..दिन का गुरूर टूट गया, शाम हो गई

जागरण संवाददाता, चंडीगढ़ : दिन का गुरूर टूट गया, शाम हो गई...ये कहते हुए जैसे शाम रुक सी गई। रुकना लाजिमी भी था..क्योंकि मंच पर थे उस्ताद शायर हसन कमाल। ये कमाल शायरी का भी रहा और कुछ उनके नाम का भी। मंगलवार को टैगोर थिएटर-18 में आयोजित मुशायरे में हसन कमाल और राहत इंदौरी उस्ताद शायर के रूप में शामिल हुए। उन्हें सुनने के लिए शहरभर के शायरी प्रेमी एकजुट हुए। इस दौरान हसन से खास बातचीत भी हुई। समाज से साहित्य का गायब होना खतरा है

पंजाब से जुड़ी याद पर हसन बोले कि कई बार आया हूं। पटियाला में तो कई मुशायरे किए। दरअसल मेरा शायर बनना भी अजीब कहानी है। लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद शायरी शुरू हुई। फिर ये आशिकी मुंबई ले आई। एक अखबार में सब एडिटर बन गया। 1965 का दौर था, वहीं, 1973 में एडीटर बन गया। 89 तक यही किया। उन दिनों फिल्मों के गीत काफी साहित्यिक होते थे। ऐसे में कवि प्रदीप, राजन कृष्ण, साहिर लुधियानवी, मेहंदी अली खान जैसे लोगों से रूबरू हुआ। फिल्म से जुड़ना भी ऐसे ही हुआ। 1967 में ख्वाजा अहमद अब्बास फिल्म बना रहे थे। उसमें साहिर लुधियानवी गीत लिख रहे थे, मगर डेट्स के चलते ऐसा मुनासिब न हो पाया। अब्बास ने मुझे याद किया, और यूं शुरुआत हुई फिल्मी दुनिया में आने की। सबसे बड़ी उपलब्धि 1982 में बीआर चोपड़ा से मिलकर हुई, निकाह फिल्म मेरी आज भी फेवरेट है, जिसे मैंने लिखा और गीत भी। दिल की ये आरजू थी, दिल के अरमान आसुंओं में बह गए..जैसे गीत गाए। फिल्म भी कामयाब हुई। मगर उन दिनों साहित्य इतना महत्व रखता था, अब तो सब गायब लगता है। मैंने युवाओं के लिए भी लिखा, जिसमें तोसे नैना लागे पिया सांवरे..नहीं बस में अब ये जिया सांवरे.. लिखा। पहले डायलॉग भी लिखे होते थे, तो उसमें भी साहित्य होता था, अब ये गायब है। मलाला पर लिखी कविता

अपनी ताजा कविता पर बात करते हुए हसन ने कहा कि एक कविता अब के हालात पर लिखी है। ये मलाला पर आधारित है, जिसे पाकिस्तान में सुधार कार्य की वजह से गोली खानी पड़ी। इसका शीर्षक रखा मलाला का उजाला, जिसको कुछ यूं लिखा..

तेरे हाथ में जो किताब थी, वही उनके सर पर अजाब थी।

वही हर सितम का सबब भी थी, वही हर सितम का जवाब थी। मेरे लिए ¨हदी सिनेमा दम तोड़ चुका है.. राहत इंदौरी

वो दिन अब कहां, जब फिल्मों में शायरी का महत्व था। अब तो बस, कुछ भी लिख लो और उसके इर्द गिर्द संगीत बजा दो, बस हो गया गाना तैयार। हमारे जमाने में दृश्य की मांग, उसके बाद उसमें शब्द भरे जाते थे। शायर राहत इंदौरी से फिल्मी गीतों पर बात हुई, तो उन्होंने इसपर कुछ यूं प्रतिक्रिया दी। मुशायरे में पहुंचे तो बोले, कि पहले इतने मुशायरे होते थे, कि फुरसत नहीं मिलती थी। अब तो इक्का-दुक्का जहां हो और जहां कद्रदान हो वहीं जाना होता है। हो सकता है, नई लहर हो, मगर उस लहर में भाषा की इज्जत तो हो। कुछ निर्देशक हैं, जो मुझे आज भी संपर्क करते हैं, विधु विनोद चोपड़ा और ऐसे ही कई निर्देशक, जिनके साथ काम कर लेता हूं, मगर बाकियों के साथ नहीं कर पाता। इन दिनों एक और चीज मकबूल हुई, वो है लेखकों की आवाज। लेखक धर्म के नाम पर हो रही राजनीति पर सवाल उठा रहे हैं, लिख रहे हैं, ये अच्छा है और जरूरी भी। आखिर शायरी का मतलब सिर्फ लफ्फाजी नहीं होता।

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