National Science Day 2021: सरकारी स्कूलों से लेकर शैक्षिक संगठन तक, इनोवेटिव तरीके से जगा रहे बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि

इस वर्ष की थीम है-‘विज्ञान,तकनीक, नवाचार: शिक्षा, कौशल एवं कार्य पर प्रभाव।‘

हमारे दैनिक जीवन में विभिन्न स्तरों पर विज्ञान का प्रयोग होता है जिससे देश के अधिकतर बच्चे आज भी अनभिज्ञ हैं। किताबी ज्ञानकी पद्धति उनमें वि षय के प्रति दिलचस्पी जगाने में नाकाम रहती है। लेकिन अब शहरों से लेकर गांवों तक प्रयोग करके सीखने की कोशिशें जारी हैं।

Sanjay PokhriyalSat, 27 Feb 2021 05:33 PM (IST)

नई दिल्‍ली, अंशु सिंह। देश के महान वैज्ञानिक डॉ. चंद्रशेखर वेंकट रमन (1888-1970) ने 28 फरवरी, 1928 को जो खोज की थी, उसे ‘रमन प्रभाव’ के नाम से जाना जाता है। इसके लिए उन्हें विभिन्न पुरस्कारों के साथ 1930 में नोबल पुरस्कार भी दिया गया। उनके इसी प्रयास को याद रखने के लिए वर्ष 1986 में नेशनल काउंसिल फॉर साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी कम्युनिकेशन ने 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में घोषित किया। इसे मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों और खासकर बच्चों के बीच विज्ञान के प्रति जागरूकता पैदा करना है। इस वर्ष की थीम है-‘विज्ञान,तकनीक, नवाचार: शिक्षा, कौशल एवं कार्य पर प्रभाव।‘

देश में कितने ही म्यूजियम या साइंस सेंटर हैं, जहां बच्चे अपनी जिज्ञासा को शांत करने नियमित रूप से जाते रहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये म्यूजियम बच्चों के स्कूल की भूमिका भी निभा सकते हैं? जी हां, भोपाल के प्रदीप घोष ने इस सोच को साकार कर दिखाया है। ‘परवरिश म्यूजियम स्कूल’ के इनोवेटिव कॉन्सेप्ट के जरिये वे बिना किसी बड़ी पूंजी के निवेश या इंफ्रास्ट्रक्चर के शहरों में रहने वाले गरीब बच्चों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं। उनके अंदर छिपे विज्ञानी को बाहर निकालने का प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने शहर के साइंस एवं अन्य म्यूजियम के साथ एक समझौता किया है।

प्रदीप बताते हैं, ‘हमने अपने मॉडल के तहत पहले ऐसे म्यूजियम की पहचान की जहां बच्चों को स्कूली पाठ्यक्रम के विषयों के अनुरूप शिक्षित किया जा सके। इसमें स्कूल ड्रॉपआउट एवं गरीब तबके से आने वाले बच्चों को बस से म्यूजियम (उनके स्कूल) में ले जाया जाता है। वहां म्यूजियम के ही ट्रेंड एजुकेटर्स एवं अन्य वॉलंटियर्स प्रदर्शनियों की मदद से बच्चों को पढ़ाते व समझाते हैं। ये एजुकेटर्स कुछ युवाओं को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित भी करते हैं। इस तरह, हमने सरकार द्वारा स्थापित सर्वश्रेष्ठ इंफ्रास्ट्रक्चर एवं शैक्षिक मॉडल्स (म्यूजियम में प्रदर्शित उपकरण एवं साइंस मॉडल्स) की मदद से ही बच्चों का ज्ञानवर्धन करने का प्रयास किया है। उद्देश्य यही है कि समाज में क्वालिटी एजुकेशन को लेकर व्याप्त खाई को भरना, क्योंकि गरीब तबके के बच्चे अक्सर विज्ञान से जुड़ी शिक्षा से महरूम रह जाते हैं। एक बार जब पढ़ाई में रुचि विकसित हो जाती है, तो बच्चों का दाखिला मुख्यधारा के सरकारी स्कूलों में कराया जाता है।’ इनकी मानें, हर दिन दो घंटे के लिए बच्चे म्यूजियम स्कूल में जाते हैं। यह सिलसिला बीते 15 वर्षों से चल रहा है। आज इस स्कूल से निकले कई बच्चे इंजीनियरिंग, जर्नलिज्म, फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई कर रहे हैं। एक बच्चा टीसीएस कंपनी में काम कर रहा है, जबकि कई बच्चे वापस शिक्षक के रूप में म्यूजियम स्कूल से जुड़ गए हैं। अच्छी बात यह रही है कि भोपाल के अलावा, दिल्ली, बेंगलुरु एवं मुंबई में भी यह प्रयोग सफल रहा है।

