कोविड महामारी के दो साल के इस सफर ने ‘दीर्घायु’ के आशीर्वाद को कर दिया बेमानी

हाल में ऐसे अध्ययन सामने आए हैं जो बताते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अब दुनिया में मनुष्यों की औसत आयु में सबसे बड़ी गिरावट आ गई है। ऐसे वक्त में जब दुनिया का पूरा ध्यान कोरोना वायरस से जूझने पर केंद्रित है तब ऐसे अध्ययन मायूस करते हैं।

Sanjay PokhriyalThu, 02 Dec 2021 09:02 AM (IST)
पृथ्वी पर मौजूद हर जीव को करना पड़ता है बूढ़े होने यानी एजिंग की प्रक्रिया का सामना। फाइल

अभिषेक कुमार सिंह। हाल के दशकों में चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियों के बल पर यह भरोसा पैदा हुआ था कि इंसान का लंबी उम्र पाने का जो सपना सदियों से कायम रहा है, वह हकीकत बन सकता है, लेकिन कोविड महामारी के दो साल के इस सफर ने ‘दीर्घायु’ के आशीर्वाद को बेमानी कर दिया है। कुछ ऐसे अध्ययन हाल में सामने आए हैं, जो बताते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अब दुनिया में मनुष्यों की औसत आयु में सबसे बड़ी गिरावट आ गई है। ऐसे वक्त में जब दुनिया का सारा फोकस कोरोना वायरस से जूझने पर केंद्रित है, ऐसे अध्ययन मायूस करते हैं और जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) बढ़ाने की उन सारी कोशिशों पर सवाल खड़े करते हैं, जो अब तक जारी रही हैं।

बूढ़ा होना यानी एजिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका सामना पृथ्वी पर मौजूद हर जीव को करना पड़ता है। विज्ञान की दृष्टि में बुढ़ापा असल में कोशिकाओं के विभाजन की दर पर निर्भर है। मानव की कोशिकाएं अपनी मृत्यु से पहले औसत रूप से अधिकतम 50 बार विभाजित होती हैं। जितनी बार कोशिकाएं विभाजित होती हैं, इंसानी क्षमताओं में धीरे-धीरे उतनी ही कमी आने लगती है। बुढ़ापे का एक अन्य कारण टेलोमर्स की लंबाई घटना भी माना जाता है। टेलोमर्स असल में एक प्रकार का एंजाइम है, जो मनुष्यों की युवावस्था में प्रचुर मात्रा में बनता है। यह एंजाइम डीएनए कोशिकाओं को टूटफूट से बचाता है। तो सवाल है कि क्या कोविड महामारी ने टेलोमर्स की लंबाई घटा दी है?

जीवन प्रत्याशा दर में उठापटक : इस सवाल का जवाब संभवत: इंटरनेशनल जर्नल आफ एपिडेमियोलाजी में प्रकाशित आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ताजा अध्ययन में मिल सकते हैं, जिसमें कोविड के चलते औसत उम्र में गिरावट का दावा किया गया है। इस अध्ययन के लिए आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने वर्ष 2020-21 में हुई मौतों के आंकड़ों को आधार बनाया है। दुनियाभर में पहली दिसंबर, 2021 तक 52 लाख 23 हजार से ज्यादा लोगों की मौत कोविड-19 की वजह से हुई है। इनमें भी अमेरिका में सबसे अधिक 8.03 लाख मौतें हुई हैं। उसके बाद ब्राजील (6.14 लाख) और भारत (4.69 लाख) का नंबर आता है। अध्ययन में शामिल 29 देशों (जिनमें भारत के आंकड़े शामिल नहीं हैं, क्योंकि माना गया कि यहां कोविड-19 से हुई मौतों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कई गुना ज्यादा हो सकती है) में अलग-अलग आयु वर्ग में जीवन प्रत्याशा दर का आकलन किया गया। इसका जो निष्कर्ष सामने आया है, उससे अमेरिका में जीवन प्रत्याशा दर यानी दीर्घायु होने के आशीर्वाद को सबसे बड़ा झटका लगा है। इसकी वजह यह है कि वहां वर्ष 2020 में 60 से कम (अंडर-60) उम्र के उस समूह में जीवन प्रत्याशा सबसे ज्यादा घटी है, जो कामकाजी उम्र (वर्किग एज) मानी जाती है। अमेरिका के साथ-साथ यूरोप के अधिकतर देशों में भी इस आयु वर्ग (अंडर-60) में ज्यादा मौतें हुई हैं। इसने दुनिया में लंबी उम्र के आश्वासन पर तुषारापात कर दिया है।

