Mahatma Gandhi Death Anniversary: नैतिक बल से ही व्यक्तित्व की मजबूती संभव

महात्मा गांधी की पुण्यतिथि (30 जनवरी) के मौके पर एक सामयिक विश्लेषण..

मन वचन और कर्म की एकरूपता बापू यानी महात्मा गांधी की पहचान थी। एक साधारण मानव से असाधारण-विराट व्यक्तित्व बनने तक की यात्र में उनकी सबसे बड़ी ताकत रही सत्य के प्रति दृढ़ता और नैतिक बल। हर दौर में इसका पालन करना क्यों आसान नहीं लगता?

Publish Date:Thu, 28 Jan 2021 01:50 PM (IST) Author: Sanjay Pokhriyal

सीमा झा। संभव है कि आपको ऐसा प्रतीत हो कि इस युग में महात्मा गांधी जैसा नैतिक साहस संभव नहीं। आप यह भी सोच सकते हैं कि बाजार या अन्य दबाव समूह के आगे लोग नतमस्तक हो जाते हैं, तो ऐसे में किससे ईमानदारी की उम्मीद करें? पर यह तो हर दौर की रीत और सच्चाई है, यह भी नहीं भूलना चाहिए। मसलन, महाभारत काल में भी अच्छे और बुरे लोग थे। भ्रष्टाचार और अनैतिकता के अनेक उदाहरण हैं। पर आप जानते हैं कि उस दौर में भी युधिष्ठर, विदुर और कर्ण जैसे उदाहरण रहे हैं।

हां, जब हर तरफ अंधेरा महसूस हो, राह न सुझे तो उससे निकलने का साहस और नजरिया पैदा करना हमारे ऊपर ही है। दरअसल, यही आपकी परीक्षा है, आपके पुरुषार्थ की परख है। इसे यानी पुरुषार्थ को आप गांधी की तरह ही अपने नैतिक बल से प्राप्त कर सकते हैं। यहां गांधी जैसी नैतिकता या नैतिक बल का अर्थ है इंसान के वे सद्गुण, जो उसके भीतर हमेशा से मौजूद हैं। इसी से वह पहचान बनाता है। यह इंसान का वैसा ही सहज गुण है, जैसा कि आग अपनी गर्मी के कारण और पानी अपनी शीतलता के कारण जाना जाता है।

दिल की सुनते, गुनते और अमल करते थे: ‘हिंद स्वराज’ की प्रस्तावना में गांधी लिखते हैं, ‘जब मुझसे नहीं रहा गया, तभी लिखा। बहुत पढ़ा, बहुत सोचा’। पर उन्होंने ऐसा क्यों कहा? इसलिए कि लिखने के पीछे कोई तर्क या उद्देश्य होना चाहिए, न कि मौज या शौक। वे एक सृजनशील पाठक थे। पढ़ना, आत्मसात करना और उस पर अमल करना उनका सहज गुण बन गया था। उनके सिद्धांत उनके गहन अध्ययन, चिंतन की देन हैं।

वचन के पक्के : पहली बार जब गांधी इंग्लैंड जाते हैं तो वहां के होटल में घुसते ही उनके मुंह से सहसा निकलता है कि यहां तो मैं पूरी उम्र गुजार सकता हूं। दरअसल, उस समय इंग्लैंड दार्शनिकों, लेखकों और बौद्धिकों का गढ़ था। गांधी उसकी चकाचौंध से प्रभावित होते हैं, पर अचानक उन्हें यह भी आभास होता है कि ‘यह तो एक क्रेजी सिविलाइजेशन’ यानी एक सनकपूर्ण सभ्यता है! साल्ट की पुस्तक ‘अन्नाहार की हिमायत’ किताब को पढ़ने के बाद उन्हें अपनी मां को दिया गया मांसाहार न करने का वचन पुष्ट हुआ। उक्त किताब में इस बात को वैज्ञानिक रूप से समझाया गया है। विदेश में एक बार किसी ने उनसे ताबीज उतारने को कहा तो उन्होंने सिरे से खारिज किया, क्योंकि यह मां के विश्वास को ठेस पहुंचाने जैसा था।

गलती स्वीकार करने का साहस: गलती स्वीकारना और उसे सुधारने की प्रवृत्ति गांधी जी में बचपन से ही विद्यमान थी। उन्होंने एक बार अपनी गलतियों के बारे में चिट्ठी लिखकर पिता को थमा दी और सजा की याचना की। उस समय पिता बीमार थे। उनके पिता ने उस चिट्ठी को नम आंखों से पढ़ा और फाड़ दिया। बचपन में एक बार उनसे परीक्षा में नकल करने को कहा गया तो उन्होंने मना कर दिया। हरिश्चंद्र और श्रवण कुमार के बारे में जाना तो माता-पिता के प्रति सेवाभाव के बारे में चिंतन करने लगे। मन में लगातार यही चलता रहता कि सब लोग ऐसे क्यों नहीं हो सकते? गलतियों को स्वीकारने का अद्भुत साहस उनमें था। आमतौर पर ऐसा नहीं होता।

श्मशानी वैराग्य: हम लोग आदर्शवादी बातों को अच्छा मानते हैं, उनको अमल में लाने की बात भी करते हैं, लेकिन जल्द ही यह श्मशानी वैराग्य साबित होता है। श्मशानी वैराग्य यानी कुछ पल की विरक्ति और क्षणिक संकल्प के बाद दोबारा पूर्ववत हो जाना। लेकिन गांधी अलग मिट्टी के बने थे। उनकी खासियत थी कि वे अपने संकल्प को हर हाल में बनाए रखने का प्रयास करते और सफल भी होते।