जन-जन तक विज्ञान का प्रसार: विज्ञान को रुचिकर बनाने एवं उसमें बच्चों की दिलचस्पी जगाने के लिए नित नये प्रयोग किये जा रहे हैं। वैयक्तिक स्तर से लेकर स्कूलों में इनोवेटिव तरीके से बच्चों को साइंस की उपयोगिता के बारे में बताया जा रहा है। जैसे पटियाला के सरकारी सीनियर सेकंडरी स्कूल, शेखूपुरा में तैनात फिजिक्स के प्राध्यापक जसविंदर सिंह ने अपनी कार को ही साइंस मैथ्स लैब का रूप दे दिया है। इस कार में वह करीब 150 प्रैक्टिकल करवाते हैं और गांव-गांव जाकर बच्चों को ज्ञान देते हैं। उन्होंने अपनी चलती-फिरती प्रैक्टिकल लैब को ‘साइंस मैथमेटिक्स लैब ऑन व्हील्स’ का नाम दिया है।

अब तक जसविंदर अपनी इस कार से पंजाब,हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली समेत आठ राज्यों में 950 प्रदर्शनियां लगा चुके हैं। वहीं, आप जब अवतार नगर, जालंधर के सरकारी मिडिल स्कूल के बरामदे में खड़े होकर खुले आसमान की तरफ देखेंगे, तो सौरमंडल का नजारा दिखाई देगा। दरअसल, यहां के साइंस शिक्षक सुमित गुप्ता ने फाइबर और सरिये की मदद से सौरमंडल का पूरा मॉडल तैयार किया है, जिसके जरिये वे छात्रों को पृथ्वी से सभी गृहों की दूरी,चक्र,गति आदि के बारे में दिखाकर समझाते हैं।

बाइक से स्कूल पहुंचता है ‘लैब’: झारखंड के गिरिडीह के आठ स्कूलों में भी बीते दो साल से ‘लैब आन बाइक’ कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके तहत छठी से आठवीं के बच्चों को विज्ञान पढ़ाया जाता है। आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत की गयी इस पहल के लिए अगस्त्य फाउंडेशन के साथ समझौता किया गया है। फाउंडेशन की ओर से ही प्रशिक्षक लैब से संबंधित सभी सामान लेकर स्कूल पहुंचते हैं और बच्चों को पढ़ाते हैं। इससे करीब 800 बच्चों को फायदा हो रहा है। प्रशिक्षक गुलाम सर्वर बताते हैं,‘ सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि पैदा करने के उद्देश्य से यह कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके तहत हर साल दो विद्यालयों में विज्ञान मेला का आयोजन किया जाता है। जो स्टूडेंट अच्छा माडल बनाते हैं, उन्हें पुरस्कृत भी किया जाता है।’ वहीं, माध्यमिक विद्यालय बदडीहा के प्रधानाध्यापक दीपक कुमार ने बताया कि इस कार्यक्रम से बच्चों में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। वे नयी चीजें जानने के लिए न सिर्फ लालायित रहते हैं, बल्कि खुलकर सवाल भी पूछते हैं,जिससे पहले कतराते थे।

