपस में में मेल नहीं खाते। वहीं नक्शा भी गलत तथ्य पेश कर पास करवाया गया।

ईडब्ल्यूएस की राशि में लाखों की चपत

सरकारी शर्तों के अनुसार किसी भी हाउसिंग प्रोजेक्ट के साथ या तो ईडब्ल्यूएस (इकनामिकली वीकर सेक्शन) के लिए फ्लैट बनाने होते हैं या फिर उसकी बनती राशि नगर निगम को जमा करवानी होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस केस में ईडब्ल्यूएस फीस 80 लाख रुपये बनती है, जिसमें से कंपनी ने 25 लाख रुपये जमा करवाने का दावा किया, लेकिन जांच के दौरान न तो निगम अधिकारी और न ही डेवलपर कंपनी कोई रसीद, चेक व अकाउंट नंबर पेश कर सकी, जिसमें उक्त राशि जमा करवाई गई हो।

वहीं इस प्रोजेक्ट को लेकर शेष 55 लाख रुपये के ऐवज में 600 गज जमीन नगर निमग के नाम कर दी गई। मजेदार बात यह है कि रजिस्ट्री में दर्ज सरकारी दर के अनुसार इस जमीन की कीमत मात्र 5 लाख रुपये होती है, जबकि 55 लाख रुपये के बदले 8000 गज जमीन निगम के नाम की जानी चाहिए थी। इस तरह 50 लाख रुपये की चपत लगा दी गई।

रिपोर्ट में FIR दर्ज करने की सिफारिश

रिपोर्ट में जहां संबंधित लोगों के खिलाफ आइपीसी की विभिन्न धाराओं  (420, 465, 467, 468, 471  120 बी) के तहत एफआइआर दर्ज करने की सिफारिश की गई है। वहीं, मंत्री सिद्धू को उपरोक्त प्रोजेक्ट के सीएलयू, रजिस्ट्री और साइट प्लान नक्शा रद्द करने का प्रस्ताव भी दिया गया है।

जांच रिपोर्ट में मंत्री और अफसरों के कार्यों पर यह की गई टिप्पणी

सियासी दखल से सरकारी खजाने को चपत

रिपोर्ट में कैबिनेट मंत्री भारत भूषण आशु और कांग्रेसी नेता कंवलजीत सिंह कड़वल का नाम लेते हुए कहा गया कि इस सारे प्रकरण को अंजाम देने वाले लोगों को इनकी पूरी 'शह प्राप्त' थी। इसी सियासी दखल के चलते समय समय पर जांच को रोकने और प्रभावित करने का प्रयास भी किया गया। रिपोर्ट के अनुसार सारा स्कैम राजनीतिक 'मिलीभगत' से हुआ।

करणेश शर्मा ने जानते हुए भी आंखें मूंदी

सीएलयू फाइल पर सरकार द्वारा अनुमति देने से पहले डायरेक्टर स्थानीय निकाय विभाग को तमाम बिंदुओं की जांच करनी होती है। इसके अलावा कोई भी तथ्य गलत या गैरकानूनी होते हैं तो उस फाइल को रिजेक्ट कर दिया जाता है। रिपोर्ट में कहा गया कि स्थानीय निकाय विभाग के डायरेक्टर करणेश शर्मा ने मामला प्रकाश में आने के बावजूद बिना किसी वेरिफिकेशन और जांच किए फाइल को पास कर दिया। इतना ही नहीं, सबकुछ जानते हुए सभी तथ्यों से आंखें फेर इस मामले में मंत्री सिद्धू को भी गलत जानकारी देकर साइट प्लान का नक्शा पास करवाया गया।

सफाई में बोले करणेश-    सीएलयू देना नगर निगम का काम है। जहां तक मंत्री को मिस लीड करने की बात कह रहे हैं, ऐसा मैंने कुछ नहीं किया। मैंने अभी रिपोर्ट देखी नहीं है। रिपोर्ट देखने के बाद ही कुछ कह पाऊंगा।

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कंवलप्रीत कौर बराड़ ने निर्देश के बावजूद नहीं लगाई अवैध निर्माण पर रोक

