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जानें कब-कब देश के राष्‍ट्रपति और पीएम ने किया मंदिर का उद्घाटन या रखी आधारशिला

जानें कब-कब देश के राष्‍ट्रपति और पीएम ने किया मंदिर का उद्घाटन या रखी आधारशिला
Publish Date:Wed, 05 Aug 2020 08:15 AM (IST) Author: Kamal Verma

नई दिल्‍ली (ऑनलाइन डेस्‍क)। रामनगरी अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के निर्माण के लिए भूमि पूजन पीएम मोदी द्वारा संपन्‍न किया जा रहा है। वर्षों पुराने इस विवाद के खत्‍म होने के बाद आज का दिन हर किसी के लिए बेहद खास है। देश के करोड़ों लोगों को आज के दिन का ही इंतजार भी था। बहरहाल, आपको बता दें कि बीती रात अयोध्‍या में लाखों दीप प्रज्‍ज्‍वलित कर दीपावली जैसा ही उत्‍सव और खुशी मनाई गई। आज हम आपको यहां पर उन मंदिरों के बारे में जानकारी दे रहे हैं जिनके शिलान्‍यास या उदघाटन में राष्‍ट्रपति या प्रधानमंत्री शामिल रहे या उनके द्वारा किया गया।

अबू धाबी के मंदिर की आ‍धारशिला

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 11 फरवरी 2018 को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की राजधानी अबू धाबी में पहले हिंदू मंदिर की आधारशिला रखी थी। उन्‍होंने वीडियो लिंकिंग के जरिए इसकी आधारशिला रखी थी। अबू धाबी में बनने वाले भव्य मंदिर के लिए 125 करोड़ भारतीयों की ओर से वली अहद शहजादा मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान को धन्यवाद दिया था। आपको बता दें कि अबू धाबी में भारतीय मूल के तीस लाख से ज्यादा लोग रहते हैं जो यहां की अर्थव्‍यवस्‍था में अहम भूमिका निभाते हैं। पीएम मोदी ने दो बार यूएई की यात्रा की है। यूएई की तरफ से पीएम मोदी को सर्वोच्‍च सम्‍मान भी दिया जा चुका है।

दुबई-अबू धाबी राजमार्ग पर बन रहा यह अबू धाबी का पहला पत्थर से निर्मित मंदिर है। ये मंदिर 55000 वर्ग मीटर भूमि पर बन रहा है और इसके इस वर्ष तक पूरा होने की उम्‍मीद है। हालांकि कोरोना वायरस ने जिस तरह से पूरी दुनिया पर ब्रेक लगाया है उसको देखते हुए इसको बनने में कुछ और समय लग सकता है। इसका शिलान्यास समारोह दुबई के ओपेरा हाउस में आयोजित किया गया था। इस मंदिर का निर्माण भारतीय शिल्पकार कर रहे हैं। श्री अक्षर पुरषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) के मुताबिक पश्चिम एशिया में पत्थरों से बना यह पहला हिंदू मंदिर है।

अक्षरधाम मंदिर

6 नवंबर 2005 को दिल्‍ली स्थित अक्षरधाम मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्‍टर एपीजे अब्दुल कलाम, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी उपस्थित थे। 17 दिसंबर 2007, इसको विश्व के सबसे बड़े हिंदू मंदिर परिसर के रूप में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकार्ड में दर्ज किया गया। 1968 में इस परिसर की योजना बीएपीएस संस्था के आध्यात्मिक प्रमुख योगी महाराज ने बनाई थी। लेकिन 1971 में उनके निधन के पश्‍चात 1982 में इस योजना पर आगे बढ़ने का काम शुरू हुआ। इस मंदिर का निर्माण कार्य 8 नवंबर 2000 को शुरू हुआ और 6 नवंबर 2005 को मंदिर अधिकृत रूप से आम जनता के लिए खोल दिया गया।

इस मंदिर का निर्माण कार्य 4 साल और 363 दिनों में पूरा हुआ था। इस मंदिर के निर्माण के लिए राजस्थान से 6000 टन से अधिक गुलाबी बलुआ पत्थर लाया गया था। मंदिर के निर्माण की कुल लागत 400 करोड़ रुपये थी। प्रधान स्वामी महाराज के 3,000 स्वयंसेवकों ने मंदिर का निर्माण करने के लिए 7,000 शिल्पकारों की मदद की। इस मंदिर को वास्तु शास्त्रा और पंचत्र शास्त्रा के अनुसार बनाया गया है। यह स्मारक 141 फुट ऊंचे, 316 फुट चैड़ा और 370 फुट लंबा है। मंदिर की केंद्रीय गुंबद के नीचे स्थित स्वामीनारायण की प्रतिमा है, जो 11 फुट ऊंची है और हिंदू परंपरा के अनुसार पांच धातु से बनी है।

सोमनाथ मंदिर 

1 दिसंबर 1955 को भारत के तत्‍कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी ने इस मंदिर को राष्ट्र को समर्पित किया वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरंभ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया था। इसको सूर्य मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इसे भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में जाना जाता है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में स्पष्ट है।यह मंदिर हिंदू धर्म के उत्थान-पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है। अत्यंत वैभवशाली होने के कारण इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा तथा पुनर्निर्मित किया गया।

लोककथाओं के अनुसार यहीं श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। इस कारण इस क्षेत्र का और भी महत्व बढ़ गया। इस मंदिर की व्यवस्था और संचालन का कार्य सोमनाथ ट्रस्ट के अधीन है। सरकार ने ट्रस्ट को जमीन, बाग-बगीचे देकर आय का प्रबंध किया है। यह तीर्थ पितृगणों के श्राद्ध आदि कर्मो के लिए भी प्रसिद्ध है। चैत्र, भाद्रपद, कार्तिक माह में यहां श्राद्ध करने का विशेष महत्व बताया गया है। इन तीन महीनों में यहां श्रद्धालुओं की बडी भीड़ लगती है। इसके अलावा यहां तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है। इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है।

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