वर्ष 2015 से 2020 के बीच मुत्यु दर के ट्रेंड्स को लिंग और उम्र के आधार पर विभाजित करते हुए पाया गया है कि 29 में से 27 देशों में 2020 में जीवन प्रत्याशा की दर घट गई। 2015 की तुलना में 2020 में 15 देशों में महिलाओं और 10 देशों में पुरुषों के जन्म के समय की जीवन प्रत्याशा घट गई है। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कोरोना काल की 2015 से तुलना की, क्योंकि उस समय फ्लू सीजन के दौरान दुनिया में हजारों लोगों ने जान गंवाई थी। स्पेन, इंग्लैंड, इटली, बेल्जियम समेत अन्य पश्चिमी यूरोपीय देशों में जीवन प्रत्याशा में किसी एक साल में इस तरह की गिरावट सिर्फ द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हुई थी। जीवन प्रत्याशा में यह गिरावट आखिर कितनी है, इसका अंदाजा वल्र्ड हेल्थ स्टेटिस्टिक्स की जुलाई 2021 में आई रिपोर्ट से लग जाता है। यह रिपोर्ट कहती है कि पूरी दुनिया में जीवन प्रत्याशा दर बढ़ी है। इस रिपोर्ट से यह विरोधाभासी आंकड़ा सामने आता है कि दुनिया में जन्म के समय औसत उम्र 73.3 वर्ष हो गई है, जबकि आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसार स्वस्थ जीवन प्रत्याशा 63.7 वर्ष है। यहां पूछा जा सकता है कि आक्सफोर्ड के अध्ययन और वल्र्ड हेल्थ स्टेटिस्टिक्स की रिपोर्ट में विरोधाभास क्यों है? एक अध्ययन जीवन प्रत्याशा में गिरावट दर्शा रहा है, तो दूसरी रिपोर्ट इसमें बढ़ोतरी बता रही है। इसकी असल वजह यह है कि वल्र्ड हेल्थ स्टेटिस्टिक्स की रिपोर्ट में वर्ष 2020 में हुई मौतों के आंकड़े शामिल नहीं हैं, जिस दौरान पूरी दुनिया में कोविड-19 का तांडव मचा हुआ था।

जी जाएं 140 साल : दीर्घायु होने के स्वप्न या जीवन प्रत्याशा बढ़ाने की कोशिशों पर भले ही ग्रहण लग गया हो, लेकिन दुनिया में ऐसे आविष्कारों पर काम चल रहा है, जो यह भरोसा पैदा करते हैं कि इंसान अमर तो नहीं हो सकता, लेकिन 120 या 140 साल तक जीने का इंतजाम चिकित्सा विज्ञान की बदौलत कर सकता है। जैसे एक प्रयोग अमेरिकी लेखक रे कुर्जवील रोजाना दो दर्जन गोलियों (टैबलेट्स) का सेवन करते हुए खुद पर आजमा रहे हैं। उन्हें कोई बीमारी नहीं है, पर वे भविष्य का एक सपना देख रहे हैं जिसे साकार करने के लिए वे दवा की इतनी गोलियां रोजाना खाते हैं। उनका मानना है कि अब साइंस की मदद से इंसान की उम्र बढ़ाई जा सकती है। वैसे तो उनका सपना खुद को अमर करने का है, पर यदि अमर नहीं हो सके तो भी 120 या 140 साल की उम्र तक वह जीना चाहते हैं। इससे वे साबित कर सकेंगे कि कम से कम सौ साल तक मनुष्य के जीवित रखने की संभावना को सच में बदलना मुश्किल नहीं है। साइंस जिस तरह से अमरता का सपना पाले हुए है, उसे देखकर यह संभावना अब ज्यादा दूर नहीं लगती कि इंसान की औसत आयु में 15 या 20 साल का और इजाफा हो सकता है और वह सौ के पार जाकर भी सक्रिय जीवन जी सकता है। इस संबध में कुछ अन्य प्रयोगों का उल्लेख जरूरी है। जैसे वर्ष 2015 में इसी तरह एक खोजबीन में विज्ञानियों को जेलीफिश परिवार के एक सदस्य हाइड्रा नामक जीव में ऐसे संकेत मिले थे जिन्हें अमरत्व की अवधारणा के करीब माना जाता है। अमेरिका के पामोना कालेज के एक शोधकर्ता डेनियल मार्टिनेज ने बताया था कि यह जीव बढ़ती उम्र को मात देने में सक्षम पाया गया है। लगभग एक सेंटीमीटर लंबे हाइड्रा में यह खूबी पाई गई कि वह खुद को नए स्टेम सेल से लगातार बदलते रहता है। यानी उसके शरीर से पुरानी कोशिकाएं खुद ही हटती जाती हैं और नई कोशिकाएं उनका स्थान लेती रहती हैं। इससे हाइड्रा का शरीर एकदम नया बना रहता है।

