कामकाज की संस्कृति में परिवर्तन का समय, मुफीद लग रहा हाइब्रिड वर्किग माडल

कोरोना काल में कामकाज के कई नए मानक बने हैं तो कई मानक बदल भी गए हैं। आनलाइन कामकाज से लेकर काम करने के हाइब्रिड माडल की भी चर्चा होने लगी है। इसके तहत कर्मचारी कुछ दिन घर से आनलाइन और कुछ दिन दफ्तर आकर काम कर सकते हैं।

Sanjay PokhriyalTue, 28 Sep 2021 10:30 AM (IST)
भारत में भी पश्चिमी देशों की तरह कामकाज और जीवनशैली में संतुलन बिठाने वाली कार्यसंस्कृति विकसित की जानी चाहिए। फाइल

डा. संजय वर्मा। दुनिया में आए हो तो काम करो प्यारे-मालूम नहीं कि जुमलानुमा यह मशहूर गीत जाने कितने लोगों को प्रेरणा देता होगा, पर यह एक सच्चाई है कि दुनिया काम करने वालों पर टिकी है। सभी के पास भरपूर दौलत होती, ऐशोआराम की चीजें होतीं, आज और कल की कोई फिक्र नहीं होती-तो क्या पता जैसी दुनिया हम आज देख रहे हैं, उसकी वैसी सूरत कभी देखना हमारे नसीब में नहीं होता। पर इसी दुनिया का एक कायदा यह भी है कि एक जैसी जीवनशैली जीने के लिए भी कुछ लोगों को कम और कुछ लोगों को ज्यादा काम करना पड़ता है। इसके बाकायदा मिथक बन गए हैं कि जापानी बहुत ज्यादा काम करते हैं और पश्चिमी देशों के लोग काम से ज्यादा आराम को तवज्जो देते हैं।

देखा जाए तो कोरोना काल में कामकाज के कई नए मानक बने हैं तो कई मानक बदल भी गए हैं। आनलाइन कामकाज से लेकर काम करने के हाइब्रिड माडल की चर्चा होने लगी है। पर इधर कुछ तथ्य-आंकड़े ऐसे भी सामने आए हैं जो बताते हैं कि बीते 50 वर्षो में कुछ देशों के नागरिकों पर काम का बोझ बढ़ गया है, जबकि कई देश ऐसे हैं जहां कर्मचारियों को कहा जा रहा है कि आप जरा छुट्टी लीजिए और किसी पर्यटक स्थल से घूमकर आइए। हालांकि भारत जैसे देशों के नागरिकों को यह नीति अचरज भरी लग सकती है। एक आकलन बताता है कि 50 साल पहले भारतीयों को एक हफ्ते में औसतन 39 घंटे काम करना होता था, लेकिन अब वह औसत बढ़कर 45 घंटे हो चुका है। दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में तो यह औसत 60 घंटे तक पहुंच चुका है, जबकि ब्रिटेन-अमेरिका आदि विकसित देशों में कर्मचारियों से प्रति सप्ताह 34 घंटे काम करने की अपेक्षा की जाती है।

मानसिक स्वास्थ्य के लिए अवकाश : हाल के दिनों में मीडिया में कुछ इस तरह की खबरें आई हैं कि स्पोर्ट्स शूज और खेल से जुड़े अन्य सामान बनाने वाली एक प्रमुख कंपनी ने सितंबर 2021 के पहले सप्ताह को अपने कर्मचारियों के लिए मेंटल हेल्थ ब्रेक यानी मानसिक स्वास्थ्य के लिए अवकाश के रूप में घोषित किया है। इस कंपनी ने पूरी दुनिया में अपने सभी कर्मचारियों को एक हफ्ते की छुट्टी-पावरिंग डाउन-की संज्ञा देते हुए दी और कहा कि इसके बाद जब वे काम पर लौटें तो सप्ताह में तीन दिन ही दफ्तर आएं। ऐसा नहीं है कि हफ्ते के बाकी दिन इसके दफ्तरों में कामकाज नहीं होगा। बल्कि इसके लिए एक नया रोस्टर (समय सारिणी) बनाई जाएगी और कर्मचारी तीन दिन दफ्तर आने के बाद घर से काम कर सकेंगे। काम के बोझ से निजात दिलाने और कर्मचारियों को छुट्टी देने के ऐसे कई और उदाहरण हाल में मिले हैं।

