जेलों की दशा में हो समग्र सुधार, खुली जेलों के सकारात्मक परिणाम

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बीते दिनों आल इंडिया डीजीपी-आइजी कांफ्रेंस में आपराधिक समस्याओं के अलावा जेलों के भीतर सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर चर्चा की गई। गृहमंत्री अमित शाह ने सभी शीर्ष अधिकारियों को कानून व्यवस्था में सुधार लाने के सुझाव दिए।

Sanjay PokhriyalSat, 27 Nov 2021 09:12 AM (IST)
अपराध पर रोक के लिए जेल को सुधार गृह के रूप में विकसित किए जाएं। प्रतीकात्मक

शिवांशु राय। महज सप्ताह भर पूर्व लखनऊ में आयोजित शीर्ष पुलिस अधिकारियों के एक सम्मलेन को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जेल सुधार को समय की जरूरत बताते हुए इस दिशा में समग्र रणनीति बनाने पर जोर दिया। यह टिप्पणी तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब बीते वर्षो के दौरान अनेक प्रदेशों में जेलों में लगातार हो रही हिंसा और हत्या की घटनाओं से कैदियों की स्थिति से एवं बीते दिनों कोरोना संक्रमण से उपजी समस्याओं से जेल सुधार का मुद्दा समय समय पर उठता रहा है। यह एक ऐसा विषय रहा है जिस पर आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी समय समय पर विभिन्न कमेटियों, प्रशासकों, विशेषज्ञों आदि के विचारों और सुझावों पर ठोस रूप में अमल नहीं हो पाया है और न ही जेलों में कैदियों की भीड़ और उनके प्रति व्यवहार में कोई खास तब्दीली आई है।

आंकड़े बताते हैं कि जेलों का हाल बहुत ही खराब होता जा रहा है। उनमें कैदी नारकीय जीवन जी रहे हैं। आए दिन विभिन्न जेलों से कैदियों के संदिग्ध स्थिति में मरने, उनके हंगामा मचाने और भागने तक की खबरें आती रहती हैं। वर्ष 2019 के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों को देखें तो उसके मुताबिक बीते तीन साल में देश में जेलों की संख्या 1361 से घटकर 1350 रह गई, लेकिन कैदियों की संख्या 4.50 लाख से बढ़कर 4.78 लाख हो चुकी थी। वर्ष 2019 में इन जेलों में 4.03 लाख कैदियों को ही रखने की क्षमता थी, इसमें क्षमता की अपेक्षा 118.5 प्रतिशत कैदी रखे जा रहे हैं। इसी रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि दिल्ली की जेलों में क्षमता से 174.9 प्रतिशत अधिक कैदी थे और यह देश में सर्वाधिक था। उत्तर प्रदेश में 167.9 प्रतिशत और उत्तराखंड में 159 प्रतिशत कैदी जेलों की क्षमता से अधिक थे।

क्यों जरूरी सुधार : इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2020 के अध्ययन में यह बात सामने निकल कर आई कि भारत की जेलों में बंद 69 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैं यानी भारत की जेलों में बंद हर 10 में से सात कैदी अंडरट्रायल हैं। यानी ये वो बंदी हैं जिन्हें अदालत से सजा नहीं मिली है, लेकिन वो जेल में बंद हैं। ये कैदी ट्रायल प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं। हो सकता है कि इनमें से कई कैदी निदरेष भी हों, साथ ही बहुत से कैदी ऐसे भी हो सकते हैं, जो अपने ऊपर लगे आरोप के लिए संभावित सजा की अधिकतम अवधि से अधिक समय जेल में बिता चुके हों, लेकिन महंगी एवं धीमी न्यायिक प्रक्रिया, जरूरी संसाधनों की कमी की वजह से इन्हें अपनी जिंदगी जेल में गुजारनी पड़ रही है।

भारतीय जेलों में जरूरत से ज्यादा कैदियों की भीड़ अन्य बहुत सी समस्याएं खड़ी कर देती हैं। परिस्थितिजन्य कारणों से आए दिन उनके बीच लड़ाई-झगड़े भी होते हैं, जिससे जेलों में आपराधिक गतिविधियां, साठगांठ एवं कट्टरता भी चरम पर रहती है। विभिन्न जेलों से कैदियों के संदिग्ध स्थितियों में मरने, उनके हंगामा मचाने और भागने की खबरें भी आती रहती हैं। जेल अधिकारियों और कर्मचारियों का उत्पीड़न भरा व्यवहार भी कई बार ऐसी घटनाओं का कारण बनता है। इसी के साथ पर्याप्त बुनियादी ढांचागत सुविधाओं का अभाव, समुचित जेल प्रशासन के लिए धन एवं स्टाफ की कमी, स्वच्छ वातावरण, पर्याप्त चिकित्सकीय सुविधाओं एवं जागरूकता की कमी से कैदियों को स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है। इसी के साथ ही ट्रांसजेंडरों, महिला कैदियों और उनके बच्चों की अलग से रहन-सहन, सुरक्षा और स्वास्थ्य आदि के लिए अपर्याप्त व्यवस्था इन्हें बदहाल जीवन में जीने को मजबूर कर देती हैं।

