नीलाद्रि विजय और रसगुल्लाभोग: हजारों सालों से रसगुल्ला खिलाकर रूठी माता लक्ष्मी को मनाते प्रभु जगन्नाथ जी

इस साल 23 जुलाई को निभायी जाएगी यह परंपरालगभग एक हजार वर्ष से पुरी बड ओडिया मठ उत्तर पार्श्व मठ नेवलदास मठ राधावल्लव मठ राधेश्याम मठ और कटकी मठ आदि में रसगुल्ला तैयार किया जाता है।नीलाद्रि विजय के समय रसगुल्ला तैयार करने को ओडिशा में पवित्र कार्य माना जाता है।

Priti JhaSun, 18 Jul 2021 12:59 PM (IST)
हजारों सालों से रसगुल्ला खिलाकर रूठी माता लक्ष्मी को मनाते प्रभु जगन्नाथ जी

भुवनेश्वर, शेषनाथ राय। समस्त जगन्नाथ भक्तों के लिए यह जिज्ञासा का विषय अवश्य है कि जगन्नाथ भगवान का नीलाद्रि विजय और रसगुल्ला भोग क्या है, और इसकी परम्परा श्रीमंदिर में कब से आरंभ हुई। हजारों सालों से पुरी जगन्नाथ मंदिर में चली आ रही यह परंपरा विधि के मुताबिक आज भी बड़े ही धूमधाम के साथ मनायी जाती है। महाप्रभु के इसी परंपरा के संदर्भ में प्रस्तुत है एक विस्तृत रिपोर्ट।

जानकारी के मुताबिक, लगभग एक हजार वर्ष से यह परम्परा पुरी के जगन्नाथ मंदिर में देखने को मिलती है। कलियुग के एकमात्र पूर्णदारुब्रह्म भगवान जगन्नाथ के नवकलेवर का आरंभ जब से श्रीमंदिर में हुआ तभी से नीलाद्रि विजय और रसगुल्लाभोग की सुदीर्घ परम्परा रही है। वर्ष 2021 वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के संक्रमण के समय महाप्रभु जगन्नाथ का नीलाद्रि विजय आगामी 23 जुलाई, 2021 को है। महाप्रभु जगन्नाथ जब बाहुडा विजय कर अपनी जन्मस्थली गुण्डिचा मंदिर से जगन्नाथ मंदिर में वापस लौटेंगे तो उनकी पत्नी माता लक्ष्मीजी जगन्नाथ मंदिर में क्रोधित अवस्था में होंगी जिनको प्रसन्नकर तथा उनकी सहर्ष अनुमति प्राप्त कर जगन्नाथजी अपने रत्नवेदी पर आरुढ होंगे।

भगवान जगन्नाथ के पास माता लक्ष्मी को मनाने का एक ही तरीका अंत में काम आता है और वह है माता लक्ष्मी को रसगुल्ला भोग निवेदितकर उनको प्रसन्न करने का। अपने मानवीय लीलाओं के तहत लीलाधर भगवान जगन्नाथ एक अति साधारण पति के रुप में अपनी पत्नी को मनाते हैं, जिसे 23 जुलाई को दूरदर्शन तथा अन्य टेलीविजन चैनलों के माध्यम से सीधे प्रसारण से सभी घर बैठे अपने-अपने टीवी पर देखेंगे।

सच तो यह भी है कि भगवान जगन्नाथ द्वारा अपनी पत्नी लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने का नीलाद्रि विजय के दिन अंत में एक ही उपाय शेष रहता है और वह है उनको रसगुल्ला का भोग अपने हाथों से निवेदितकर उनको प्रसन्न करने का। भक्त बलराम दास, ओडिया रामायण के रचयिता के अनुसार दण्डी रामायण, जगमोहन रामायण के अनुसार भरत लालजी अपने भाई शत्रुध्नजी के साथ श्रीरामचन्द्रजी को उनके वनवास से अयोध्या वापस लौटाने के निवेदन के समय भारद्वाज मुनि के आश्रम में जब जाते हैं तो भारद्वाज मुनिजी माया ब्राह्मणों द्वारा उन्हें दूध से तैयार रसगुल्ला खिलाते हैं।

भक्त लेखक ब्रजनाथ बडजेना अपनी रचना अंबिका विलास में, अभिमन्यू सामंत सिंहारी ने अपनी रचना विदग्ध चिंतामणि में रसगुल्ला भोग का सुंदर वर्णन किया है। जानने वाले जानते हैं और मानने वाले यह मानते हैं कि गत 2015 के नवकलेवर के क्रम में नीलाद्रि विजय को भगवान जगन्नाथ द्वारा देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए अपने हाथों से उनको रसगुल्ला भोग निवेदित करने पर उसे यादगार दिवस के रुप में उस दिन को ओडिशा के रसगुल्ला दिवस के रुप में घोषित किया गया। आज प्रतिवर्ष ओडिशा रसगुल्ला दिवस के रुप में मनाया जाता है।

गौरतलब है कि जगन्नाथ मंदिर में कुल लगभग 205 प्रकार के सेवायतगण हैं, जिनमें भीतरछु महापात्र सेवायत ही रसगुल्ला भोग तैयार करते हैं। भीतरछु महापात्र सेवायत लक्ष्मी जी के सेवायत हैं। इसीलिए जब अधरपणा संपन्न होता है, उसके उपरांत बलभद्रजी, सुभद्राजी तथा सुदर्शनजी को रत्नवेदी पर आरुढ कराने की अनुमति लक्ष्मी जी प्रदान कर देती हैं लेकिन जब जगन्नाथ जी उनको अपने हाथों से रसगुल्ला भोग निवेदित करते हैं। तब प्रसन्न होकर देवी लक्ष्मी जी उनको रत्नवेदी पर आरुढ होने की अनुमति प्रदान करती हैं।

लगभग एक हजार वर्ष से पुरी बड ओडिया मठ, उत्तर पार्श्व मठ, नेवलदास मठ, राधावल्लव मठ, राधेश्याम मठ और कटकी मठ आदि में रसगुल्ला तैयार किया जाता है। नीलाद्रि विजय के समय रसगुल्ला तैयार करने को ओडिशा में पवित्र कार्य माना जाता है। ओडिशा के पुरी, कटक, नयागढ, भुवनेश्वर और भुवनेश्वर-कटक राजमार्ग के समीप पहल में बहुतायत मात्रा में रसगुल्ला तैयार कर उसे बेचा जाता है। सच कहा जाय तो एक तरफ पुरी जगन्नाथ मंदिर में नीलाद्रि विजय के दिन भगवान जगन्नाथ द्वारा देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए अपने हाथों से उनको रसगुल्ला भोग निवेदित करने का इंतजार दूरदर्शन और अन्य टेलीविजन माध्यम से सीधे प्रसारण का होगा वहीं समस्त जगन्नाथ भक्तों को भी उस दिन रसगुल्ला भोग ग्रहण करने तथा अपनी-अपनी भार्या को प्रसन्न रखने का इंतजार रहेगा। 

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