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Independence Day 2020: संन्यासी विद्रोह से गूंजा था वंदे मातरम् जिसके नायक थे किसान और पीड़ित सैनिक

Independence Day 2020: संन्यासी विद्रोह से गूंजा था वंदे मातरम् जिसके नायक थे किसान और पीड़ित सैनिक
Publish Date:Sat, 15 Aug 2020 07:10 AM (IST) Author: Sanjay Pokhriyal

दिनेश पाठक। ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में दो उद्देश्यों को प्रमुख रखा था, पहला, भारत की बहुमूल्य संपदा का व्यापारिक शोषण और दूसरा, येन-केन प्रकारेण साम्राज्य का विस्तार। इनकी प्राप्ति के लिए जो शोषणपूर्ण नीतियां अपनाई गईं, उनसे राजा, सैनिक, जमींदार, कृषक और यहां तक कि साधु-संतों तक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था। उनका धर्म, मान, जीवन व संपत्ति सब खतरे में थे।

वर्ष 1857 में अंग्रेजों द्वारा घोषित तथाकथित गदर के पहले के वर्षों में कंपनी की दमनकारी नीतियों से त्रस्त होकर अंग्रेजों की सामाजिक एवं आर्थिक नीतियों के विरुद्ध अनेक सैनिक और असैनिक आंदोलन, विद्रोह और विपल्व हुए। वर्ष 1763 में बंगाल और बिहार में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष शुरू हो चुका था। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना अपना धर्म मानते हुए बंगाल के साधुओं ने भी जनता के साथ एकजुट होकर कंपनी के सैनिकों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर कोषागारों को लूटना प्रारंभ कर दिया।

विद्रोही हो गए अन्नदाता: प्लासी और बक्सर के युद्ध में ब्रिटिश पूंजीवादियों की विजय के बाद से ही हम इतिहास में किसानों और कारीगरों को भी इन विदेशी लुटेरों और उनके समर्थक जमीदारों तथा साहूकारों से संघर्ष करते पाते हैं। उनका पहला विद्रोह इतिहास में संन्यासी विद्रोह के नाम से मशहूर है। यह विद्रोह वर्ष 1763 में बंगाल और बिहार में शुरू हुआ और वर्ष 1800 तक चलता रहा। ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने इस विद्रोह को संन्यासी विद्रोह नाम दिया था और इसे हिंदुस्तान के यायावरों का पेशेवर उपद्रव और डकैती बताया था। कई दूसरे इतिहासकारों ने भी वॉरेन हेस्टिंग्स के इस कथन के साथ सहमति दर्शाई है लेकिन सरकारी दस्तावेजों की पड़ताल करने से पता चलता है कि यह ब्रिटिश पूंजीवादियों और हिंदुस्तानी जमींदारों के खिलाफ किसानों का विद्रोह था। विद्रोही सेना और इसके नेता जहां भी गए, किसानों ने उनका स्वागत किया, सहायता की और विद्रोही सेना में शामिल होकर उनकी शक्ति भी बढ़ाई।

देश की आजादी बना धर्म: भारतीय सरकारी इतिहास और गजेटियर के रचयिता सर विलियम हंटर ने लिखा है, ‘संन्यासी विद्रोह दरअसल किसान विद्रोह ही था। ये विद्रोही कोई और नहीं बल्कि बेकारी और भूख से पीड़ित मुगल साम्राज्य की सेना के सैनिक व भूमिहीन, गरीब किसान थे।’ उन्होंने यह भी लिखा कि ‘वे जीवन-यापन के लिए इस एकमात्र शेष उपाय का सहारा लेने को बाध्य हो गए थे और तथाकथित गृहत्यागी और सर्वत्यागी संन्यासियों के रूप में पचास- पचास के दल में देशभर में घूमते थे।’ब्रिटिश प्रशासक ओमेली भी इस बात की पुष्टि करते हुए लिखते हैं, ‘ये विद्रोही ध्वस्त सेना के सैनिक और सर्वहारा किसान थे।’ इस विद्रोह में मुख्य रूप से तीन शक्तियां शामिल थीं, पहली, बंगाल और बिहार के कारीगर और किसान, जिन्हें ब्रिटिश पूंजीवादियों ने तबाह कर दिया था। दूसरी, मुगल साम्राज्य की भंग सेना के बेकारी और भूख से पीड़ित सैनिक, जो खुद किसान परिवार से थे और तीसरे, वे संन्यासी और फकीर, जो बंगाल और बिहार में बसकर कृषि कार्य करने लगे थे। किसान इसकी मूल शक्ति थे। संन्यासियों और फकीरों ने आत्म बलिदान का आदर्श और विदेशी पूंजीवादियों से देश की स्वतंत्रता का लक्ष्य निर्धारित किया। लेस्टर हचिंसन नामक इतिहासकार ने लिखा है, ‘संन्यासियों ने किसानों के अर्थनीतिक विद्रोह को धार्मिक प्रेरणा दी। उन्होंने ही शिक्षा दी कि देश मुक्त कराना सबसे बड़ा धर्म है।’

जोश से भरने वाला जयघोष: एक अन्य इतिहासकार डॉ. भूपेंद्र नाथ दत्त ने लिखा है, ‘ये संन्यासी योद्धा ‘ओम् वंदेमातरम्’ का रणनाद उद्घोष करते थे। बांग्ला के प्रसिद्ध उपन्यासकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने संन्यासी विद्रोह के आधार पर अपना अत्यधिक प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ लिखा, जिसमें उन्होंने संन्यासियों द्वारा किए जाने वाले जय उद्घोष ‘वंदे मातरम्’ के आधार पर ही पूर्ण गीत की रचना की जिसे भारत के राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता दी गई। आज भी यह गीत लोगों को मातृभूमि के प्रति जोश से भरकर प्राण न्योछावर करने की प्रेरणा देता है।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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