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सरकार ने माना- राजपूत नहीं, बिंझवार आदिवासियों के गौरव हैं शहीद वीर नारायण सिंह

अनिल मिश्रा, रायपुर। छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद वीर नारायण सिंह को राजपूत बताने का विवाद गहराने के बाद अब राज्य के शिक्षा मंत्री इस मामले में आगे आए हैं। सोमवार को उन्होंने एक सर्कुलर जारी करते हुए शिक्षा विभाग के अधिकारियों को निर्देशित किया कि उपरोक्त पाठ्य पुस्तक में शहीद वीर नारायण सिंह बिंझवार राजपूत की जगह उनका नाम शहीद वीर नारायण सिंह बिंझवार गोंड पढ़ा जाए। साथ ही शिक्षा मंत्री ने कहा कि यह पाठ्य पुस्तक पुरानी और त्रुटिपूर्ण है। इसे पाठ्य सामग्री से जल्द हटा लिया जाएगा। इसके स्थान पर शहीद वीर नारायण सिंह के विषय में सही तथ्यों को प्रकाशित किया जाएगा।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीइआरटी) द्वारा प्रकाशित कक्षा दसवीं की किताब में शहीद वीर नारायण सिंह का नाम शहीद वीर नारायण सिंह बिंझवार राजपूत लिखा गया है। यह मामला पहले भी सामने आया था, लेकिन अब इसे लेकर आदिवासी समाज आक्रोशित है। आदिवासी समाज ने आरोप लगाया है कि भाजपा सरकार आदिवासियों की इतिहास-संस्कृति को बदलने की साजिश रच रही है।

मंत्री के इस आश्वासन के बावजूद विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष बीपीएस नेताम का कहना है कि यह आदिवासियों का अपमान है। हम शहीद वीर नारायण सिंह की पूजा करते हैं। उन्हें राजपूत बताया जाना गलत है। ऐसे तो ये मिनीमाता और गुरूघासीदास को भी राजपूत बता देंगे। नेताम ने कहा कि इस मामले में समाज ने बैठक की है। आदिवासी युवा संगठन ने पिछले दिनों इसे लेकर राज्य के कई जिलों में प्रदर्शन और पुतला दहन किया था।

साल 2016 में भी उठा था विवाद 
2016 में राज्य शिक्षा स्थाई समिति की बैठक में सदस्यों ने राजपूत शब्द हटाने का सुझाव दिया था, लेकिन हटाया नहीं गया। इतिहासकार डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र के मुताबिक उनकी वीरता के कारण उन्हें राजपूत उपमा दी गई। यह जाति नहीं संबोधन बोधक शब्द है। मध्यप्रदेश सरकार के सूचना एवं प्रसारण विभाग ने 1984 में एक पुस्तक प्रकाशित की थी, जिसमें वीर नारायण सिंह को राजपूत बताया गया। वहीं से दूसरी किताबों में यह शब्द आया।

शहीद वीर नारायण सिंह आदिवासियों के लिए पूज्य
शहीद वीर नारायण सिंह बिंझवार सोनाखान के जमींदार थे। उनका जन्म 1795 में हुआ था। 35 साल की आयु में उन्हें पिता से जमींदारी मिली। 1857 के विद्रोह के पहले ही उन्होंने ब्रिटिश नीतियों को चुनौती दी। 1856 में सोनाखान में अकाल पड़ा तो उन्होंने साहूकार से मदद मांगी और आश्वस्त किया कि फसल होने पर उसका अनाज लौटा दिया जाएगा। साहूकार ने अनाज देने से मना किया तो उन्होंने गोदाम तोड़कर अनाज जनता को बांट दिया। इस घटना की शिकायत उस समय डिप्टी कमिश्नर इलियट से की गई। वीरनारायण सिंह ने शिकायत की भनक लगते हुए करुरूपाट डोंगरी को अपना आश्रय बना लिया।

ज्ञातव्य है कि करुरूपाट गोड़, बिंझवार राजाओं के देवता हैं। अंतत: ब्रिटिश सरकार ने देवरी के जमींदार जो नारायण सिंह के बहनोई थे के सहयोग से छलपूर्वक देशद्रोही व लुटेरा का बेबुनियाद आरोप लगाकर उन्हें बंदी बना लिया। अंग्रेज सरकार के 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया था। बिंझवार आदिवासी समाज उन्हें अपना पूज्य मानता है।

सरकार ने माना वीर नारायण सिंह थे आदिवासी
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप कहते हैं, सर्व आदिवासी समाज की आपत्ति के बाद शहीद वीर नारायण सिंह की जीवनी संबंधि पाठ्य सामग्री में संसोधन को लेकर मैंने अधिकारियों से चर्चा की है। तत्काल प्रभाव से संसोधन करके बच्चों को उक्त पाठ पढ़ाने के लिए कहा गया है।

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