हादसे के बाद छूटी 1500 रुपये की नौकरी, अब सरकारी योजना से कमा रहीं 12,000 रुपये

गोविंद दुबे, फतेहपुर। एक सार्थक पहल से किसी जरूरतमंद की जिंदगी कैसे संवर जाती है, ज्ञानवती से पूछिए। दुर्घटना में हाथ टूटने और स्कूल से रसोइया की नौकरी छूटने के बाद वह प्रधानमंत्री दुर्घटना बीमा योजना के लाभ की उम्मीद लिए बैंक गईं तो वहां निराशा हाथ लगी, लेकिन उसके पीड़ा भरे शब्दों ने बैंक प्रबंधक के दायित्वबोध को जगा दिया। फतेहपुर क्षेत्र में बड़ौदा उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक, बिंदकी के शाखा प्रबंधक आशीष तिवारी नियमों में बंधे होने के कारण ज्ञानवती को बीमा का लाभ तो नहीं दिला पाए, लेकिन डेयरी लोन और क्रेडिट कार्ड दिलाकर स्वावलंबन और आत्म निर्भरता की राह दिखा दी।

भरण- पोषण की जिम्मेदारी ज्ञानवती पर आन पड़ी

आज ज्ञानवती दूध के कारोबार और खेती के बल पर समाज में सम्मान के साथ गुजर-बसर कर रही हैं और बच्चों को पढ़ा पा रही हैं। मुसीबतों ने तो मानो बिंदकी तहसील के अमेना गांव निवासी 45 वर्षीय ज्ञानवती का पता ही ढूंढ़ लिया था। छह साल पहले पति संतोष विश्वकर्मा की मौत हो गई। वह लकड़ी कारीगर थे। अब चार बच्चों कोमल, आंचल, अभिलाषा और बबलू के भरण- पोषण की जिम्मेदारी ज्ञानवती पर आन पड़ी। बच्चों का पेट भरने के लिए प्राइमरी स्कूल में 1500 रुपये महीने पर रसोइया की नौकरी की, लेकिन दुर्घटना में हाथ टूटने के बाद काम छूट गया।

1500 रुपये प्रतिमाह की नौकरी भी चली गई

हताश ज्ञानवती ने बैंक जाकर कहा कि साहब! मैं प्राइमरी स्कूल में रसोइया थी, एक दुर्घटना में मेरे हाथ की हड्डी टूटकर बाहर निकल आई थी। सदर अस्पताल में इलाज और लंबी परेशानी झेलने के बाद अब बैंक आने लायक हुईं हूं। 1500 रुपये प्रतिमाह की नौकरी भी चली गई, बच्चों को कैसे पढ़ाएं और खिलाएं। अपने खाते से प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा करवाया था, जिसमें 12 रुपये सालाना कटते हैं। बीमा योजना का लाभ दिला दें तो परिवार दुआ देगा...।

स्थाई अपंगता पर ही मिलता है लाभ

बैंक शाखा प्रबंधक ने तहकीकात के बाद भारी मन से कहा कि बीमा में मानक के अनुसार दुर्घटना में मृत्यु या स्थाई अपंगता पर ही लाभ मिलता है, लेकिन उन्होंने ठान लिया कि ज्ञानवती की मदद करेंगे और रोजगार जरूर दिलाएंगे। उन्होंने ज्ञानवती को नाबार्ड की डेयरी अनुदान योजना से 1.40 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत कराया। इसमें 35 हजार रुपये अनुदान मिलेगा और 1.05 लाख रुपये ही लौटाने होंगे। वह हिचकिचाईं, लेकिन शाखा प्रबंधक के समझाने पर मान गईं।

महज एक सप्ताह में औपचारिकता पूरी कराने के बाद पहली किस्त में मिले 70 हजार रुपये से बैंक शाखा प्रबंधक ने ही भैंस खरीदवाई। अब ज्ञानवती 400 रुपये का दूध रोजाना बेचती हैं, जिससे करीब 200 रुपये का लाभ हो जाता है। इससे गृहस्थी की गाड़ी आराम से चल रही है। बैंक प्रबंधक की पहल से डेढ़ बीघा खेत का एक लाख रुपये का क्रेडिट कार्ड भी बन गया है। एक वर्ष बाद दूसरी भैंस खरीदने के लिए धन मिल जाएगा।

खूब पढ़ाऊंगी बच्चों को, पूरे करूंगी अरमान

आत्मनिर्भर हुईं ज्ञानवती बैंक प्रबंधक को दुआ देते नहीं थकती हैं। कहती हैं कि हमारी जिंदगी में तो अंधेरा छाया था। लग रहा था कि चार बच्चों को कैसे पालेंगे, लेकिन मैनेजर साहब भगवान बन गए। अब बेटे-बेटियों की खूब पढ़ाऊंगी और उनके अरमान पूरे करूंगी।

मिली आत्मसंतुष्टि

बैंक शाखा प्रबंधक आशीष तिवारी कहते हैं कि आत्मसंतुष्टि तब मिली, जब ज्ञानवती ने अपनी भैंस के दूध से बने पेड़े मुझे और पूरे स्टाफ को खिलाए। मैंने तो अपना फर्ज निभाया था, महिला और बच्चों की जिंदगी संवर गई तो इससे ज्यादा सुखद और क्या हो सकता है।

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