स्‍टैचू ऑफ यूनिटी के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है वडोदरा, यहां हैं देखने लायक कई और जगह

[डॉ. कायनात काजी]। दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के पास होने के कारण गुजरात का वडोदरा शहर इन दिनों काफी चर्चा में है। इसका पुराना नाम बड़ौदा है। गायकवाड़ राजघराने ने इस शहर को भव्य स्वरूप दिया। अपने अनूठे गरबा नृत्य के कारण इसकी विदेश में भी पहचान है। इस शहर को सांस्कृतिक राजधानी क्यों कहा जाता है, इसकी असली वजह आप तभी जान सकेंगे, जब इस शहर को करीब से देखेंगे। कितना कुछ है यहां। कुदरत की कलाकारी, सुंदर भव्य ऐतिहासिक इमारतें, गरबा नृत्य की अनूठी प्रस्तुतियां, जिन्हें देखने के लिए नवरात्र पर देश व दुनिया से बड़ी संख्या में लोग आते हैं।

वडोदरा कई मायनों में खास है। इन दिनों यह शहर ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के कारण खास आकर्षण का केंद्र है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह मूर्ति भविष्य में भारतीय पर्यटन को नया आयाम देगी। आज चलते हैं वडोदरा के रोचक सफर पर...

वडोदरा एक समय गायकवाड़ राजघराने की रियासत थी। कहते हैं गायकवाड़ राजघराना अपनी रियासत के उद्धार के लिए बहुत सजग था। इसमें महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय का नाम सबसे पहले आता है। इस राजघराने ने वक्त की नब्ज को पहचानते हुए न सिर्फ अंग्रेजों से मित्रतापूर्वक संबंध रखे, बल्कि अपनी प्रजा के लिए भी बहुत सारे काम किए, जैसे-महिला शिक्षा, विधवा विवाह, वित्तीय सुधार, बैंक ऑफ बड़ौदा की स्थापना आदि।

यह है शहर की पहचान
लक्ष्मी विलास पैलेस को अगर वडोदरा की पहचान कहा जाए तो गलत नहीं होगा। सूर्यास्त के सुनहरे उजाले में डूबा यह भव्य महल अपने राजसी वैभव की पहचान बरकरार रखे जेहन में उभर आता है। इस शानदार पैलेस का निर्माण वर्ष 1890 में महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने करवाया था। डिजाइन बनाने की जिम्मेदारी अंग्रेज आर्किटेक्ट चार्ल्स मंट को दी गई थी। लक्ष्मी विलास पैलेस इंडो- सारसैनिक रिवाइवल आर्किटेक्चर में बनी एक ऐसी संरचना है, जिसे दुनिया के आलीशान महलों में शुमार किया जाता है। इस विशाल पैलेस की नींव 1880 में रखी गई थी और इसका निर्माण कार्य 1890 में पूरा हुआ। इस महल की संरचना में राजस्थानी, इस्लामिक और विक्टोरियन आर्किटेक्चर का अनोखा संगम देखने को मिलता है। इसलिए बाहर से देखने में इस महल के गुंबदों में कहीं मंदिर, कहीं मस्जिद, तो कहीं गुरुद्वारे के गुंबद नजर आते हैं। वहीं नजदीक ही चर्च की बुर्जनुमा संरचना भी दिखाई देती है।

दरअसल, गायकवाड़ राजवंश मूल रूप से मराठा था, इसलिए इनके द्वारा बनवाए गए भवनों में मराठी वास्तुकला के नमूने, जैसे-तोरण, झरोखे, जालियां आदि देखने को मिलते हैं। महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय इस राजवंश के सबसे प्रतापी राजा थे। उनके राज में बड़ौदा रियासत का कायाकल्प हुआ। आज यह महल अपने आप में गायकवाड़ राजवंश की बहुमूल्य वस्तुओं का संग्रहालय भी है। यहां एक दरबार हाल है, जिसमें राजा रवि वर्मा द्वारा बनाए गए बेशकीमती चित्र लगे हैं। इन चित्रों को बनाने के लिए राजा रवि वर्मा ने पूरे देश की यात्रा की थी।

गायकवाड़ वडोदरा गोल्फ क्लब
गोल्फ खेलने के शौकीनों के लिए यहां मौजूद है गायकवाड़ वडोदरा गोल्फ क्लब, जिसे महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ के पौत्र महाराजा प्रताप सिंह ने 1930 में स्थापित किया था। शुरू में यह गोल्फ कोर्स विदेशी मेहमानों के लिए ही बना था। आजादी के बाद 1990 में इसका पुनर्निर्माण करके आम लोगों के लिए खोल दिया गया। नेपथ्य में बने विशाल लक्ष्मी विलास पैलेस की आगे हरे-भरे गोल्फ कोर्स में गोल्फ का आनंद लेना आपको राजसी ठाट का एहसास देगा।

