शिल्पकारों का एक ऐसा मोहल्ला, जहां बेजान मूर्तियों में डाली जाती है जान, जानें उनके बारे में

शिल्पकारों का एक ऐसा मोहल्ला, जहां बेजान मूर्तियों में डाली जाती है जान, जानें उनके बारे में

छत्‍तीसगढ़ के कोंडागांव के निवासियों ने बेलमेटल शिल्प कला को देश ही नहीं विश्व पटल पर नया पहचान दिया है।

Arun Kumar SinghWed, 03 Jun 2020 07:56 PM (IST)

कोंडागांव, राज्‍य ब्‍यूरो। छत्‍तीसगढ़ के कोंडागांव का नाम बेलमेटल शिल्प कला में विश्वविख्यात है, यहां की 90 फीसद बेल मेटल शिल्प देश-दुनिया में आपूर्ति भेलवा पदर मोहल्ले से होती है। यहां के निवासियों ने मूर्तिकला को देश ही नहीं, विश्व पटल पर नया पहचान दिया है। मोहल्ले कई में नामचीन कलाकार रहते हैं। बेल मेटल के जाने-माने कारीगर डॉक्टर जय देव बघेल भी भेलवा पदर के निवासी रहे। आज उनकी विरासत को बेटे भूपेंद्र बघेल आगे बढा रहे हैं। वर्तमान में कोविड-19 लॉक डाउन के चलते सभी कर्मशाला बंद है।

मोहल्ले में 15 से 16  छोटी- बड़ी कर्मशालाएं

राष्ट्रीय मेरिट पुरस्कार प्राप्त कारीगर भूपेंद्र बघेल ने दैनिक जागरण के सहयोगी अखबार नई दुनिया को बताया कि पहले जातिगत पुश्तैनी कार्य होने के चलते एक ही समाज के लोग मूर्तिकला का कार्य करते थे पर आज व्यवसाय के रूप ले रहा है। यहां मोहल्ले में 15 से 16  छोटी- बड़ी कर्मशालाएं हैं। कुछ लोग घरों में ही कार्य करते हैं। प्रत्येक कर्मशाला में 8 से 10 कारीगर वर्षभर मूर्तियों का निर्माण करते हैं। 

 

माडिया माडिन: आदिवासी कलाकृतियां, हाथी घोड़ा आदि वन्य प्राणी आदि मूर्तियों की हमेशा मांग बनी रहती है। नासिक, इंदौर, दिल्ली आदी कला महाविद्यालय के छात्र- छात्राओं को प्रशिक्षण दिया हूं। अभी तक लगभग 700 सौ लोगों को प्रशिक्षित कर चुका हूं। 

70 घरों में लगभग 350 कारीगर 

वहीं मोहल्ले में रहने वाले अधिकांश लोग मूर्ति कला से जुड़े हैं। मोहल्ले में 70 घरों में लगभग 350 कारीगर मूर्तिकला का कार्य करते हैं। शिल्प कला में यहां के निवासियों ने कई प्रतिमान गढे हैं। मोहल्ले में ना कभी मूर्तियों का निर्माण बंद हुआ ना ही मूर्तियों की मांग। लोगों का हम पर भरोसा कायम है, लेकिन हम जहां थे आज भी वहीं खड़े हैं। टीन  की छत, कच्ची दीवार से निर्मित कर्मशाला मे सालभर सैकड़ों मूर्तिकार बेल मेटल की  मूर्तियों में जान डालते हैं। बारिश के दिनों में छत से टपक रहे पानी के बीच मूर्तियां तैयार करना किसी चुनौती से कम नहीं है। 

पहले जहां मोहल्ला इतना घना नहीं था 

एक जमाने में चारों ओर पेड पौधे व खुला मैदान था, मूर्तिकार खपरैल की लाड़ी  में मूर्तियां बनाते थे। समय बीतता गया अन्य लोग भी मोहल्ले में आकर बसने लगे 

बघेल ने कहा कि शिल्पकला के लिए वे देश के मुख्य शहरों के साथ-साथ अफ्रीका के केपटाउन, फ्रांस के लियोन, स्विट्ज़रलैंड आदि देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुका हूं। बेल मेटल शिल्प कला में महुआ के पेड़ की कलाकृति के लिए वर्ष 2001 में राष्ट्रीय मेरिट सर्टिफिकेट प्राप्त हुआ है। वर्ष 2000 में एमपी का राज्य स्तरीय मेडल प्राप्त हुआ है। 

पुरानी कला होने के बाद भी शहर में खरीदी बिक्री की उचित व्यवस्था नहीं है। कच्चा माल की आपूर्ति ना होने से, स्थानीय बाजार में कच्चा माल निर्धारित दर से अधिक दरों पर खरीदना पड़ता है। किलो की दर पर मूर्तियों को बेचते हैं। हमारे द्वारा निर्मित मूर्तियों को बेचने की सुविधा रहने से मूर्तिकारों के सामने विकट स्थिति निर्मित नहीं होती। सरकार की उपेक्षा के चलते शिल्प कला विलुप्त हो रही है। मूर्तियों से दुनिया भर में अपनी पहचान बनाने वाले कारीगर की स्थिति में बदलाव नहीं आया। सरकार यदि प्रयास करे तो कला के माध्यम से सैकड़ों लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है।

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