इससे पहले अंतरराष्ट्रीय निवेश बैंक सिटीग्रुप ने मार्च में घोषणा की थी कि प्रत्येक शुक्रवार को वीडियो काल के जरिये किसी भी कर्मचारी को काम करने की जरूरत नहीं है। इस घोषणा का मकसद कर्मचारियों को कोरोना काल में आनलाइन और खास तौर से वीडियो काल के कारण हो रही थकान से राहत दिलाना था। यही नहीं, सिटी बैंक ने इसी वर्ष 28 मई को-रेस्ट डे-घोषित किया था, जिसमें कर्मचारियों को काम से छुट्टी दी गई थी। निजी कंपनियां ही नहीं, दुनिया के कुछ देश अपने सरकारी कर्मचारियों के काम के घंटे कम करने और उन्हें छुट्टी पर भेजने जैसे उपायों को आजमा रहे हैं। जैसे आइसलैंड की एक काउंसिल ने इस साल एक रिपोर्ट देकर बताया है कि वहां वर्ष 2015 से 2019 के बीच करीब ढाई हजार कर्मचारियों से हफ्ते में सिर्फ चार दिन काम कराने का एक ट्रायल कराया गया तो उसके उत्साहजनक नतीजे मिले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इन पांच वर्षो में उत्पादकता में उल्लेखनीय इजाफा हुआ।

कामकाज का हाइब्रिड मोड : अगर हम इस सवाल का जवाब खोजें कि कामकाज से कुछ वक्त के लिए छुट्टी देने और पहले के मुकाबले कम काम करने देने के इन आह्वानों की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है तो इसकी वजहें समझ में आती हैं। जैसे कोरोना काल में जब अर्थव्यवस्थाओं पर बेतहाशा दबाव बना हुआ है और कोविड महामारी के कारण लोगों को घर से बाहर जाने में अभी भी मुश्किलें कायम हैं तो वे उपाय जरूरी लगते हैं कि अकेले काम करने से ऊब रहे और हताशा का अनुभव कर रहे कर्मचारियों को कुछ राहत दी जाए। इसके लिए कई कंपनियों ने कामकाज की नई शैली के रूप में हाइब्रिड वर्किंग की छूट देने की बात कही है। इसके तहत कर्मचारी कुछ दिन घर से आनलाइन और कुछ दिन दफ्तर आकर काम कर सकते हैं।

कई आइटी कंपनियां अब इसी माडल पर काम कर रही हैं। इन कंपनियों ने अपने-अपने अध्ययनों में पाया है कि काम का हाइब्रिड मोड प्रदान करने से कर्मचारियों में काम के प्रति उत्साह बढ़ा है। खास तौर से कोरोना काल में संक्रमण की चपेट में आने से बचाव के तौर पर जब कर्मचारियों को घर बैठे काम (वर्क फ्राम होम) की छूट दी गई तो उन्होंने पाया कि कर्मचारियों ने तमाम चुनौतियों के बावजूद अपना काम समय पर निपटाया और ज्यादा काम किया। इसी साल भारत में एक निजी बीमा कंपनी ने अपने एक सर्वेक्षण में पाया कि देश के ज्यादातर बड़े शहरों के कर्मचारी घर से काम यानी वर्क फ्राम होम से ज्यादा संतुष्ट हैं। इस सर्वेक्षण ने जिस उल्लेखनीय तथ्य की ओर इशारा किया, वह उत्पादकता (आउटपुट) में बढ़ोतरी से संबंधित ही था।

आंकड़ों से यह तथ्य पता चला कि 70 फीसद से ज्यादा लोगों ने माना कि वर्क फ्राम होम या हाइब्रिड वर्किंग माडल अपनाने से उनकी उत्पादकता या तो बढ़ गई या समान रही। इस सर्वेक्षण में महानगरों के केवल चार फीसद कर्मचारियों ने कामकाज की नई शैलियों से एतराज जताया था। यह सर्वेक्षण विविध तरह के कामकाज से जुड़े लोगों पर किया गया था। जैसे इसमें सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी), वित्तीय सेवाओं, दूरसंचार, ई-कामर्स और उपभोक्ता वस्तुओं जैसे विविध उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारियों पर शोध किया गया था। इसके दो संकेत निकलते हैं। एक यह कि यदि कर्मचारियों को कामकाज का हाइब्रिड माडल वाला विकल्प दिया जाता है तो उनकी उत्पादकता बढ़ जाती है। दूसरा संकेत यह है कि इससे कंपनियों को न सिर्फ कर्मचारियों की बढ़ी उत्पादकता का फायदा मिलता है, बल्कि महंगी व्यावसायिक जगहों पर अपना कार्यालय बनाने-चलाने में हो रहे खर्च में कटौती का भी लाभ मिलता है।