पश्चिम भारत का सबसे बड़ा पार्क
यहां एक चिड़ियाघर है, जिसे महाराजा सयाजी राव गायकवाड़ ने 1879 में आम जनता को समर्पित किया था। यह अभयारण्य राज परिवार के आखेट के लिए बनाया गया था। शहर के बीचोंबीच 113 एकड़ में फैला यह पार्क 98 प्रकार की वनस्पतियों और 167 प्रकार के जीव-जंतुओं का घर है। यह पश्चिम भारत का सबसे बड़ा पार्क है। यहां संग्रहालय, एक प्लैनेटेरियम, फ्लावर क्लॉक, टॉय ट्रेन आदि मनोरंजन के साधन जुटाए गए हैं।

यादगार नजरबाग पैलेस
गायकवाड़ राजवंश के शासन के दौरान यहां के राजसी ठाट देखते ही बनते थे। इसका एक उदाहरण हमें देखने को मिलता है नजरबाग पैलेस में, जिसे मल्हार राव गायकवाड़ ने सन 1721 में बनवाया था। कहा जाता है कि यहां राज परिवार के कीमती सामान और सोने के हथियार रखे जाते थे। यहां 125 कैरेट का विशाल हीरा भी हुआ करता था। यह भी कहा जाता है कि यहां रखी सोने की बंदूकों का वजन 100 किलोग्राम तक होता थे।

आसपास भी मनभावन
स्टैच्यू ऑफ यूनिटी वडोदरा से 89 किलोमीटर दूर नर्मदा जिले में स्थापित दुनिया की सबसे ऊंची (182 मीटर) सरदार वल्लभ भाई पटेल की इस विशालतम प्रतिमा से तीन किमी. की दूरी पर एक टेंट सिटी बनाई गई है। स्टैच्यू के नीचे एक म्यूजियम है, जहां सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी कई चीजें रखी गई हैं। लिफ्ट से स्टैच्यू की छाती तक पहुंचकर वहां से सरदार सरोवर डैम और उसके 200 किलोमीटर में फैले जलाशय को निहार सकते हैं। यहां नदी से 500 फीट ऊंचा ऑब्जर्वर डेक भी बनाया गया है, जिसमें एक ही समय में दो सौ लोग स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को देख सकते हैं। प्रतिमा सरदार सरोवर बांध से 3 किलोमीटर दूर साधु बेट, केवड़िया में स्थित है।

जरवानी फॉल्स
स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से मात्र 13 किलोमीटर की दूरी पर जरवानी फॉल्स है। यह वाटरफॉल शूलपणेश्वर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के बीच में स्थित है। यहां तक पहुंचना आसान है। आप बड़े आराम से इस वाटरफॉल तक वाहन के जरिए जा सकते हैं। यहां पर लोग पिकनिक मानने आते हैं। इस वाटरफॉल में वे नहाते भी हैं। यहीं पास ही जरवरी ईको कैंप साइट भी है। अगर आप जंगल में कैंपिंग करना चाहते हैं तो उसका आनंद भी यहां उठाया जा सकता है।

शूलपणेश्वर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी
शूलपणेश्वर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी नर्मदा जिले में पड़ने वाला एक खूबसूरत नेशनल पार्क है। बरसात के दिनों में यह पूरा इलाका हरियाली से भर जाता है। इस जंगल में बड़ी संख्या में बांस और ओक के पेड़ हैं। यहां नर्मदा नदी के किनारे कई इको टूरिस्ट कैंप साइट हैं, जहां आप जंगल में कैंपिंग का मजा ले सकते हैं। यह राजपीपला से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जंगल के बीच यहां कई नयनाभिराम झरने देखने को मिलते हैं।

सरदार सरोवर डैम
आधुनिक इंजीनियरिंग और सिंचाई तकनीक का सजीव उदाहरण है सरदार सरोवर डैम। जब स्टैच्यू ऑफ यूनिटी देखने जाएं तो सरदार सरोवर बांध भी जरूर देखें। विशाल जलाशय आपकी आंखें चुंधिया देगा। यहां कैनाल हेड पावर हाउस, रिवर बेड पावर हाउस हैं। इस डैम के कुछ हिस्सों को देखने के लिए अलग से अनुमति लेनी पड़ती है, अत: अनुमति लेकर ही जाएं। इसकी स्थापना पं. जवाहरलाल नेहरू ने1961 में नर्मदा नदी पर की थी। इसके आसपास गार्डेन बनाए गए हैं, जहां से पर्यटक इसकी खूबसूरती निहार सकते हैं। 1210 मीटर लंबा और163 मीटर की ऊंचाई वाला यह देश का तीसरा सबसे ऊंचा बांध है।