जेल सुधार का इतिहास : स्वतंत्रता पश्चात भारतीय संविधान में जेलों एवं उसमें रखे कैदियों को भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची दो की प्रविष्टि चार के तहत राज्य सूची का विषय के तहत रखा गया। जेलों का प्रशासन और प्रबंधन संबंधित राज्य सरकारों की जिम्मेदारी होती है। हालाकि गृह मंत्रलय जेलों और कैदियों से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नियमित मार्गदर्शन तथा सलाह देता है। सितंबर 2018 में जस्टिस अमिताभ राय की अध्यक्षता में दोषियों के जेल से छूटने और पैरोल के मुद्दों पर उनके लिए कानूनी सलाह की उपलब्धता में कमी एवं जेलों की विभिन्न समस्याओं की जांच करने के लिए एक समिति का भी गठन किया था जिसने वर्ष 2020 में ही कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे, लेकिन इन सारी समितियों के सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। यही वजह है कि आज जेलों का बुरा हाल होता जा रहा है।

सुधार के कुछ प्रयास : जेल सुधार की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण और आवश्यक कदम भी उठाए गए हैं। जैसे 2002-03 में मौजूदा जेलों की मरम्मत, नवीनीकरण, स्वच्छता, जलापूर्ति में सुधार, नई जेलों के निर्माण, बंदियों और जेलकर्मियों की स्थिति में सुधार के लिए जेल नवीनीकरण योजना चलाई गई थी। इसके बाद 2016 में माडल जेल मैनुअल भी लाया गया। ई-जेल परियोजना भी काफी हद तक डिजिटलीकरण के माध्यम से जेल प्रबंधन की दक्षता को बढ़ाने में मददगार साबित हुई एवं कोरोनाकाल में भारत सरकार द्वारा लांच ई-प्रिजन पोर्टल एवं ई-मुलाकात आनलाइन पोर्टल की व्यवस्था का आरंभ किया गया जिसके माध्यम से आनलाइन ही मित्र, स्वजन अथवा नाते-रिश्तेदारों से मिलने में सहूलियत हुई।

देश की अनेक जेलों के भीतर कैदियों द्वारा मोबाइल फोन समेत अन्य इलेक्ट्रानिक डिवाइस के इस्तेमाल की घटनाएं सामने आती रहती हैं। ऐसे में बीते महीने ही उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘जेल अधिनियम-1894’ में एक बड़ा फेरबदल (संशोधन) किया है। उत्तर प्रदेश की जेलों में किसी भी इलेक्ट्रानिक डिवाइस के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। बदले हुए कानून में तय किया गया है कि जेल के अंदर अगर कोई कैदी किसी भी तरह की इलेक्ट्रानिक डिवाइस (मोबाइल, बैटरी, संचार यंत्र) आदि के साथ पकड़ा जाता है तो वह आरोपी माना जाएगा और उसके खिलाफ जेल प्रशासन नए मुकदमे संबंधित थाने में दर्ज कराएगा। आरोपी को गिरफ्तार करके कोर्ट में बहैसियत मुलजिम पेश किया जाएगा एवं बाकी आपराधिक मामलों की तरह ही आरोपी पर कोर्ट में मुकदमा चलेगा। इस बदलाव के बाद अब जेल से मोबाइल फोन के माध्यम से अपराध को अंजाम देने वालों पर नकेल कसा जाना तय है।