रिपोर्ट में कहा गया है कि मंत्री के आदेशों को नजरंदाज किया गया। सिद्धू द्वारा जांच के आदेश देने के साथ ही रिपोर्ट आने तक निर्माण कार्य पर रोक लगाए जाने के स्पष्ट निर्देश थे। लेकिन इसके बावजूद अवैध निर्माण लगातार जारी रहा। शुरुआती दौर में अवैध ढंग से हो रहे निर्माण रुकवाने के लिए फोर्स और निगम दस्ता भी भेजा गया, लेकिन बिना एक्शन लिए फोर्स और निगम अधिकारियों को नगर निगम की कमिश्नर कंवलप्रीत कौर बराड़ के निर्देश पर वापस बुलवा लिया गया। इसके बाद लगातार निर्माण जारी रहा। जांच अधिकारी ने कई बार कमिश्नर को इसकी जानकारी दी और मंत्री के आदेशों को पालन करवाने का आग्रह किया। परंतु आग्रह पर कार्रवाई करने के बजाय कमिश्नर ने उक्त अधिकारी को दो टूक शब्दों में आइंदा से ऐसे पत्र लिखने से गुरेज करने को कहा।

कंवलप्रीत कौर की सफाई-   यह मामला मेरे आने से पहले का है। विभाग के आदेश पर इनके निर्माण में बरती जा रही अनियमितताओं की जांच असिस्टेंट कमिश्नर कुलप्रीत सिंह ने की है और इसमें कुछ अधिकारियों की जिम्मेदारी फिक्स की गई। रिपोर्ट विभाग को भेज दी गई। इधर डीएसपी की तरफ से भी बार बार जानकारी मांगी जा रही थी तो उन्हें मैंने जवाब दिया था कि हम जांच करके विभाग को भेज चुके हैं। उन्होंने रिपोर्ट में क्या लिखा है मुझे पता नहीं।

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जसकरण सिंह ने अनियमितताएं नजरअंदाज की

रिपोर्ट में कहा गया कि नगर निगम के पूर्व कमिश्नर जसकरण सिंह ने मामले की तमाम अनियमितताओं को नजरअंदाज कर हर स्तर पर अनुमति प्रदान कर दी। फाइल के तथ्यों पर न तो कभी कोई सवाल किया और न ही कभी किसी कागजात की तस्दीक या वेरिफिकेशन करवाई। ईडब्ल्यूएस की राशि में 50 लाख की चपत भी सीधे सीधे उनकी नाक तले लगी।

सफाई में बोले जसकरण-   मैंने रिपोर्ट नहीं देखी है। जब रिपोर्ट पढूंगा तो ही इस बारे में कुछ कह सकूंगा।

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मेरा इस से कुछ लेना देना नहींः आशु

कैबिनेट मंत्री भारत भूषण आशु का कहना है कि मेरा इस केस से कुछ लेना देना नहीं है। मैं इस जांच रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता सिवाय इसके कि कोई भी निष्कर्ष निकालने से पहले जांच अधिकारी की क्रेडिबिलिटी और कैरियर रिकॉर्ड पर एक नजर जरूर डालनी चाहिए। बाकी मैं मंत्री नवजोत सिंह सिधू पर छोड़ता हूं कि उन्हें जिसका भी रोल गलत लगे उस पर खुल कर एक्शन लें।

यह सब राजनीति से प्रेरितः कड़वल

वरिष्ठ कांग्रेस नेता कंवलजीत सिंह कड़वल का कहना है कि मैं इस जांच रिपोर्ट को सिरे से खारिज करता हूं। यह सब राजनीति से प्रेरित है। सारे नियमों के तहत अनुमति लेकर ही प्रोजेक्ट चलाया गया है। कहीं भी राजनीतिक रसूख इस्तेमाल नहीं हुआ है।

जांच अधिकारी बोले- धमकियों पर डीजीपी से अलग से बात करूंगा

जांच अधिकारी बलविंदर सिंह सेखों का कहना है कि मैं इसके बारे में मीडिया प्लेटफार्म पर नहीं बात करूंगा क्योंकि जांच मुझे मंत्रालय ने सौंपी थी मीडिया ने नहीं। जहां तक सियासी दखलंदाजी और धमकियों की बात है मैं उस बारे में डीजीपी को अलग से अवगत करा चुका हूं।

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अब आगे क्या..

अवैध निर्माण को लेकर नवजोत सिंह सिद्धू का रवैया हमेशा से ही सख्त रहा है। जालंधर में तो सिद्धू को अपनी पार्टी के विधायकों के विरोध का सामना करना पड़ा था, क्योंकि अब यह मामला भी उनकी अपनी ही पार्टी के नेताओं से संबंधित है तो देखना होगा कि सिद्धू इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हैैं या कुछ और एक्शन लेते हैैं।

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