पूछताछ की जरूरत हो तो नहीं मिल सकती अग्रिम जमानत

नई दिल्ली [विनीत त्रिपाठी]। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अग्रिम जमानत उस स्थिति में दी जा सकती है जहां ऐसे रिकॉर्ड पेश किए जाएं कि अभियोजन पक्ष संदेह में हो या फिर गलत तरीके से फंसाने के सुबूत पेश किए गए हों। लेकिन जहां पर आपराधिक तत्व मौजूद हों और वारदात के तरीकों को पता लगाने के लिए, दस्तावेजों को बरामद करने और अन्य पहलुओं को उजागर करने के लिए आरोपित को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की जरूरत हो वहां अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। न्यायमूर्ति चंद्रशेखर ने उक्त टिप्पणी करते हुए धोखाधड़ी, षड्यंत्र रचने समेत अन्य धाराओं में आरोपित की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

पीठ ने कहा कि यह स्थापित कानून है कि अग्रिम जमानत याचिका देने के दौरान अदालत को प्राथमिक तौर पर वारदात की गंभीरता और आरोपित की भूमिका का गहनता से परीक्षण करने की जरूरत होती है। पीठ ने कहा कि इस मामले में आरोपित श्याम सुंदर व उसके साथियों ने उच्च अधिकारी बताकर धोखाधड़ी की और जांच के दौरान उन्होंने तथ्यों को छिपाने की भी कोशिश की। इतना ही नहीं आरोपित ने जांच में भी सहयोग नहीं किया। पीठ ने कहा कि मामले की जांच अभी प्रारंभिक दौर में है और तथ्यों का पता लगाने के लिए आरोपित को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की जरूरत है। वारदात की गंभीरता और आरोपित की भूमिका को ध्यान में रखते हुए पीठ अग्रिम जमानत याचिका खारिज करती है।

याचिका के अनुसार, आरोपित ने उत्तर प्रदेश के लखनऊ में भूमि दिलाने के नाम पर शिकायतकर्ता के साथ धोखाधड़ी की थी। इसकी सीआर पार्क थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। 25 जुलाई को साकेत कोर्ट से अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद आरोपित श्याम सुंदर ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। उधर, आरोपित के अधिवक्ता ने कहा कि उनके मुवक्किल पर लगे आरोप बेबुनियाद हैं। उनके पास से कोई दस्तावेज बरामद नहीं हुए हैं और जब भी जरूरत होगी जांच में शामिल होंगे।

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