क्या करना आवश्यक : जेल सुधारों के लिए चरणबद्ध योजना पर काम करने की जरूरत है। इस दिशा में सबसे पहला कदम जेलों को संविधान की समवर्ती सूची में शामिल करने एवं जेलों से संबंधित मामलों पर एक समान और व्यापक कानून के निर्माण से एकरूपता और स्पष्टता आ सकती है। इसके बाद जेलों में बुनियादी ढांचागत सुविधाओं का विस्तार, क्षमता निर्माण एवं नए जेलों की स्थापना की जरूरत है, ताकि जेलों में जरूरत से ज्यादा कैदियों को रखे जाने की समस्या का समाधान हो सके। कैदियों की अनावश्यक भीड़ को कम करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए। इसका असल समाधान तो धीमे और जटिल न्यायिक तंत्र के दुरुस्तीकरण से ही होगा, लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ऐसे कैदियों को चिह्न्ति करके जमानत पर रिहा किया जा सकता है जिन पर किसी संगीन अपराध का अभियोग न लगा हो या जिन्होंने अपने ऊपर लगे अभियोग की संभावित अधिकतम सजा से ज्यादा समय जेल में बिता लिया हो। उल्लेखनीय है कि कोविड महामारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी पात्र कैदियों की अंतरिम रिहाई का आदेश दिया था जिसका उद्देश्य जेलों में भीड़ को कम करना और कैदियों के जीवन तथा स्वास्थ्य के अधिकार की रक्षा करना था।

जेलों में भीड़ कम होते ही अव्यवस्था संबंधी बहुत-सी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाएंगी। जेलों में स्वच्छ और पौष्टिक भोजन, कैंटीन, आवश्यक वस्तुओं आदि को खरीदने की सुविधा के साथ-साथ जेल परिसर की साफ-सफाई, स्वच्छता संबंधी जागरूकता एवं बेहतर चिकित्सा की सुविधा की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि कैदियों को स्वस्थ और रोगमुक्त रखा जा सके। अमिताभ राय समिति के अनुसार कैदियों के लिए कानूनी सहायता, स्पीडी ट्रायल, पर्याप्त वकीलों की उपलब्धता, परिजनों से मुलाकात एवं अपराध अनुसार वैकल्पिक सजा आदि के मुद्दे को भी गौर करना जरूरी है। जेलों में जेल प्रशासन के लिए संसाधनों, धन एवं स्टाफ की कमी भी अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार होती है। ऐसे में तमाम रिक्तियों को भरने और पर्याप्त वित्त की व्यवस्था बेहद आवश्यक है।

खुली जेलों के सकारात्मक परिणाम: भारत में जेलों को सुधारगृह कहा जाता है, लेकिन व्यावहारिकता और वास्तविकता के धरातल पर अभी भी जेलें अपराधियों के लिए बड़े अपराधी बनने के एक वर्कशाप की तरह देखी जाती रही हैं। अपराधियों के प्रति भी समाज हमेशा से अपना रोष और नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहा है, इसीलिए कैदियों के प्रति कोई भी संवेदनशील और सकारात्मक सोच को विकसित नहीं कर पाता। परंतु हमें यह सोचना होगा कि आज नहीं तो कल ये कैदी बाहर आएंगे एवं इसी समाज में रहेंगे, इसलिए जेलों को अपराध की पाठशाला न बना कर उनको नियंत्रित और अनुशासित रखते हुए समाज में पुनर्वासित करने वाला केंद्र बनाने की जगह में तब्दील करना बेहद जरूरी हो गया है। ऐसे में खुली जेल की स्थापना इस दिशा में कारगर हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि खुली जेल एक ऐसी जेल होती है जिसमें जेल के सुरक्षा नियमों को काफी लचीला रखा जाता है। इन जेलों में बंदियों को आत्मानुशासन और खुद अपनी जीविका अर्जित करने पर जोर दिया जाता है। एक बड़ी बात यह भी है कि इन बंदियों से बाहर के लोग आकर मिल सकते हैं। ऐसे में ये बंदी भी धीरे-धीरे अपने आप को समाज में लौटने के लिए तैयारी का अवसर पा लेते हैं। दुनिया में पहली खुली जेल स्विट्जरलैंड में 1891 में बनी थी एवं भारत में पहली बार 1905 में बंबई में यानी वर्तमान मुंबई में बनी। भारत में 64 खुली जेलें हैं जिनका अब तक का परिणाम सकारात्मक ही रहा है। आवश्यकता है खुली जेलों का दायरा बढ़ा कैदियों की मानसिकता बदलने, उन्हें कोई कौशल सिखाने, जीविकोपार्जन का जरिया ढूंढने और रिहाई के बाद एक बेहतर इंसान के रूप में जीवन की नई पारी के लिए तैयार करने जैसी गतिविधियों पर ध्यान दिया जा सकता है। इससे जेल से बाहर आने पर अपराधी फिर से अपराध की दुनिया में न लौटे, इसे सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार संस्थाओं को दृढ़संकल्पित होकर कार्य करना होगा।

[सामाजिक मामलों के जानकार]

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