सोना वेश में हजारों ने किए महाप्रभु के दर्शन

पुरी, जेएनएन। बाहुड़ा यात्रा में भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा संग मौसीबाड़ी (गुंडिचा मंदिर) से निज धाम (श्रीमंदिर) लौटे महाप्रभु श्री जगन्नाथ के सोना वेश दर्शन के लिए सोमवार को सुबह से ही श्रीक्षेत्र धाम, पुरी में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। मौसम अनुकूल होने से राज्य एवं राज्य के बाहर से भी बड़ी संख्या में भक्तों का समागम श्रीक्षेत्र धाम में हुआ। 

प्रशासन की तरफ से भक्तों की सुरक्षा एवं सुव्यस्थित दर्शन करने के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए थे। महाप्रभु के रथ से लेकर पूरे बड़दांड (श्रीमंदिर के सामने चौड़ा रास्ता) में चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बल के जवान मुस्तैद रहे। इसके अलावा आसपास स्थित मकानों की छतों पर शूटर तैनात किए गए थे तो सीसीटीवी कैमरे से तमाम गतिविधियों पर पर नजर रखी जा रही थी।

उल्लेखनीय है कि जन्मवेदी यानी मौसीबाड़ी से लौटने के बाद रविवार रात को चतुर्धा मूर्र्ति सिंहद्वार के सामने रथ पर ही विराजमान रहीं। रथ के ऊपर ही सोमवार को महाप्रभु को सोने के आभूषणों से सजाया गया। स्वर्ण वेश से सुसज्जित महाप्रभु के सोनावेश को देखने के लिए हजारों की तादात में भक्त श्रीक्षेत्र धाम पहुंचे हुए थे। महाप्रभु के इस विरल रूप के दर्शन को सुबह से ही भक्तों में आतुरता नजर आई। इससे पूर्व सुबह महाप्रभु का रत्न भंडार (बाहर) खोला गया। इसमें से आभूषण निकालकर महाप्रभु को सोने के वेश में सजाया गया। भंडार मेकॉप व बणिया सेवक की उपस्थिति में पहले इन आभूषणों की सफाई की गई इसके बाद इसे महाप्रभु को लगाया गया।

सोना वेश संपन्न होने के बाद भक्तों को महाप्रभु के इस विरल दर्शन के लिए कतार में छोड़ा गया, जो कि देर रात तक चला। हरिसयन एकादशी के मौके पर सोमवार को भक्तों ने महाप्रभु के रथ के पीछे बड़दांड में बैठकर नारियल फोड़कर प्रसाद तैयार कर तालपत्र में प्रभु को भोग लगाया। उल्लेखनीय है कि रथ के पास इस तरह से प्रसाद भोग लगाने की  पुरानी परंपरा है, जिसे चूड़ाघसा भोग कहा जाता है।

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