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योगी आदित्यनाथ की टिप्पणी के बाद चर्चा में आया पंजाब का नवसृजित जिला मलेरकोटला, जानें क्या है राजनीति और इसका इतिहास

पंजाब के नवसृजित जिले पर राजनीति और इसका इतिहास। सांकेतिक फोटो

ईद के मौके पर मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मलेरकोटला को पंजाब का 23वां जिला घोषित किया। वही इस पर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने सवाल उठाया। आइए जानतें है क्या है इसके पीछे की राजनीति और मलेरकोटला का इतिहास।

Kamlesh BhattSun, 16 May 2021 03:49 PM (IST)

चंडीगढ़ [कैलाश नाथ]। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ईद वाले दिन मलेरकोटला को राज्य का 23वां जिला घोषित किया। मुख्यमंत्री की इस घोषणा ने सभी को आश्चर्य में डाल दिया। दरअसल, मलेरकोटला को जिला बनाने की मांग यदाकदा कांग्रेस के नेताओं द्वारा ही उठाई जाती थी। लोगों द्वारा यह मांग कभी भी जोर-शोर से नहीं उठाई गई।

ईद वाले दिन की गई इस घोषणा पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सवाल खड़े कर दिए। वहीं, अकाली दल ने जिला बनाए जाने का विरोध तो नहीं किया है, लेकिन उनका कहना है कि मुख्यमंत्री ने तकनीकि रूप से फ्राड किया है, क्योंकि इस समय जनगणना हो रही है। जनगणना के दौरान किसी राज्य व जिले की सीमा में कोई परिवार्तन नहीं किया जा सकता है। अतः मुख्यमंत्री की यह घोषणा केवल लोगों को धोखा देने के लिए की गई है। वहीं, पंजाब भाजपा प्रधान अश्विनी शर्मा ने भी धर्म के आधार पर मलेरकोटला को जिला बनाने की निंदा की है। शर्मा ने कहाकि कैप्टन ने पंजाब को पहले ही कंगाल कर दिया है और ऐसे में नया जिला बनाने से प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर 1000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पंजाब का खजाना कैसे सहन करेगा?

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मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह खुद भी कह चुके हैं कि जनगणना का काम निपटने के बाद गांवों को मलेरकोटला जिले के अधिकार क्षेत्र में लाने की प्रक्रिया शुरू होगी। वहीं, मलेरकोटला पंजाब का सबसे छोटा जिला भी बन सकता है, क्योंकि इस जिले के तहत दो ही विधानसभा क्षेत्र होंगे। मलेरकोटला और अमरगढ़। मुख्यमंत्री की इस घोषणा का भले ही खुलकर विरोध नहीं हो रहा हो, लेकिन मुख्यमंत्री के इस फैसले को ठीक भी नहीं ठहराया जा रहा है, क्योंकि मलेरकोटला से संगरूर की दूरी मात्र 30 किलोमीटर के करीब है।

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जमीनी स्तर पर कभी भी इसे जिला बनाने की प्रचंड मांग नहीं रही है। मलेरकोटला को जिला बनाने की मांग 2002 में शुरू हुई थी। यह मांग भी कांग्रेस से ही उठी थी। वहीं, मुख्यमंत्री के इस फैसले को लेकर मुस्लिम तुष्टीकरण के भी आरोप लगने लगे हैं। योगी आदित्यनाथ ने तो साफ कहा कि मलेरकोटला का गठन किया जाना कांग्रेस की विभाजनकारी नीति का परिचायक है। मत और मजहब के आधार पर किसी प्रकार का विभेद संविधान की मूल भावना के विपरीत है।

राजनीतिक कारण भी है जिला बनाने के पीछे

संगरूर जिले को 15 वर्षों में दो बार छोटा किया गया। 2006 में संगरूर से बरनाला जिला निकला। बरनाला में 3 विधान सभा सीटें है। उसके बाद अब 2021 में मलेरकोटला बनाया गया। जहां पर 2 विधान सभा सीटें होंगी। मलेरकोटला पंजाब का एक मात्र ऐसा क्षेत्र है जो कि मुस्लिम बाहुल क्षेत्र है। संगरूर जिले में दो मंत्री है। संगरूर से विजय इंदर सिंगला जो कि शिक्षा मंत्री हैं और मलेरकोटला से रजिया सुल्ताना। रजिया सुल्ताना ट्रांसपोर्ट मंत्री हैं।