ध्यान और संकल्प की शक्ति: गांधी जी के विराट संकल्प के पीछे एक कारण ईश्वर पर उनकी असीम आस्था थी। उन्होंने खुद को ईश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पित कर दिया था। विकट परिस्थितियों में जैसे उन्हें वहीं से निर्देश प्राप्त होता था और फिर वे लोगों को आश्चर्यचकित कर देते थे। यह एक सहज गुण है, जिसे हम सभी ध्यान और संकल्प से साध सकते हैं। यदि हम इसकी ठीक से साधना कर लें तो कोई भी ताकत हमें झुका नहीं सकती।

खुद को रजवत कर लेना: निरंतर सतर्कता और साधना के बल पर गांधी जी ने न केवल अपने को रजवत यानी धूल समान कर लिया था, अपितु इसकी बदौलत महानायकत्व भी हासिल किया। आमतौर पर ऐसा होता है, जब हमारा बस नहीं चलता तो हम ईश्वर को पुकारते हैं। स्पष्ट है हम पूर्ण समर्पण नहीं करते। हम अहंकार-त्याग के लिए तैयार नहीं होते हैं। पर ईश्वर तो तभी हमारी रक्षा करने आते हैं, जब हम अहंकार का त्याग करके अपने को शून्य कर अपनी नैतिक शक्ति को और बढ़ा लेते हैं।

नैतिक साहस का बल: गांधी जी से इतर एक अन्य महापुरुष का वाकया है। पंडित रामअवतार शर्मा को एक बार बीएचयू के कुलपति पंडित मदन मोहन मालवीय ने बुलावा भेजा। उन्हें यकीन नहीं हुआ। पंडित रामअवतार शर्मा ने कहला भेजा कि कोई कुलपति किसी आचार्य को कैसे बुला सकता है? यह एक अपार नैतिक साहस था, जिसकी आज हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। आज तो लोग श्वास और आंख की गति पर ही भागे चले आते हैं। बहरहाल, मालवीयजी को पता चला तो वे दौड़े आए और कहा कि दरअसल, मैं यह जानना चाहता था कि आपके पास समय कब है। यहां आचार्य और कुलपति दोनों ने एक-दूसरे की गरिमा रखी।

याद रखना है: मानवीय दुर्बलताओं से हम सब आप्लावित हैं। गांधी जी के भीतर भी रहीं। उन कमजोरियों पर मंथन और उन पर विजय पाने का उनमें साहस था तो उस दौर की नकारात्मक ताकतों के खिलाफ वे खड़े हो सके। भरपूर लड़े और उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर किया। यह सही है कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना मुश्किल है। जैसा कि निराला ने नैतिकता के परम प्रतीक प्रभु श्रीराम के बारे में लिखा, ‘वह एक और मन रहा राम का जो न थका।’ एक और मन कौन है? यही तो है आपकी अदृश्य ताकत यानी नैतिक बल।

हम जिस क्षेत्र में हैं, उनमें ईमानदारी बरतें। प्रलोभनों से बचने का हरसंभव प्रयास करें ईमानदारी होगी तो आप धीरे-धीरे अपनी शक्ति का आभास करने लगेंगे पुरुषार्थ यही है कि हम अपने सद्गुणों को बढ़ावा दें। कमजोरियों को पहचानें और उन पर विजय पाएंमनुष्य ही पुरुषार्थ पा सकता है, पशु नहीं। दबाव हम पर है तो इसे हम बाहरी प्रभावों में आकर खुद ओढ़ते हैं। बिना हमारी इच्छा के यह संभव नहीं अच्छाई के लिए आगे आए हैं तो आपको प्रताड़ित या परेशान होने के लिए भी तैयार रहना होगा। आपकी मौलिक शक्ति हमेशा आपका इंतजार कर रही होती है। उसे साथ लेकर आगे बढ़ते रहने का संकल्प लें दुसाध्य और विपरीत परिस्थिति हमें जीने की राह सुझाती है

आदर्श और व्यावहारिकता: दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी ने विस्मयकारी आदर्शो को व्यवहार में परिणत करना सीखा। जुलू विद्रोहियों के शमन के प्रयास के समय इंडियन एंबुलेंस कोर के माध्यम से अपनी सेवाएं देनी शुरू कीं। हर सुबह गांधी बंदूकों के चलने की आवाज के बीच उठते थे। उन्हें कभी-कभी युद्ध में मारे गये घायलों के बीच एक दिन में 40-40 मील तक की यात्र करनी पड़ती थी। विशाल, निर्जन पहाड़ी क्षेत्र में दिन-रात घायलों को ढोने के समय गांधी प्रार्थना और आत्मविश्लेषण का आश्रय लेते थे।

दरअसल, यह बेहतर सेवा हेतु अधिक ताकत प्राप्त करने की एक भक्तिमय खोज होती थी। ध्यान की इस गहन अवस्था के बीच उन्हें आभास हुआ कि सेवा के लिए उन्हें मोह से मुक्ति पानी ही होगी। अंतत: उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। बहरहाल, तमाम मानवीय कमजोरियों के बाद भी आदर्श को अपनाना विराट संकल्प का विषय है। वे यह मानते थे कि मनुष्य हैं तो कमजोरियां होंगी और हम पूर्ण अहिंसक कभी नहीं हो सकते। इंसान तो मां के गर्भ से ही हिंसा करना शुरू कर देता है, पर व्यावहारिक बात यह है कि हम सतत प्रयास और संकल्प से हिंसा को न्यूनतम स्तर पर ला सकते हैं। ऐसा करना ही हमारी सबसे बड़ी ताकत होगी।

[डॉ. मनोज कुमार राय अध्यक्ष, गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंत. हिंदी विवि, वर्धा]

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