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अकूत संपत्ति के कारण चर्चित रहा है पद्मनाभस्वामी मंदिर, जानें क्‍यों नहीं खोला जा सका है तहखाने का एक कक्ष

नई दिल्ली, जेएनएन। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर को एक बार फिर से चर्चा में ला दिया है। तहखानों में अकूत खजाने और रहस्यमय ऊर्जा को लेकर वैसे इस मंदिर की विश्वव्यापी ख्याति रही है। इस मंदिर के रहस्यों को लेकर मीडिया में कई बार सनसनीखेज दावे किए गए हैं। इसी वजह से बहुत से लोग इस मंदिर की संपत्ति एवं रहस्यों में रुचि लेते हैं। आस्था के कारण अभी भी इस मंदिर का एक तहखाना नहीं खोला गया है। माना जाता है इस कक्ष में सबसे ज्यादा संपत्ति है।

राज परिवार ने कोर्ट में उठाया था मामला

दरअसल, इस मंदिर के तहखानों में जमा संपत्ति पर राज परिवार का अधिकार होने का दावा कर मार्तड वर्मा 2007 में कोर्ट में मामला ले गए थे। उनके दावे पर आपत्ति जताते हुए कई और पत्रों की ओर से मुकदमे दायर किए गए। केरल की एक निचली अदालत ने राज परिवार के दावे के खिलाफ एक निषेधाज्ञा पारित की।

इस तरह लगी हाईकोर्ट के फैसले पर रोक

इसके बाद यह मामला हाईकोर्ट चला गया। हाईकोर्ट ने 2011 के फैसले में आदेश पारित किया कि मंदिर के मामलों का प्रबंधन करने के लिए एक बोर्ड का गठन किया जाए। राज परिवार ने हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में फौरन याचिका दायर की। इस याचिका पर हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लग गई।

आज तक एक कक्ष नहीं खोला जा सका

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान इस मामले में दो न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम और भारत के पूर्व नियंत्रक और महालेखा परीक्षक विनोद राय को नियुक्त किया गया। इनसे तहखानों में रखी संपत्ति की सूची तैयार कराई गई। मंदिर के तहखाने में छह में से पांच कक्ष खोले गए लेकिन एक कक्ष जिसे 'बी' नाम दिया गया नहीं खोला गया।

रहस्यमय ऊर्जा के कारण नहीं खोला जा सका है कक्ष

राज परिवार का कहना था कि इस कक्ष में रहस्यमय ऊर्जा है। मंदिर के द्वार पर दो सांप बने हुए हैं। इसे अभिमंत्रित करके बंद किया गया है। इसे विशिष्ट मंत्रों से ही खोला जा सकता है। मंत्रों के उच्चारण में कोई त्रुटि नहीं होनी चाहिए। जरा सी भी त्रुटि प्राणघातक हो सकी है। राज परिवार के इस कथन को स्थानीय लोगों की मान्यता मिलने के कारण यह कक्ष अब तक नहीं खोला गया है। छठी शताब्दी में बनाया गया त्रावणकोर मंदिर का जिक्र 9वीं शताब्दी के ग्रंथों में है। त्रावणकोर के राजाओं द्वारा निर्मित इस मंदिर के लिए 1750 में महाराज मार्तंड वर्मा ने खुद को भगवान का सेवक बताते हुए अपनी संपत्ति और जीवन भगवान के नाम कर दिया। 

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