इंद्रजीत-पद्मिनी महल, राजपीपला
स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से मात्र 25 किलोमीटर की दूरी पर एक और खूबसूरत स्थल है, जिसका नाम राजपीपला है। राजपीपला कभी गुजरात का प्रिंसली स्टेट हुआ करता था, जिस पर वाडिया राज परिवार का शासन था। इस स्टेट में एक खूबसूरत पैलेस है, जिसका नाम इंद्रजीत-पद्मिनी महल है। इसे वाडिया पैलेस भी कहा जाता है। इस पैलेस का निर्माण महाराजा विजय सिंह जी ने वर्ष 1930 में कराया था। पैलेस को ‘गुजरात का ताजमहल’ भी कहा जाता है। इस पैलेस की इमारत इंडो-सारसैनिक शैली में बनी हुई है। यह पैलेस अपने बेहतरीन आर्किटेक्चर और साजो-सामान के लिए कभी बहुत मशहूर हुआ करता था। कहते हैं इसमें बर्मा टीक के लगभग 1000 वुडन दरवाजे और खिड़कियां हैं। करीब151 एकड़ में फैला हुआ यह भवन आज भी देखने लायक है। इसकी भव्यता मन मोह लेगी।

नीलकंठधाम मंदिर
वडोदरा से करीब 61 किमी. दूर पॉइचा गांव में कई एकड़ में फैला नीलकंठ मंदिर स्वामीनारायण गुरुकुल, राजकोट द्वारा बनवाया गया था। नर्मदा नदी के किनारे बना यह मंदिर अपनी विशालता के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भगवान स्वामीनारायण को समर्पित है। इस मंदिर की वास्तुकला देखने लायक है। यहां बड़े ही खूबसूरत उद्यान बने हुए हैं, जिनमें विशाल मूर्तियों के माध्यम से पौराणिक कथाओं को दर्शाया गया है। इस मंदिर परिसर में ठहरने की भी व्यवस्था है। अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस यह मंदिर श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। देश-दुनिया से हर साल हजारों लोग इस मंदिर को देखने आते हैं।

सेव उसल और टमटम का स्वाद
अहमदाबाद के माणिक चौक की तरह आपको वडोदरा में रात्रि बाजार मिलेगा। अगर आप स्ट्रीट फूड के शौकीन हैं तो यह जगह आपको बहुत पसंद आएगी। अगर आपको चटपटा खाना पसंद है तो वडोदरा में सेव उसल जरूर खाएं। इसके लिए पैलेस रोड पर आप जय महाकाली सेव उसाल पर जाएं। यहां सियाजी विश्वविद्यालय के आसपास आपको बहुत सारे खाने-पीने के स्टॉल मिल जाएंगे। यहां की पुदीने वाली चाय जरूर पीएं। वडोदरा में आपको शुद्ध गुजराती खाने तो मिलेंगे ही, साथ ही आपको महाराष्ट्र के खाने भी मिलेंगे। यहां पोहा, दाबेली, मसल पाव, मठिया आदि भी शौक से खाए जाते हैं। यहां एक कनारा कैफे भी है, जो 1954 से चल रहा है। यहां लोग बड़े चाव से कॉफी पीने आते हैं।

सुरसागर लेक
वडोदरा के लोग सुरसागर लेक को चंदन तालाब भी कहते हैं। इस लेक के ठीक मध्य में भगवान शिव की 120 फीट ऊंची मूर्ति है। इस लेक के चारों ओर बैठने के लिए उचित व्यवस्था है। यहां शाम के समय बहुत अच्छा लगता है। लोग बोटिंग करने आते हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह पसंदीदा पिकनिक स्पॉट है।

रौनक बाजार की
वडोदरा का सबसे पुराना बाजार है न्याय मंदिर, जिसे राजमाता ने बनवाया था। पूर्व में यहां न्यायालय होने के कारण इसका यह नाम पड़ा। यहां एक और प्रसिद्ध मार्केट है, जिसका नाम खांडेराव मार्केट है। कहते हैं इस बाजार में जन्म से मृत्यु तक की हर चीज मिलती है। इस मार्केट का निर्माण भी राजपरिवार ने ही करवाया था। वडोदरा में अलकापुरी बड़ा बाजार है, जहां बड़े-बड़े ब्रांड्स के स्टोर बने हुए हैं। अगर आप नवरात्र के समय वडोदरा आएंगे तो आपको मंगल बाजार में गरबा कॉस्ट्यूम के बाजार सजे मिलेंगे। यहां से आप गुजराती पारंपरिक परिधान खरीद सकते हैं। यह शहर अपनी पैठनी साड़ी के अलावा अपने प्रिंटेड फैब्रिक के लिए भी मशहूर है। सिल्क और कॉटन दोनों ही प्रकार के कपड़ों पर खास तरह की छपाई की जाती है। 

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