एनजीटी ने वेदों का दिया हवाला, कहा- तालाबों, कुओं या झीलों को प्रदूषित करने वाले जाते हैं नरक, जानें पूरा मामला

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने शुक्रवार को वेदों और पुराणों का हवाला देते हुए कहा कि जो व्यक्ति तालाबों कुओं या झीलों के पानी को प्रदूषित करता है वह नरक में जाता है। जानें एनजीटी ने और क्‍या कहा...

Krishna Bihari SinghFri, 30 Jul 2021 10:18 PM (IST)
एनजीटी ने कहा कि जो व्यक्ति तालाबों या झीलों के पानी को प्रदूषित करता है वह नरक में जाता है।

नई दिल्ली, पीटीआइ। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने शुक्रवार को वेदों और पुराणों का हवाला देते हुए कहा कि जो व्यक्ति तालाबों, कुओं या झीलों के पानी को प्रदूषित करता है, वह नरक में जाता है। एनजीटी के चेयरमैन जस्टिस एके गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण पश्चिम की सोच या कोई ऐसी चीज नहीं है जिसकी उत्पत्ति कुछ दशक या कुछ शताब्दी पहले हुई है।

भारत के लोगों ने प्रकृति का सम्‍मान किया

ट्रिब्यूनल ने कहा, 'भारत में कम से कम इस बात के पर्याप्त दस्तावेज हैं जो दिखाते हैं कि इस देश के लोगों ने प्रकृति और पर्यावरण को उचित सम्मान दिया है और समग्रता व श्रद्धा का व्यवहार किया है। इसमें सभी समुदाय और संगठन शामिल हैं।'

ऋषि-मुनि महान दूरदृष्टा

एनजीटी ने आगे कहा, 'असल में हमारे वैदिक साहित्य में मानव शरीर को पंचभूतों से निर्मित माना गया है जिनमें आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी शामिल हैं। प्रकृति ने इन तत्वों और प्राणियों में संतुलन बनाए रखा है। हम पाते हैं कि अनादि काल या वैदिक काल या पूर्व वैदिक काल से भारतीय उपमहाद्वीप के संत और ऋषि-मुनि महान दूरदृष्टा थे। उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से ब्रह्मांड के सृजन को समझा। उन्होंने ब्रह्मांड के विकास के रहस्यों को बेहद बुद्धिमानी से उजागर किया।'

वेदों में जल को सबसे अधिक सम्मान

ट्रिब्यूनल ने कहा कि प्राचीन भारत में लोगों को प्रकृति के नजदीक लाने के लिए ऋषियों ने इसे धार्मिक रूप दे दिया ताकि प्रकृति के प्रति निर्देशों को लोग अनिवार्य मानें और उसके संरक्षण के सभी उपायों का पालन करें। वैदिक साहित्य में पानी को सबसे अधिक सम्मान दिया गया है और उसे बेहद श्रद्धेय माना गया है।

जल ही सभी चल-अचल का निर्माता

पानी को मानव पर्यावरण का हिस्सा बताते हुए एनजीटी ने कहा कि इसे पांच रूपों में मिलना बताया गया है- बारिश का पानी (दिव्य), प्राकृतिक झरने (श्रेवंती), कुएं और नहरें (खनित्रिमह), झीलें (स्वयंजह) और नदियां (समुद्रस्थ)। कहा गया है कि सभी जीवों का जन्म जल से हुआ है और जल ही सभी चल-अचल का निर्माता है।

पद्म पुराण में दी गई है चेतावनी

एनजीटी ने कहा कि संत और ऋषि-मुनि जानते थे कि मानव बस्तियां ज्यादातर नदियों और जल स्रोतों के तटों पर हैं और उनकी दैनिक गतिविधियों से पानी प्रदूषित हो सकता है व प्रकृति का संतुलन बिगड़ सकता है। इसे हतोत्साहित करने के लिए ही पद्म पुराण में चेतावनी दी गई है कि जो व्यक्ति तालाबों, कुओं या झीलों के पानी को प्रदूषित करता है वह नरक में जाता है।

वनों को नष्ट नहीं करना चाहिए

एनजीटी ने चंडोज्ञ उपनिषद का भी हवाला दिया। ट्रिब्‍यूनल ने कहा कि चंडोज्ञ उपनिषद में कहा गया है कि पानी ने पौधों को उत्पन्न किया है जो भोजन पैदा करते हैं। ऋग्वेद कहता है कि वनों को नष्ट नहीं करना चाहिए, पृथ्वी सृजन की बेल और वनों की पिटारी है और पेड़ या औषधि और पौधे जीवित हैं।

गोदरेज के हाईराइज प्रोजेक्ट को तत्काल ढहाने का आदेश

एनजीटी ने जल और पर्यावरण की महत्ता पर उक्त टिप्पणियां बेंगलुरु में गोदरेज प्रापर्टीज लिमिटेड और वंडर प्रोजेक्ट्स डेवलेपमेंट प्राइवेट लिमिटेड के हाईराइज लक्जरी प्रोजेक्ट को प्रदान की गई पर्यावरण मंजूरी को खारिज करते हुए कीं। ट्रिब्यूनल ने इन्हें तत्काल ढहाने का आदेश दिया है। 

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