संसद का मानसून सत्र, संसदीय कार्यवाही के दौरान शोरशराबे में गुम होते आमजन से जुड़े अहम मुद्दे

Monsoon Session Of Parliament संसद की मर्यादा का हनन करने कामकाज बाधित करने एवं संसदीय विशेषाधिकार का दुरुपयोग करने की स्थिति में सांसद के वेतन-भत्ते को रोकने से लेकर उसका निर्वाचन रद करने तक की व्यवस्था होनी चाहिए।

Sanjay PokhriyalFri, 30 Jul 2021 10:18 AM (IST)
संसदीय कार्यवाही के दौरान शोरशराबे में गुम होते आमजन से जुड़े अहम मुद्दे। फाइल

पीयूष द्विवेदी। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से एक दिन पूर्व केंद्र सरकार द्वारा एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई थी, जिसमें 33 दलों ने हिस्सा लिया था। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह स्पष्ट किया था कि सरकार सदन में हर मुद्दे पर स्वस्थ चर्चा के लिए तैयार है और सदन को सुचारु ढंग से चलाने के लिए उन्हें सभी दलों का सहयोग चाहिए। इस बैठक के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि मार्च में संसद का बजट सत्र निर्धारित समय से तेरह दिन पूर्व ही समाप्त हो जाने के चलते जो कार्य लंबित रह गए थे, उन सबकी भरपाई भी इस मानसून सत्र में हो जाएगी, लेकिन यह सत्र शुरू होने के बाद से जो नजारा दिखाई दे रहा है, वह बेहद शर्मनाक है।

मानसून सत्र को एक सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन इस दौरान शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब विपक्षी सांसदों के हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही स्थगित न करनी पड़ी हो। सत्र के पहले दिन भारतीय संसद की परंपरा के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने विस्तारित मंत्रिपरिषद के नए सदस्यों से सदन का परिचय करवाना था, लेकिन विपक्षी सांसदों ने संसदीय परंपरा की भी परवाह न करते हुए ऐसा हंगामा किया कि सरकार के नए मंत्रियों का परिचय नहीं हो पाया और बिना इसके ही सदन की कार्यवाही आगे बढ़ानी पड़ी।

हद तो तब हो गई जब तृणमूल कांग्रेस के सांसद शांतनु सेन ने राज्यसभा में कथित पेगासस प्रकरण पर बयान दे रहे सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार मंत्री अश्विनी वैष्णव के हाथों से उनके बयान की प्रति छीनकर फाड़ दी और उसके टुकड़े उपसभापति की ओर उछाल दिए। शांतनु सेन की इस शर्मनाक हरकत से विश्व में भारतीय लोकतंत्र के प्रति क्या संदेश गया होगा, यह सोचकर भी शर्म आती है। यह उचित ही है कि उन्हें इस पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया, पर इससे विपक्षी विरोध की गतिविधियों में परिवर्तन नहीं आया है। लगता है जैसे विपक्षी दल यह तय करके बैठे हैं कि चाहें कुछ भी हो जाए सदन में कामकाज नहीं होने देना है।

सरकार द्वारा इस सत्र में 31 विधेयक पेश किए जाने थे। उम्मीद की जा रही थी कि करीब दो दर्जन विधेयक पारित भी हो जाएंगे, पर सप्ताह भर से अधिक समय बीत जाने के बाद केवल दो विधेयक ही पारित हुए हैं, वह भी बिना किसी चर्चा के। यह कोई अच्छी स्थिति नहीं कही जा सकती। लोकतंत्र में संसद संवाद और विमर्श का सबसे बेहतर माध्यम है। उम्मीद की जाती है कि यहां हमारे जनप्रतिनिधि परस्पर चर्चा और विमर्श करके देश की जनता के हित में जरूरी कानून बनाएंगे। विपक्ष से यह उम्मीद की जाती है कि वह चर्चा के दौरान रचनात्मक रुख रखते हुए न केवल जनहित से जुड़े जरूरी मुद्दों पर सरकार से उचित सवाल पूछेगा, बल्कि आवश्यक सुझाव भी देगा, लेकिन यहां तो विपक्ष संसद चलने देने को ही तैयार नहीं है।

विपक्षी दलों को शायद ऐसा लगता है कि सदन चलने पर सरकार बहुमत के बल पर अपने मनमुताबिक विधेयक पारित करवाकर जनता में अपनी छवि चमका लेगी। अत: वे व्यर्थ हंगामे के जरिये सदन की कार्यवाही में गतिरोध पैदा करके सरकार को विधेयक पारित करवाने से रोकने की रणनीति अपना रहे हैं। उन्हें लगता है ऐसा करने से सरकार काम नहीं कर पाएगी और उसकी छवि कमजोर होगी। यह काम विपक्षी दल पहले के सत्रों में भी खूब कर चुके हैं, लेकिन आश्चर्य है कि विपक्ष को यह बुनियादी बात समझ नहीं आ रही कि सदन का न चलना सरकार के लिए किसी भी प्रकार से विशेष हानिकारक नहीं है। अव्वल तो सरकार आवश्यक कानून अध्यादेश के जरिये या शोर-शराबे के बीच भी पारित करवाकर लागू कर सकती है, दूसरा वह बड़े आराम से जनता के बीच जाकर यह भी कह सकती है कि हम तो अमुक विधेयक सदन में लाना चाहते थे, लेकिन विपक्ष ने संसद चलने ही नहीं दी। चूंकि सदन की कार्यवाही का सजीव प्रसारण टीवी पर होता है तो जनता स्वयं भी सबकुछ देख ही रही है। ऐसे में विपक्ष को समझना चाहिए कि संसद में गतिरोध की राजनीति उसे कोई लाभ नहीं देगी, बल्कि इससे हानि होने की संभावना ही अधिक है।

सवाल यह है कि संसद में विशेषाधिकार की आड़ में हंगामे को रणनीति बना देश का पैसा बर्बाद करने वाले माननीयों को रोकने के लिए क्या हमारे पास कोई ठोस व्यवस्था है? संसदीय शासन प्रणाली देश के लिए उपयुक्त है, परंतु तमाम अच्छे लोगों एक बीच कुछ गलत लोग भी इसमें घुस आते हैं, जिन्हें ठीक करने के लिए समुचित व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है। सांसदों का निलंबन पर्याप्त नहीं है, अपितु वर्तमान समय को देखते हुए संसद की मर्यादा का हनन करने, कामकाज बाधित करने एवं संसदीय विशेषाधिकार का दुरुपयोग करने की स्थिति में किसी सांसद के वेतन-भत्ते को रोकने से लेकर उनका निर्वाचन रद करने तक की व्यवस्था होनी चाहिए। यह व्यवस्था कठोर अवश्य है, परंतु इसके लागू होने के बाद निश्चित रूप से आज संसद में जो अराजकता नजर आ रही है, इसमें कमी देखने को मिलेगी तथा देश के संसदीय कामकाज में भी गुणात्मक वृद्धि होगी।

[स्वतंत्र पत्रकार]

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