सुप्रीम कोर्ट ने मांगा सांसदों-विधायकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों का ब्योरा

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 25 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों से सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों और उनके त्वरित निपटारे के लिए विशेष अदालतों के गठन का पूरा ब्योरा मांगा है। कोर्ट ने राज्यों के मुख्य सचिवों और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों को 10 अक्टूबर तक कोर्ट के समक्ष जानकारी पेश करने का आदेश दिया है।

ये आदेश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई व न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने भाजपा नेता व वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिये। पिछली सुनवाई पर कोर्ट ने सांसदों विधायकों के आपराधिक मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन और वहां लंबित मुकदमों का ब्योरा मांगा था। केन्द्र सरकार की से दाखिल किये गए हलफनामे में कोर्ट को बताया गया कि सांसदों-विधायकों के मुकदमों के त्वरित निपटारे के लिए 11 राज्यों में 12 विशेष अदालतों का गठन किया गया है।

हलफनामे में सरकार ने कहा था कि आंध्र प्रदेश, बिहार, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में एक एक विशेष अदालत का गठन किया गया है। जबकि दिल्ली में दो विशेष अदालतें गठित की गई हैं। सरकार ने कोर्ट को बताया कि अन्य 25 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने अभी तक इस बारे में जानकारी नहीं उपलब्ध कराई है।

कोर्ट ने इस बात को अपने आदेश में दर्ज करते हुए अरुणाचल प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, झारखंड, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तराखंड, अंडमान निकोबार, चंडीगड़, दादर नागर हवेली, दमन द्वीप, लक्षद्वीप, और पुड्डूचेरी के मुख्य सचिवों और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों को निर्देश दिया कि वे कोर्ट के गत वर्ष एक नवंबर और गत 21 अगस्त के आदेश का अनुपालन करते हुए सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित कुल आपराधिक मुकदमें और उनके त्वरित निपटारे के लिए विशेष अदालतों के गठन का पूरा ब्योरा पेश करें।

मुख्य सचिवों और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से 10 अक्टूबर तक मांगी जानकारी

कोर्ट ने राज्यों से पूछा है कि जो 12 विशेष अदालतें गठित की गई हैं वे काम कर रही हैं कि नहीं। इसके अलावा काम की अधिकता को देखते हुए क्या और अतिरिक्त विशेष अदालतों के गठन की जरूरत है। कोर्ट ने राज्यों को 10 अक्टूबर तक ये ब्योरा देने का निर्देश दिया है।

साथ ही कोर्ट ने साफ किया कि राज्यों से जानकारी आने के बाद अगर जरूरत लगी तो कोर्ट अपने आदेश के अनुपालन की निगरानी भी करेगा और विभिन्न राज्यों के एक साथ मिल कर केस सुनने या फिर अलग-अलग करने की जरूरत पर भी विचार होगा।

इससे पहले उपाध्याय की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सजन पुवैया ने कहा कि सरकार ने हलफनामे मे यह तो बताया है कि 11 राज्यों में 12 विशेष अदालतें गठित की गई हैं लेकिन उनमें कितने केस स्थानांतरित किये गए हैं यह नहीं बताया गया है। आंध्रप्रदेश में एक विशेष अदालत गठित की गई है जिसमें 25 मुकदमें सुनवाई के लिए स्थानांतरित किये गये हैं लेकिन ये साफ नहीं है कि क्या पूरे राज्य में सांसद विधायकों के खिलाफ सिर्फ 25 मुकदमें ही लंबित हैं।

मालूम हो कि कोर्ट ने गत वर्ष एक नवंबर को सरकार से पूछा था कि 2014 के चुनाव में दाखिल किये गये हलफनामे के मुताबिक सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित 1581 मामलों में से कितने मुकदमें तय एक साल की अवधि में निस्तारित हो चुके हैं। कितने मामलों में सांसदों-विधायकों को सजा हुई और कितने बरी हुए। इसके अलावा 2014 से 2017 के बीच कितने सांसदों-विधायकों के खिलाफ और आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए और उनका ब्योरा क्या है।

कोर्ट ने 14 दिसंबर को आदेश दिया था कि इन मुकदमों के जल्द निपटारे के लिए विशेष अदालतें गठित होनी चाहिए। गत 21 अगस्त को कोर्ट ने गठित की गई विशेष अदालतों और उनमें स्थानांतरित मुकदमों का ब्योरा मांगा था। 

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