जब महज 11 साल की उम्र में जुड़ गईं थीं भारत छोड़ो आंदोलन से ये वीरांगना, जानें फिर क्यों कहलाईं ओडिशा की मदर टेरेसा

साहसी बाला पार्वती गिरि अपनी आखिरी सांस तक देशसेवा करती रहीं। उन्होंने 17 अगस्त 1995 को आखिरी सांस ली। पार्वती गिरि के सम्मान में सरकार ने 2016 में मेगा लिफ्ट सिंचाई योजना का नाम पार्वती गिरि रखा।

Sanjay PokhriyalSun, 05 Dec 2021 10:26 AM (IST)
जीवनपर्यंत समाज सुधार के कार्य करती रहीं। इसीलिए उन्हें 'ओडिशा की मदर टेरेसा' भी कहा जाता है।

नई दिल्ली, फीचर डेस्क। भारत को गुलामी की बेडिय़ों से आजादी दिलाने में उन बच्चों व किशोरों का भी बड़ा योगदान है, जिन्होंने आजादी के आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और जेल गए। इनमें से एक थीं स्वतंत्रता सेनानी पार्वती गिरि, जिन्होंने न सिर्फ भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई, बल्कि जीवनपर्यंत समाज सुधार के कार्य करती रहीं। इसीलिए उन्हें 'ओडिशा की मदर टेरेसा' भी कहा जाता है।

स्वतंत्रता सेनानी पार्वती गिरि का जन्म ओडिशा के बरगढ़ के गांव समालेइपदार में 19 जनवरी, 1926 को हुआ था। इनके पिता धनंजय गिरि और चाचा व कांग्रेस नेता रामचंद्र गिरि स्वतंत्रता सेनानी थे। इस तरह घर में ही नन्ही पार्वती में देशप्रेम के संस्कार पड़े और स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों के घर आने-जाने से उनमें क्रांति का जज्बा पैदा हुआ। उस समय वह देश में आजादी को लेकर बैठकों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। पार्वती गिरि जब 11 साल की हुईं, उसी समय उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया, क्योंकि वह देश को आजाद कराना चाहती थीं।

स्कूल छोड़कर वह गांधी जी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन का हिस्सा बन गईं। उन्होंने अपनी गतिविधियों से मात्र 16 साल की आयु में ही ब्रिटिश हुकूमत की नाक में दम कर दिया था। उन्हें ब्रिटिश सरकार विरोधी गतिविधियों और बरगढ़ की अदालत में सरकार विरोधी नारे लगाने की वजह से दो साल तक कारावास में रखा गया, लेकिन नाबालिग होने की वजह से बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। इसके बाद पार्वती ने वर्ष 1942 के बाद से बड़े पैमाने पर पूरे देश में 'भारत छोड़ो' आंदोलन के लिए अभियान चलाया।

वह गांव-गांव जाकर भारत छोड़ो, गांधी दर्शन, उनके खादी और स्वदेशी आंदोलन आदि का प्रचार करती रहीं। देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पार्वती ने राष्ट्र सेवा को ही अपना ध्येय बना लिया। उन्होंने अपना जीवन गांव के अनाथ बच्चों को अच्छा जीवन देने के लिए समर्पित कर दिया। 1950 में इलाहाबाद के प्रयाग महिला विद्यापीठ से उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की। चार साल बाद वह रमा देवी के साथ जुड़ कर सामाजिक कार्य करने लगीं।

1955 में संबलपुर जिले के लोगों के स्वास्थ्य और स्वच्छता में सुधार के लिए वह बड़ी परियोजना से जुड़ीं। उन्होंने नृसिंहनाथ में अनाथालय खोलकर अनाथ बच्चों व महिलाओं को आश्रय दिलाया। उन्होंने बीरासिंह गढ़ में एक और आश्रम खोला। वहीं स्वतंत्रता सेनानी रमादेवी चौधरी के साथ, पार्वती 1951 में कोरापुट में अकाल पीडि़तों को राहत देने के लिए गांव-गांव घूमीं। उन्होंने ओडिशा के जेलों की स्थिति सुधारने का भी काम किया। वे अपनी आखिरी सांस तक देशसेवा करती रहीं। उन्होंने 17 अगस्त, 1995 को आखिरी सांस ली। पार्वती गिरि के सम्मान में सरकार ने 2016 में मेगा लिफ्ट सिंचाई योजना का नाम पार्वती गिरि रखा।

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