जीवन में वाणी ध्वनि का अपूर्व योगदान: डा. राजेंद्र मुनि

जैन सभा के प्रवचन हाल में डा. राजेंद्र मुनि ने भक्ति का महत्व प्रतिपादित करते हुए भक्ति को साधना का सर्वोत्तम मार्ग बतलाया।

JagranMon, 20 Sep 2021 10:09 PM (IST)
जीवन में वाणी ध्वनि का अपूर्व योगदान: डा. राजेंद्र मुनि

संस, बठिडा: जैन सभा के प्रवचन हाल में डा. राजेंद्र मुनि ने भक्ति का महत्व प्रतिपादित करते हुए भक्ति को साधना का सर्वोत्तम मार्ग बतलाया।

उंन्होंने कहा कि भक्ति से हमारे मन, वचन और काया के रसायनों में परिवर्तन होता है। इससे मानसिक, शारीरिक व्याधीयां भी समाप्त हो जाती हैं। आधुनिक विज्ञानिकों ने भी इस बात को स्वीकार किया है। महावीर ने इसे भाव औषध रूप में स्वीकारा है। जब संपूर्ण प्रकार की औषधियां भी कार्य नहीं कर पातीं तब मन के परिणाम भाव लाभ देते हैं। अस्वस्थ को स्वस्थ बना देते हैं। शत्रु के प्रति मित्रता के भाव जागृत होते हैं। परिणामत शत्रु मित्र बन जाते हैं। जैसे कोई व्यक्ति निबू या इमली का नाम मात्र स्मरण करता है तो उसके मुंह में खट्टा-सा स्वाद उस पदार्थ का आना प्रारंभ हो जाता है। यद्यपि हमने उस पदार्थ को ग्रहण नहीं किया है। इसी प्रकार परमात्मा का स्मरण करते ही स्वाद रूप शुद्ध भावनाएं मन में प्रारंभ हो जाती हैं। शब्दों की ध्वनि में जबरदस्त ऊर्जा रहती है, जिसका तत्काल असर प्रारंभ हो जाता है। हमारे जीवन भर के सारे संबंध इसी वाणी के बल बुते पर चल रहे हैं। आवश्यकता है इस वाणी का हमेशा विवेकपूर्वक इस्तेमाल करने की।

सभा मेँ साहित्यकार सुरेन्द्र मुनि द्वारा आदिनाथ भगवान भक्ति स्वरूप भक्तामर का मंगलगान गाया गया आचार्य मानतुंग जी ने इसमें अनेकानेक मंत्र यंत्र तंत्र सूचक शब्द व ध्वनि का प्रयोग किया है। महामंत्री उमेश जैन द्वारा सूचनाएं व ार्दिक स्वागत किया गया। क्रोध, मान, माया व लोभ आत्मा के शत्रु : साध्वी शुभिता जैन स्थानक में विराजमान जैन भारती सुशील कुमारी महाराज की सुशिष्या शुभिता महाराज ने कहा कि हमारी आत्मा को अनंत जन्मों से चार रोगों ने घेर रखा है। क्रोध, मान, माया व लोभ यह चारों आत्मा के घोर शत्रु हैं। यदि इनमें से एक भी उभर जाए तो बाकी तीनों अपने आप ही आ जाते हैं। जैसे क्रोध क्यों आता है उसका कारण है अभिमान। जब-जब अभिमान को ठेस पहुंचती है तो क्रोध अपने आप ही जागृत होता है। अभिमानी व्यक्ति के लक्ष्ण बताते हुए साध्वी ने कहा कि अभिमान के कारण व्यक्ति कभी ज्ञान का सम्मान नहीं करता है। ज्ञान को पाने के बाद भी जो सहज रहता है वही ज्ञानी, ज्ञान का सम्मान करता है। अगर व्यक्ति मन, वचन, कार्य की शक्तियों का सदुपयोग करे तो अपना जीवन सार्थक बना सकता है।

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