आखिर कब होगा करिश्मा : विज्ञानी मनुष्यों की उम्र बढ़ाने के संबंध में सपने तो बड़े-बड़े दिखा रहे हैं, लेकिन प्रश्न है कि आखिर कब ऐसा होना संभव हो पाएगा। छह वर्ष पूर्व (दिसंबर, 2015 में) दिल्ली में एक कार्यक्रम में शामिल हुए जानेमाने विज्ञानी डा. एब्रे डि ग्रे (सेंस रिसर्च फाउंडेशन के चीफ साइंस आफिसर) ने भी इस बारे में एक अनुमान लगाने की कोशिश की थी। उन्होंने इसकी पूरी उम्मीद जगाई थी कि अगले 15 वर्षो में यह करिश्मा करना संभव हो सकता है जब इंसान कम से कम सौ साल तो जीए ही। हो सकता है कि अब तारीख में कोई परिवर्तन हो जाए, क्योंकि एलान के वक्त कोरोना वायरस के प्रकोप का कोई अनुमान नहीं था। एजिंग यानी बढ़ती उम्र रोकने वाली दवाओं के अनुसंधान पर काम कर रहे डा. ग्रे के मतानुसार कोशिकाओं के क्षरण को रोक कर और शरीर में मौजूद अणुओं की चाल पलट कर बढ़ती उम्र यानी एजिंग को कुछ हद तक थामा जा सकता है। चूंकि अब साइंस यह काम करने के करीब है, लिहाजा सौ साल की जिंदगी को एक आम बात बनाना मुमकिन है।

ध्यान रहे कि आज से सौ या पचास पहले इंसान की औसत आयु कोई खास नहीं थी। पचास साल की उम्र के बाद लोग बूढ़े लगने लगते थे और जल्द ही मृत्यु को प्राप्त होते थे। पर बीते पांच-छह दशकों में ही पूरी दुनिया में औसत उम्र बढ़ चुकी है। निश्चय ही यह बात हर कोई जानना चाहेगा कि साइंस ने वह कौन सा चमत्कार किया है कि इंसान की औसत उम्र में सहसा बढ़ोतरी होती लग रही है। विज्ञानियों के मुताबिक उम्दा खानपान और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं का इसमें बड़ा रोल है। पर इससे भी बड़ी बात है वृद्धावस्था में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखना और दिमाग, मांसपेशियों, जोड़ों, इम्यून सिस्टम, फेफड़ों और दिल में होने वाले बदलावों पर अंकुश लगाना, क्योंकि इन्हीं से बढ़ती उम्र पर काबू पाया जा सकता है।

उम्र बढ़ाने के सिलसिले में शोध कर रहे विज्ञानियों का कहना है कि अगर नियंत्रित तरीके से कुछ समय का उपवास रखा जाए तो इससे न सिर्फ बढ़ते वजन को घटाया जा सकता है, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी कई अन्य फायदे भी हो सकते हैं। खास तौर से इससे उम्र बढ़ाना भी संभव है। इस हिसाब से मनुष्य एक सौ बीस वर्ष की उम्र पा सकता है।

दुनिया में 1930 से ही एक ऐसे प्रयोग के बारे में लोगों को बताया जाता रहा है, जिसके तहत कम कैलोरी पर पल रहे चूहे उन चूहों की तुलना में ज्यादा दिन तक जिंदा रहे जिन्हें पौष्टिकता से भरपूर भोजन दिया गया था। यह बात आज भी कई शोध साबित कर रहे हैं। जैसे यूनिवर्सिटी कालेज लंदन स्थित इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ एजिंग से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक डा. मैथ्यू पाइपर का कहना है कि आहार पर नियंत्रण जीवन को लंबा करने का एक असरदार तरीका है। डा. पाइपर के मुताबिक यदि आप किसी चूहे के आहार में 40 प्रतिशत की कमी कर दें तो वह 20 या 30 प्रतिशत ज्यादा जीवित रहेगा।

दरअसल उपवास के दौरान शरीर में एक खास किस्म के हार्मोन के असर को विज्ञानियों ने दर्ज किया है। प्रयोग के दौरान आनुवंशिक रूप से संवर्धित चूहों को जब खाना देना बंद कर दिया गया तो उनमें आइजीएफ-1 नामक हार्मोन के स्तर में कमी आने लगी। शरीर की बढ़ोतरी में कारगर यह हार्मोन ऐसी स्थिति में शरीर में आ रही कमियों और टूटफूट की मरम्मत करने लग गया। अर्थात जैसे ही आइजीएफ-1 नामक हार्मोन का स्तर कम होता है तो इसका असर जीवों के शरीर पर होता है और मरम्मत करने वाले कई जीन इसमें सक्रिय हो जाते हैं।

[संस्था-एफआइएस ग्लोबल से संबद्ध]

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