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संगरूर में विजय इंदर सिंगला हमेशा ही हावी रहे। जिले में सिंगला की पकड़ ज्यादा थी। इस कारण रजिया सुल्ताना और अमरगढ़ से सुरजीत धीमान कभी भी सहज नहीं हो पाए। इसे लेकर खींचतान चलती ही रहती थी। वहीं, कांग्रेस सरकार अप्रैल तक 2022 को लेकर काफी सहज थी। सामने विपक्ष के कमजोर होने के कारण माना जा रहा था कि 2022 में कांग्रेस को कोई चुनौती नहीं मिलने वाली है। क्योंकि कृषि कानून को लेकर किसान अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी से नाराज है।

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वहीं, बेअदबी कांड को लेकर शिरोमणि अकाली दल हाशिये पर ही थी। लेकिन बेअदबी कांड को लेकर बनाई गई एसआइटी की रिपोर्ट को हाईकोर्ट द्वारा खारिज किए जाने के बाद कांग्रेस सरकार न सिर्फ बवंडर में फंस गई है। इससे अकाली दल को आक्सीजन मिल गई है। कांग्रेस को पता है कि चुनाव के अंतिम वर्ष में वह शायद उस उंचाई को फिर न पाए जो उसे 2017 में मिली थी। इसे देखते हुए मुख्यमंत्री ने मुस्लिम वोटबैंक पर दांव खेला है। भले ही मलेरकोटला मुस्लिम बहुल हो, लेकिन राज्य के अन्य विधान सभा में छोटे-छोटे पाकेट में मुस्लिम की ठीक-ठीक जनसंख्या में है।

अकाली दल को है आशंका

अकाली दल के प्रवक्ता व पूर्व कैबिनेट मंत्री डा. दलजीत सिंह चीमा ने मुख्यमंत्री के इस फैसले पर आशंका व्यक्त की है। उन्होंने कहा, जनगणना के दौरान जिलों की सीमाएं नहीं बदली जा सकती है। कोविड के कारण किसी को नहीं पता कि जनगणना का काम कब मुकम्मल होगा, जबकि अगले साल चुनाव है। मई का महीना बीत रहा है। ऐसे में यह घोषणा केवल राजनीतिक बनकर न रह जाए। वहीं, अमरगढ़ से पूर्व अकाली विधायक व जिला प्रधान इकबाल सिंह झूंदा का कहना है, मुख्यमंत्री जिला बनाए, लेकिन इसकी सीमाओं को बढ़ाना पड़ेगा, क्योंकि इसमें केवल दो ही विधानसभा सीटें है। अतः अन्य जिलों काट कर मलेरकोटला की सीमाएं बड़ी करनी चाहिए।

क्या है मलेरकोटला का इतिहास

अफगानिस्तान से शेख सदरूदीन-ए-जहां द्वारा 1454 में की स्थापना की गई थी। इसके बाद बायजीद खान द्वारा 1657 में मलेरकोटला स्टेट की स्थापना की गई। बाद में पटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन (पैपसू) का सृजन करने के लिए मलेरकोटला का विलय पास की रियासतों के साथ कर दिया गया। 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के मौके पर पुराने मलेरकोटला स्टेट का क्षेत्र पंजाब का हिस्सा बन गया।

सरहिंद के शासक वजीर ख़ान द्वारा छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह जी को 9 साल की उम्र में और बाबा फतेह सिंह जी को 7 साल की उम्र में अत्याचार कहर ढाते हुए जीवित ही नींवों में चिनवा की अमानवीय घटना के खि़लाफ़ आवाज़ उठाई थी। इसके बाद गुरु गोबिंद सिंह जी ने नवाब शेर मोहम्मद ख़ान और मलेरकोटला के लोगों को आशीर्वाद दिया था कि यह शहर शांति और खुशी से रहेगा। इस शहर पर सूफ़ी संत बाबा हैदर शेख की भी कृपा है, जिनकी यहां दरगाह भी बनी हुई है।

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