सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की दुर्दशा की दास्तान, भाजपा सरकार के कार्यों का लेखाजोखा

यह पुस्तक न सिर्फ सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की दुर्दशा के कारणों की पड़ताल करती है बल्कि भाजपा सरकार के किए गये उल्लेखनीय कार्यों का लेखाजोखा भी प्रस्तुत करती है। इस किताब के पहले चार अध्यायों में लेखक कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में हुए भ्रष्टाचार की चर्चा करते हैं।

Manish PandeySun, 24 Oct 2021 09:41 AM (IST)
पिछले कुछ वर्षों में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कांग्रेस में एक और बदलाव देखने को मिला है।

 [अजय कुमार राय] जब किसी राजनीतिक दल की बागडोर सिर्फ एक परिवार के हाथों में केंद्रित हो जाती है तो उसमें एक मजबूत नेतृत्व के उभरने और पार्टी को एकजुट रखते हुए सबको साथ लेकर चलने की राह एक सीमा के बाद अवरुद्ध हो जाती है। कुछ लोग अपनी महत्वाकांक्षाओं को दबाकर उन परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं, लेकिन कई ऐसे भी होते हैं, जो अपना अलग रास्ता बना लेते हैं। ऐसी वशंवादी राजनीतिक पार्टियों में टूट का सिलसिला बना रहता है। परिणाम स्वरूप उसे एक सशक्त नेतृत्व नहीं मिल पाता और वह पार्टी लगातार कमजोर होती रहती है। आज कांग्रेस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पिछले कुछ वर्षों में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कांग्रेस में एक और बदलाव देखने को मिला है। वह यह कि पार्टी अक्सर राष्ट्र की उम्मीदों से अलग सोच प्रकट करती प्रतीत होती है। एक राजनीतिक पार्टी के अंत के लिए ये दो कारण पर्याप्त हैं, लेकिन कभी पूरे देश में एकछत्र शासन करने वाली कांग्रेस के इस दयनीय हालत में पहुंचने के लिए अन्य भी कई वजहें रही हैं। अमित बागड़िया ने अपनी पुस्तक 'कांग्रेस-मुक्त भारत' में उन सभी का तथ्यों के साथ विस्तार से विश्लेषण किया है।

सरल भाषा में लिखी इस किताब के पहले चार अध्यायों में लेखक कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में हुए भ्रष्टाचार की चर्चा करते हैं। 'द मित्रोखिन आर्काइव-2 : द केजीबी इन द वल्र्ड' नामक पुस्तक के हवाले से बताया है कि तत्कालीन सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी केजीबी का भारतीय राजनीति खासकर नेहरू-इंदिरा युग में कांग्रेस और तत्कालीन विपक्ष सीपीआइ-सीपीएम में काफी दखल था। इससे न सिर्फ शासक वर्ग के अंदर भ्रष्टाचार फैला, बल्कि कई ऐसे फैसले भी लेने पड़े, जो कि भारत के हित में नहीं थे। इससे सरकार में एक ऐसा इकोसिस्टम बन गया, जो आज भी गाहे-बगाहे उभर आता है। यूपीए-एक और दो का शासनकाल तो आमतौर पर घोटालों के लिए जाना जाता है, जिसमें बैैंक एनपीए घोटाला, कोयला घोटाला, 2जी व टेलीफोन एक्सचेंज घोटाला, एयरसेल-मैक्सिस केस, दिल्ली कामनवेल्थ घोटाला, सोना आयात घोटाला, एनएसई का लोकेशन घोटाला, नरेगा घोटाला, थोरियम घोटाला, एयर इंडिया घोटाला, नेशनल हेराल्ड केस, आइएनएक्स मीडिया केस, राबर्ट वाड्रा पर आरोप आदि प्रमुख हैैं। उसी दौर में कांग्रेस सरकार के पैरोकारों ने हिंदू आतंकवाद की झूठी कहानी गढ़ी। इसने देश के एक बड़े वर्ग की भावना को मर्माहत करने का काम किया।

आजादी के बाद से कांग्रेस की बागडोर अधिकांशत: नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य के ही हाथों में रही। सीताराम केसरी के बाद से पिछले करीब 23 साल से तो सोनिया गांधी इस पर काबिज हैैं। बहुत संभव है कि अगले एक-आध साल में यह बागडोर राहुल गांधी के हाथों में चली जाए। पार्टी पर एक परिवार के वर्चस्व के कारण 1947 से पहले वाली कांग्रेस कम से कम 30 बार टूट चुकी है। आज के दिग्गज ममता बनर्जी, शरद पवार, वाईएस जगनमोहन रेड्डी कभी कांग्रेस के ही सदस्य थे। इससे कांग्रेस को एक सशक्त नेतृत्व नहीं मिल पा रहा है। लिहाजा पार्टी न तो एकजुट हो पा रही है और न ही देश की भावनाओं का इजहार कर पा रही है।

अगले कुछ अध्याय 2019 के चुनावों, नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की सफलताओं-विफलताओं और 80 महीने में उनकी ओर से किए गए कार्यों पर हैैं। एक अध्याय में भारत के 14 प्रधानमंत्रियों की सफलताओं और विफलताओं का वर्णन है। इसके अलावा उन सुधारों का जिक्र किया है, जिनकी अपेक्षा देश मोदी सरकार से कर रहा है। इनमें प्रमुख हैैं-न्यायिक सुधार, चुनाव सुधार, संसदीय सुधार, पुलिस सुधार, सीबीआइ-एनआइए-एनएसजी-सीआरपीएफ को मिलाकर एक राष्ट्रीय पुलिस बल का गठन, प्रशासनिक सुधार, जनसंख्या नियंत्रण कानून। निश्चित रूप से मोदी सरकार ये बचे हुए कामों को पूरा कर लेती है तो कांग्रेस का वापसी का इंतजार और बढ़ जाएगा।

कुल मिलाकर, यह पुस्तक कांग्रेस के अर्श से फर्श तक पहुंचने के कारणों की तो पड़ताल करती ही है, साथ ही भाजपा के शून्य से शिखर तक की यात्रा तथा शीर्ष पर मजबूती के साथ डटे रहने के लिए उसके द्वारा किये जा रहे उल्लेखनीय प्रयासों को रोचक अंदाज में पेश करती है।

पुस्तक : कांग्रेस-मुक्त भारत

लेखक : अमित बागड़िया

प्रकाशक : प्रभात पेपरबैक्स

मूल्य : 400 रुपये

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