Bangladesh Violence: बांग्लादेश में निशाने पर हिंदू समुदाय, चीन की शह पर दिया जा रहा अंजाम

Bangladesh Violence हाल ही में दुर्गा पूजा के दौरान बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। उसके बाद अनेक जगहों पर मंदिरों को भी नुकसान पहुंचाया गया जिस कारण आज वहां का हिंदू समुदाय बेहद सहमा हुआ है।

Sanjay PokhriyalFri, 22 Oct 2021 10:01 AM (IST)
बांग्लादेश अपने यहां मजहबी कट्टरपंथी को यदि जड़ से खत्म नहीं करता तो भारत को इसका करारा जवाब देना होगा।

सतीश कुमार। इस बार दुर्गा पूजा के दौरान बांग्लादेश में व्यापक हिंसा हुई। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के शब्द तल्ख और गंभीर थे। हिंदू मंदिरों पर हमले के दोषियों को उन्होंने कड़ी से कड़ी सजा देने और हिंदुओं को सुरक्षा प्रदान करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। हालांकि पिछले वर्ष भी शेख हसीना ने कहा था कि दुर्गा पूजा हमारी सरकार की धर्मनिरपेक्षता की पहचान है, लिहाजा इस अभियान को और मजबूत करने की जरूरत है।

उल्लेखनीय है कि भारत बांग्लादेश संबंधों के बीच कई चुनौतियां हैं, जो अभी भी गले में हड्डी की तरह अटकी हुई है। शेख हसीना के एक दशक के कार्यकाल में कई कार्यो को पूरा भी किया गया है। लेकिन एक दर्द अभी जिंदा जख्म की तरह है, वह है हिंदुओं के साथ हो रहा अत्याचार। दुर्गा पूजा की हिंसा दरअसल वहां की अंदरूनी मानसिकता की कहानी है।

बांग्लादेश में बीते दिनों उपद्रवियों द्वारा हिंदू मंदिर में की गई तोड़-फोड़ के पश्चात इस तरह से बदल गया वहां का परिदृश्य। फाइल

दर्द बहुत पुराना है, नोआखाली की हिंसा दुनिया के सामने है। गांधी का सत्याग्रह भी बहुत कारगर नहीं हो पाया था। अंत में गांधी ने हिंदुओं से अपील की थी कि हिंदू समुदाय नोआखाली छोड़कर हिंदू बस्ती में आ जाए। उसके बाद बंटवारे के दौरान भी हिंदू समुदाय का नरसंहार बड़े पैमाने पर हुआ था। अमेरिकी कांग्रेस की रिपोर्ट में यह बात दर्ज है कि बंटवारे के पहले बांग्लादेश में हिंदुओं की तादाद करीब 27 फीसद थी जो 2011 में 8.5 प्रतिशत पर आ चुकी है। हिंदुओं का पलायन एक बार फिर 1971 में हुआ था, जब पाकिस्तान की सेना सुनियोजित तरीके से हिंदुओं की हत्या कर रही थी। उस दौरान लाखों हिंदू मार दिए गए और लाखों शरणार्थी के रूप में भारत आ गए। बेगम खालिदा जिया के कार्यकाल में एक बार फिर हिंदुओं पर अत्याचार हुआ था, जब 2001 में बीएनपी की सरकार बनी थी। उसके बाद कई ऐसी नियमावली बनाई गई थी जो हिंदू समुदाय के विरुद्ध थी, जब उनकी जमीन और संपति को हड़पने का दौर शुरू हुआ जो आज भी कायम है।

इस बीच दशहरा के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने पाकिस्तान, तालिबान और कुछ मुस्लिम देशों की चर्चा भी की। यह तथ्य दुनिया के सामने है। भारत की सांस्कृतिक विरासत की अमिट छाप दक्षिण एशिया के मानचित्र पर है। दुर्भाग्य यह है कि इतिहासकार और विश्लेषक दक्षिण एशिया में कई संस्कृतियों का विलय मानते हैं जिसमें पर्शियन, अरबिक, सिनिक और मलय शामिल बताए जाते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि दक्षिण एशिया का सांस्कृतिक ढांचा हिंदू संस्कृति की तर्ज पर बना है। बाहरी संस्कृतियों ने समन्वय से अधिक मतभेद पैदा किया है। इसका ज्वलंत उदाहरण दुर्गा पूजा में बांग्लादेश हिंसा के रूप में देखा जा सकता है। कुछ वर्ष पूर्व नेपाल की साम्यवादी सरकार के प्रधानमंत्री केपी ओली ने भगवान श्रीराम की जन्मस्थली को नेपाल में बताया था। यह सब अनायास नहीं है। सांस्कृतिक विरासत को कमजोर करने के लिए बाहरी शक्तियां राजनीति को हथियार के रूप में इस्तेमाल करती रही हैं।

शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और पश्चिमी देशों ने भारत देश की परिकल्पना ही 1947 के बाद से शुरू की यानी भारत का राष्ट्र के रूप में जन्म ही 1947 के बाद हुआ। इतिहास के साथ यह कैसा क्रूर मजाक था। चूंकि कई दशकों तक भारत के बुद्धिजीवियों द्वारा कोई प्रतिवाद नहीं किया गया, पश्चिमी दुनिया ने जैसा लिखा और समझाया उसे हम अंगीकार करते गए। लेकिन सच तो सामने आना ही था। भारत की मजबूत बनती नींव को देख पश्चिमी विश्व भारत को सभ्यताओं वाला देश बताने लगा। राष्ट्र धर्म की परिभाषा चर्चा में आने लगी। हमारा पुरातन ज्ञान पश्चिमी शोध का विषय बनने लगा। संस्कृत सबसे आधुनिक कंप्यूटर की भाषा मानी जाने लगी। जब चीन के साथ भारत की पहचान एक सभ्यताओं वाले देश में होने लगी तो चीन को लगा कि सांस्कृतिक पहचान में भारत चीन से आगे निकल जाएगा, क्योंकि चीन के लोग आज भी भारत को अपनी गुरु भूमि मानते हैं। वहां के राजनीतिक ढांचे में धर्म जहर जैसा है। ऐसे में चीन ने सांस्कृतिक कूटनीति में छल का प्रयोग करते हुए दक्षिण एशिया के देशों में हिंदू संस्कृति को तोड़ने का खेल शुरू किया। नेपाल इसका सबसे बेहतरीन उद्धरण है। अन्य पड़ोसी देशों में इस्लामिक ग्रुप को हवा देकर हिंदू संस्कृति पर हमले हुए, जिसमें चीन का हाथ था।

भारत ने सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में बल का प्रयोग नहीं किया है। चाहे अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं को विखंडित किया गया या दक्षिण एशिया के अन्य देशों में मंदिरों को ध्वस्त किया जाता रहा। ऐसे में चीन के विस्तारवादी सोच को लगाम देने के लिए जरूरी है कि भारत अपनी सांस्कृतिक कूटनीति की धार को तेज करे यानी जरूरी शक्ति का प्रयोग भी आवश्यक है। साफ्ट पावर के एक सिद्धांतकार का भी मानना है कि केवल साफ्ट पावर से बात नहीं बनती। जिस तरीके से बाहरी ताकतें सदियों से भारत की सांस्कृतिक विरासत को खंडित करने की कोशिश करती रही है, उससे हिंदू संस्कृति अपनी ही जमीन पर बेगाना बन गया। विदेश का सबकुछ अनुकरणीय समझा जाने लगा। लेकिन समय का चक्र बदल चुका है। भारत में एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था बनी है जो खंडित संस्कृति को पुन: स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

दरअसल यह संस्कृति दक्षिण एशिया के विकास की संस्कृति है। श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और अफगानिस्तान जैसे देश इसी संस्कृति में पुष्पित और पल्लवित हुए हैं। यह देशों को जोड़ने का एक नया आयाम बन सकता है। इसमें एशिया से लेकर अफ्रीका तक के देश शामिल हैं, क्योंकि उनकी जड़ों में हिंदू संस्कृति की पहचान है। एक ऐसा विश्व जहां शांति और आपसी मित्रता के तर्ज पर हिंसा मुक्त विश्व के विकास को बल मिलेगा। इसलिए संस्कृति के प्रसार में जरूरत इस बात की है कि शत्रुओं को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया जाए।

[प्रोफेसर, इग्नू, नई दिल्ली]

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