कबाड़ से बना लिया साइंस पार्क: साइंस एक ऐसा विषय है, जिसे बहुत से विद्यार्थी मुश्किल समझते हैं,लेकिन जब विषय को रोचक और प्रैक्टिकल अंदाज में प्रस्तुत किया जाए तो यह काफी सरल लगने लगता है। लुधियाना के सरकारी सीनियर सेकंडरी स्मार्ट स्कूल की साइंस टीचर रपविंदर कौर ने एक ऐसा ही अनूठा प्रयास किया है। उन्होंने स्कूल प्रांगण में बनी एक छोटी-सी जगह को साइंस पार्क में बदल दिया है। इसके लिए वर्ष 2019 में उन्हें नेशनल इनोवेशन अवार्ड भी मिल चुका है। यह पार्क उन्होंने बिजली के तारों,लीक हुई वाटर पाइप,टूटे बेंच,पुराने पंखों,घी के डिब्बों यानी वेस्ट से तैयार किया है। साइंस पार्क में इस समय साउंड पाइप मॉडल, विंड मिल, विस्परिंग डिस्क,न्यूटन कैड्रल,टेलीस्कोप मॉडल,पिन होल कैमरा,डीएनए मॉडल प्रदर्शित किए गए हैं, जिसे स्कूल के छठी से दसवीं कक्षा तक के विद्यार्थी बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। रपविंदर ने स्कूल में बनी साइंस लैब की दीवारों को भी फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी कॉन्सेप्ट के डायग्राम,रूटीन में इस्तेमाल होने वाले फार्मूलों,मॉडल्स के साथ सुंदर बना दिया है। कोविड-19 के दौर में इन्होंने साइंस के कुछ विषयों को कविता के अंदाज में पेश कर यू-ट्यूब पर अपलोड किए थे,जिसका स्कूल के अलावा अन्य बच्चों ने भी फायदा उठाया। वह कहती हैं, ‘2002 में जब मैं इस पेशे में आयी, तो देखा कि कैसे बच्चे साइंस विषय में भी कंटेट को याद कर लेते थे,लेकिन उसका कॉन्सेप्ट उन्हें क्लियर नहीं होता था। बच्चे विषय का सिर्फ रट्टा न लगाए, इसके लिए मैंने कुछ अलग करने का प्रयास किया। साइंस पार्क का विकास उसी का परिणाम है।’

खेल-खेल में गणित की पढ़ाई: पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के प्राथमिक विद्यालय के एक शिक्षक ने भी अभिनव प्रयोग किया है। वे इनोवेटिव (ज़ीरो इंन्वेस्टमेंट) तरीके से लकड़ी के अनुपयोगी गुटकों की मदद से बच्चों को खेल-खेल में गणित पढ़ा रहे हैं, जो बच्चों को खूब भा रहा है। प्राथमिक विद्यालय बोडिया अनंत,बैतालपुर देवरिया के विज्ञान शिक्षक आशुतोष नाथ तिवारी के इस प्रयास की सराहना हो रही है। वह बताते हैं कि, ‘बच्चों में वैज्ञानिक अभिरुचि पैदा करने और गणित की पढ़ाई को रुचिकर बनाने का विचार मन में काफी समय से था। सरकारी स्कूल के सीमित संसाधन का भी ध्यान था। ऐसे में मैंने नजदीक के आरा मशीन से विभिन्न गणितीय आकृतियों वाले गुटकों को एकत्र किये। फिर अपने संसाधन से गुटकों की रंगाई की। बच्चों को गुटकों से ट्राइंगल, स्क्वायर, पेंटागन, हेक्सागोन जैसी अनेक आकृतियों बनाकर दिखाईं। उन्हें गणितीय सिद्धांतों के विभिन्न आयामों से परिचित कराया। मैंने देखा कि इस अनूठ प्रयास से बच्चों का पढ़ाई के प्रति लगाव बढ़ गया। वे अब जहां गणित विषय में रुचि ले रहे हैं,वहीं उनके अंदर वैज्ञानिक सोच व समझ भी विकसित हो रही है।’ इसके अलावा जब गांव के बच्चे स्कूल के खाली समय में कांच की गोली खेलते नजर आए, तो आशुतोष ने उन्हीं कांच की गोलियों के जरिये बच्चों को समझाना शुरू किया। उन्होंने घरों में उपयोग होने वाले छोटे डिब्बों, टूटे हुए या बेकार पड़े पेंसिल बॉक्स की सहायता से डिवीजन बोर्ड बनाया, जिसकी सहायता से वह कक्षा एक व दो के बच्चों को भाग की गणितीय संकल्पना से परिचित करा रहे हैं। विद्यालय के बच्चों को हाल ही में विभाग की ओर से पुरस्कृत किया गया है।

