हिंदू विरोधी मानसिकता से न दिग्विजय को लाभ, न कांग्रेस के लिए मुफीद, भाजपा को मिला मौका

दिग्विजय सिंह ने कश्मीर में अनुच्छेद-370 की वापसी पर बयान देकर ऐसा सियासी जोखिम मोल ले लिया है जो शायद ही कोई नेता दोहराना चाहेगा। इस बयान से न उन्हें कोई लाभ मिलने वाला न ही उनकी पार्टी कांग्रेस इसे अपने लिए सहज मान रही है।

Krishna Bihari SinghMon, 14 Jun 2021 07:13 PM (IST)
राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह ने कश्मीर में अनुच्छेद-370 की वापसी पर बयान देकर ऐसा सियासी जोखिम मोल ले लिया है...

धनंजय प्रताप सिंह, भोपाल। राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह ने कश्मीर में अनुच्छेद-370 की वापसी पर बयान देकर ऐसा सियासी जोखिम मोल ले लिया है जो शायद ही कोई नेता दोहराना चाहेगा। इस बयान से न उन्हें कोई लाभ मिलने वाला, न ही उनकी पार्टी कांग्रेस इसे अपने लिए सहज मान रही है। यही वजह है कि परिवार से लेकर पार्टी तक उनके साथ कोई खड़ा नहीं दिख रहा है। यही नहीं खुलकर और दबी जुबान में विरोध के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं। नतीजतन दिग्विजय सिंह फिलहाल अलग-थलग पड़ गए हैं।

नहीं मिला सियासी लाभ

दरअसल, दिग्विजय पहले भी कई बार हिंदू विरोधी बयानों को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। उनके बयान में अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की मंशा साफ झलकती रही है लेकिन इसका सियासी लाभ मिला हो, ऐसा देखने में नहीं आता। साल 2019 में भोपाल संसदीय सीट का चुनाव भी दिग्विजय सिंह इसी पृष्ठभूमि के चलते साध्वी प्रज्ञा से हार बैठे थे। प्रज्ञा की उम्मीदवारी अंतिम क्षणों में घोषित हुई थी जबकि दिग्विजय सिंह काफी पहले से जुट गए थे, लेकिन हिंदू विरोधी छवि के चलते उन्हें 35.6 प्रतिशत वोट, तो साध्वी को 61.5 फीसद वोट मिले थे।

कांग्रेस का होता रहा है नुकसान

तब दिग्‍व‍िजय सिंह को 3.64 लाख मतों से शिकस्त मिली थी। खास बात थी कि साध्वी का ये पहला चुनाव था। दिग्विजय ने चुनाव से पहले ही नर्मदा परिक्रमा भी की थी वहीं प्रदेश की तत्कालीन कमलनाथ सरकार में राम वनगमन पथ की योजना को लेकर वह चर्चा में थे। यानी वह हिंदुओं से जुड़े मुद्दों के जरिए बहुसंख्यक वर्ग में पैठ की कोशिश भी कर रहे थे लेकिन ऐसे बयान उनका ही नहीं पार्टी का भी नुकसान करते रहे हैं, क्योंकि उनके हिंदू विरोधी बयानों पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और हाईकमान तक मौन रहता है।

बंगाल से नहीं लिया सबक

ऐसे में संदेश जाता है कि कांग्रेस भी सिंह के बयानों से इत्तेफाक रखती है। इस बार भी सोनिया या राहुल गांधी ने सिंह के बयानों पर प्रतिक्रिया नहीं दी है। दिग्विजय के बयानों के बावजूद मुस्लिम मतदाता लगातार कांग्रेस से दूर होते जा रहे हैं। ताजा उदाहरण बंगाल विधानसभा चुनाव है, जहां कांग्रेस इस बार खाता तक नहीं खोल सकी जबकि पहले उसे 44 सीटें हासिल थीं लेकिन इस बार उनमें से अधिकांश तृणमूल कांग्रेस को चली गई। वोट शेयर भी 12.4 प्रतिशत से घटकर तीन प्रतिशत रह गया।

अगले साल यूपी में सियासी परीक्षा

अगले साल की शुरुआत में उत्‍तर प्रदेश में चुनाव हैं वहां भी 2017 में कांग्रेस को 403 में से सिर्फ सात सीटें मिली थीं। 2020 में बिहार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 243 में 19 सीटें ही हासिल कर सकी थी। साल 2015 में उसे 27 सीटें मिली थीं। दिल्ली में 2015 और 2020 में कांग्रेस का खाता ही नहीं खुला जबकि 2013 में आठ सीटें मिली थीं। मध्‍य प्रदेश प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव केके मिश्रा कहते हैं कि हमारी बुनियाद वसुदैव कुटुंबकम् पर टिकी हुई है। यही हमारे संविधान की बुनियाद भी है। हम इसी आधार पर चलेंगे।

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