अभूतपूर्व हंगामे के लिए याद किया जाएगा कोरोना काल का 10 दिवसीय संसद का मानसून सत्र

अभूतपूर्व हंगामा के लिए भी याद किया जाएगा कोरोना काल का मानसून सत्र।
Publish Date:Wed, 23 Sep 2020 09:13 PM (IST) Author: Bhupendra Singh

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। कोविड-19 वायरस के बढ़ते संक्रमण के चलते संसद का मानसून सत्र निर्धारित समय से आठ दिन पहले बुधवार को समाप्त हो गया, लेकिन संसद के इस छोटे सत्र ने बड़े सुधारों का रास्ता साफ कर दिया। इसमें कृषि और श्रम सुधारों से जुडे़ अहम विधेयक पारित हो गए।

अभूतपूर्व हंगामे के लिए याद किया जाएगा कोरोना काल का 10 दिवसीय संसद का मानसून सत्र

संसद का यह सत्र भले ही मात्र 10 दिनों का रहा हो, लेकिन कामकाज के लिहाज से दोनों सदनों का प्रदर्शन शानदार रहा। कोरोना काल यह अनोखा सत्र अभूतपूर्व हंगामे के लिए भी याद किया जाएगा। कृषि सुधारों से संबंधित विधेयकों को लेकर राज्यसभा में अभूतपूर्व हंगामा हुआ जिसकी कड़वाहट संसद के बाहर भी महसूस की जा रही है।

कृषि, श्रम व कर सुधारों समेत 25 विधेयक पारित

संसद के 10 दिनों के छोटे से सत्र में भी दो दर्जन से अधिक विधेयक पारित करा लिए गए। इसमें कृषि और श्रम सुधारों के साथ कर सुधार, इंसाल्वेंसी एंड बैंकरप्सी और फारेन कांट्रिब्यूशन एमेंडमेंट विधेयक प्रमुख हैं। कृषि सुधारों को लेकर राज्यसभा में अभूतपूर्व हंगामा हुआ, जिसकी धमक देश के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक आंदोलन के रूप में सुनाई पड़ रही है। राज्यसभा में सत्र के अंतिम दिन जम्मू-कश्मीर आधिकारिक भाषा विधेयक पारित कर दिया गया, जिससे वहां की सरकारी भाषा कश्मीरी, डोगरी और हिंदी हो गई।

सदन की मर्यादा को ठेस पहुंचाने के आरोप में विपक्ष के आठ सांसद हुए निलंबित

मानसून सत्र के दौरान सबसे चर्चित कृषि सुधार से संबंधित तीन विधेयक थे जिस पर विपक्ष ने जबर्दस्त विरोध जताया। मंडी कानून से अलग एक केंद्रीय कानून के साथ कांट्रैक्ट खेती के विधेयक को सदन में पास कर दिया गया। इसके विरोध में लोकसभा में विपक्षी दलों ने सदन का बायकाट किया जबकि राज्यसभा में विपक्षी पार्टियों ने जबर्दस्त हंगामा किया। इसके बावजूद अभूतपूर्व हंगामा व शोरशराबा के बीच विधेयक ध्वनिमत से पारित कर दिए गए। सदन की मर्यादा को ठेस पहुंचाने के आरोप में विपक्ष के आठ सांसदों को निलंबित भी कर दिया गया।

सुधारों की कड़ी में कृषि सुधार के साथ श्रम सुधार के तीन बिल पारित

सुधारों की कड़ी में कृषि सुधार के साथ श्रम सुधार के तीन कानूनों को पारित कर दिया गया। इनमें श्रम क्षेत्र के 29 पुराने कानूनों के अच्छे प्रावधानों को समाहित कर दिया गया है। इन कानूनों में प्रवासी श्रमिकों की बेहतरी के लिए भी प्रावधान किए गए हैं। कर सुधारों से संबंधित विधेयक में कर प्रणाली को सहज व सरल बनाने पर जोर दिया गया है, ताकि संकट के दौर से लोगों को निजात पाने में मदद मिल सके।

एनजीओ पर काबू पाने के लिए एफसीआरए विधेयक संसद से पारित

संसद के दोनों सदनों से पारित प्रमुख विधेयकों में विदेशी दान लेकर घरेलू राजनीति में दखल देने वाले एनजीओ और अन्य संगठनों पर काबू पाने के लिए एफसीआरए विधेयक शामिल है। सहकारिता बैंकिंग के रेगुलेशन से जुड़े विधेयक को पास कर दिया गया, जिससे आम लोगों के बीच बैंकिंग के नाम पर घोटाला करने वालों को काबू किया जा सकेगा।

राज्यसभा: दूसरा सबसे छोटा मानसून सत्र, 1979 में मात्र एक दिन का सत्र था

राज्यसभा के लिए 1952 से अब तक के कुल 69 मानसून सत्र में यह दूसरा सबसे छोटा सत्र साबित हुआ है। जबकि सबसे छोटा सत्र 20 अगस्त 1979 में मात्र एक दिन का सत्र था, जिसमें पहले दिन ही प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। राज्यसभा की अब तक कुल 69 मानसून सत्रों की बैठकें हो चुकी हैैं। राज्यसभा में बुधवार को आज अंतिम दिन लोकसभा से भेजे गए ज्यादातर विधेयकों को पारित कर दिया गया।

संसदीय इतिहास में पहली बार सांसदों को 'दो गज की दूरी' के हिसाब से बैठाया गया था

कोरोना काल के दौरान आयोजित संसद सत्र की तैयारियां जबर्दस्त थीं। संसदीय इतिहास में पहली बार सांसदों को बैठने का बंदोबस्त 'दो गज की दूरी' के हिसाब से किया गया था। कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए सभी सांसदों, सचिवालय के कर्मचारियों और पत्रकारों को कोविड जांच के बाद ही संसद परिसर में प्रवेश की अनुमति दी गई। जांच में 30 से अधिक सांसद व कई मंत्रियों को कोरोना संक्रमित पाया गया। संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही पहली बार अलग-अलग पालियों में हुई।

कोरोना के चलते मानसून सत्र निर्धारित समय से आठ दिन पहले स्थगित

मानसून सत्र 14 सितंबर से एक अक्तूबर तक बिना किसी छुट्टी के 18 दिन लगातार चलाया जाना था, लेकिन कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रसार के मद्देनजर संसद की कार्यवाही निर्धारित समय एक अक्तूबर से आठ दिन पहले ही समाप्त कर दी गई। इसके लिए सभी राजनीतिक दलों में सहमति थी।

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