अनुपयोगी सेल व गोबर से जलायी एलईडी: सृजनशीलता और नवाचार के लिए अपनी अलग पहचान बना रहा है प्रयागराज का पूर्व माध्यमिक विद्यालय देवीबांध भी। यहां ‘आओ करके सीखें’ मंत्र से प्रेरित होकर छात्रों ने एक प्रयोगशाला विकसित की है। उन्होंने टार्च से निकली निष्प्रयोज्य बैट्री और गोबर का प्रयोग कर एलईडी लाइट जलाने में सफलता हासिल की है। यहां के शिक्षक अग्नि प्रकाश शर्मा बताते हैं कि आज जब ऊर्जा के पारंपरिक स्रोत खत्म हो रहे हैं, तो छात्रों को वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत विकसित करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इसी कड़़ी में हमारे स्कूल के संदीप सिंह, विकास सिंह, शिवम सिंह, आदर्श शुक्ल व हरिश्चंद्र ने गोबर की मदद से एलईडी जलाने में सफलता हासिल की है। इसी तरह, मीथेन गैस बनाकर भोजन पकाने के लिए बेहतर मॉडल विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। खास बात यह है कि इस प्रयोग में शून्य निवेश हुआ है।

हर बच्चे में होता है स्पार्क, जिसे जगाने की है जरूरत: भोपाल के ओेएसिस- ए सोशल इनोवेशंस लैब के संस्थापक प्रदीप घोष ने बताया कि साइंटिफिक टेंपरामेंट हर बच्चे में होता है। उसको स्पार्क कैसे करें, यह हमारे ऊपर निर्भर करता है। जैसे म्यूजियम स्कूल में एजुकेटर्स बच्चों को कहानी के माध्यम से विभिन्न प्रयोगों व साइंटिफिक मॉडल्स के बारे में बताते हैं और बच्चों से पूछते हैं कि वहां प्रदर्शित कौन-सा मॉडल (एग्जीबिट) कहानी के उपयुक्त है। इससे बच्चे ऑब्जर्व करना सीखते हैं। वे चीजों को रिलेट करते हैं। एक बार बच्चा एग्जीबिट तक पहुंच जाता है, तो शिक्षक चुप हो जाते हैं, जब तक कि कोई उनसे सवाल नहीं पूछता। इससे बच्चों में जिज्ञासा उत्पन्न होती है। वह कब विज्ञान की दुनिया में प्रवेश कर जाता है, उसे भनक तक नहीं लगती है।

कहने का आशय यह है कि जब तक किसी बच्चे को साइंस का एप्लीकेशन दिखाई नहीं देगा, वह सवाल नहीं करेगा। सवाल ही नहीं करेगा, तो विषय में रुचि कैसे उत्पन्न होगी? अभी की पद्धति में यही दिक्कत है कि बच्चे को पहले सैद्धांतिक शिक्षा देते हैं, फिर प्रयोग कराते हैं। इससे उसकी बुद्धि व ज्ञान वहीं तक सीमित हो जाते हैं। वे जान नहीं पाते कि आगे उस विज्ञान का कहां प्रयोग किया जा सकता है। बच्चों में वह विजुअलाइजेशन आता ही नहीं है। नतीजा यह होता है कि अगर थ्योरी समझ में नहीं आई, तो वह प्रैक्टिकल में कोई दिलचस्पी नहीं लेता। इसलिए जरूरी है कि बच्चों की जिज्ञासा को बढ़ाया जाए। नॉलेज होगी,तो बच्चा सवालों के जवाब किताबों में खुद-ब-खुद ढूंढ़ने भी लगेगा।

इनपुट: [लुधियाना से राधिका कपूर,देवरिया से महेंद्र कुमार त्रिपाठी, प्रयागराज से अमलेंदु त्रिपाठी,गिरीडीह से ज्ञान ज्योति]

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