यह सही है कि कंपनियां हर चीज को अपनी बैलेंसशीट के मानकों से देखती हैं। आज अगर उन्हें हाइब्रिड वर्किंग माडल मुफीद लग रहा है तो इसकी बड़ी वजह कर्मचारियों की मानसिक शांति से ज्यादा कंपनियों को होने वाला आर्थिक फायदा है। चीन में अलीबाबा के संस्थापक जैक मा तो यहां तक कह चुके हैं कि कर्मचारियों को हर दिन सुबह नौ बजे से रात नौ बजे तक काम करने की जरूरत है और पांच कार्यदिवसों वाली परंपरा फिजूल है। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या हाइब्रिड वìकग माडल अपनाने और उत्पादकता बढ़ने से कर्मचारियों को इससे कुछ ठोस हासिल हो रहा है।

असल में कर्मचारी इसकी शिकायत करने लगे हैं कि दफ्तर के बजाय घर से ज्यादा काम करने के बाद उन्हें बहुत-सा काम वीडियो काल के जरिये भी निपटाना पड़ता है। एक बीमा कंपनी के सर्वेक्षण में शामिल 26 फीसद कर्मचारियों ने बहुत अधिक वीडियो काल्स को लेकर अपनी झुंझलाहट व्यक्त की थी। इसके अलावा घर में आनलाइन कामकाज के लिए जगह की कमी होने से कुछ लोगों में असंतोष भी दर्ज किया गया। इस कारण 60 फीसद कर्मचारियों ने यह आशंका जताई थी कि कहीं वर्क फ्राम होम की शैली वाले काम को उनके नाकारा होने का प्रमाण न मान लिया जाए और इस आधार पर उनकी नौकरी न छीन ली जाए। इन आशंकाओं के बावजूद 52 फीसद लोगों ने कहा था कि अगर नौकरी सुरक्षित है और छुट्टियों में कटौती नहीं की जाती है तो वे कामकाज का हाइब्रिड मोड ही चुनेंगे।

सवाल है कि आखिर कामकाज से कुछ दिनों की छुट्टी देने यानी भारत-चीन जैसे देशों में भी क्या पश्चिमी देशों की तरह कामकाज और जीवनशैली में संतुलन बिठाने वाली कार्यसंस्कृति विकसित नहीं हो सकती है। इसको लेकर अक्सर कुछ भ्रामक स्थापनाएं मिलती हैं।

असल में हमारे देश में जो बातें इस तरह की कार्यसंस्कृति के विरोध में जाती हैं, उनमें एक है कि भारतीय आदतन आसली होते हैं। सरकारी कर्मचारियों पर तो यह तोहमत अर्से से मढ़ी जाती रही है और उन्हें कसने के लिए बायोमीटिक उपस्थिति और सालाना अप्रेजल जैसे उन उपायों तक को अब आजमाया जा रहा है, जो पहले निजी सेक्टर की चीज हुआ करते थे। इसके बावजूद सरकारी महकमों में बाबू को उसकी कुर्सी पर मौजूद और काम करते हुए पाना बहुत ही दुर्लभ है। शायद यही वजह है कि आज से चार साल पहले 2017 में आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने इंडियन चैंबर आफ कामर्स में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि भारत के लोग चीनियों की तुलना में आलसी हैं। हालांकि इसके पीछे उन्होंने भौगोलिक या कहें कि जलवायु के कारणों को जिम्मेदार ठहराया था और भारत को सबसे ज्यादा स्थिर देश बताते हुए धार्मिक सहनशीलता आदि पैमानों पर इसकी तारीफ की थी, लेकिन जीवनशैली और कार्यसंस्कृति के जिस पहलू की तरफ उन्होंने भारतीयों को आलसी बताते हुए संकेत किया, उसे एक बड़ा सवाल माना गया था।

लेटलतीफी और कामचोरी के इस भारतीय रवैये का ही नतीजा है कि जो ग्लोबल कंपनियां पश्चिम में अपने कर्मचारियों को जबरन छुट्टी पर भेजने तक का उपाय आजमाती हैं, भारत में वही कायदे लागू करते हुए उन्हें पसीना छूटने लगता है। मुमकिन है कि ऐसी धारणा बनने के पीछे ज्यादातर भूमिका कुछ नाकारा सरकारी कर्मचारियों की हो, लेकिन उसका परिणाम कर्मठ सरकारी कर्मचारियों से लेकर निजी क्षेत्र के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। जाहिर है कि अगर भारतीयों को आज की तारीख में पहले के मुकाबले ज्यादा काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है तो इसके पीछे इसी किस्म की धारणाओं की एक बड़ी भूमिका है।

[एसोसिएट प्रोफेसर, बेनेट यूनिवर्सिटी]

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