पेगासस मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के नियुक्त विशेषज्ञ पैनल की जानें कौन हैं शामिल

पेगासस मामले की 3 सदस्यीय जांच कमेटी में पूर्व IPS अफसर आलोक जोशी और इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ स्टैंडर्डाइजेशन सब-कमेटी के चेयरमैन डॉ. संदीप ओबेरॉय भी शामिल किए गए हैं। इसके साथ ही तीन सदस्यीय टेक्निकल कमेटी भी बनाई गई है।

Arun Kumar SinghWed, 27 Oct 2021 06:25 PM (IST)
पेगासस जासूसी मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया है

 नई दिल्ली, प्रेट्र। पेगासस जासूसी मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया है। इस कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज आरवी रवींद्रन करेंगे। इस कमेटी से कहा गया है कि पेगासस से जुड़े आरोपों की तेजी से जांच कर रिपोर्ट सौंपे। अब 8 हफ्ते बाद फिर इस मामले में सुनवाई की जाएगी। पेगासस मामले की तीन सदस्यीय जांच कमेटी में पूर्व आइपीएस अफसर आलोक जोशी और इंटरनेशनल आर्गेनाइजेशन ऑफ स्टैंडर्डाइजेशन सब कमेटी के चेयरमैन डा. संदीप ओबेराय भी शामिल किए गए हैं। साइबर सुरक्षा, डिजिटल फोरेंसिक, नेटवर्क और हार्डवेयर के तीन विशेषज्ञों को मामले की पूछताछ, जांच और तय करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके साथ ही तीन सदस्यीय टेक्निकल कमेटी भी बनाई गई है। इसमें साइबर सुरक्षा और डिजिटल फोरेंसिंक के प्रोफेसर डा. नवीन कुमार चौधरी, इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डा. प्रभाकरन पी और कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. अश्विन अनिल गुमस्ते के नाम शामिल हैं। ये सभी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज आरवी रवींद्रन को रिपोर्ट करेंगे।

जानें तीन सदस्यीय टेक्निकल कमेटी के बारे में

नवीन कुमार चौधरी तकनीकी पैनल के पहले सदस्य साइबर सुरक्षा और डिजिटल फोरेंसिक के प्रोफेसर और गुजरात के गांधी नगर के राष्ट्रीय फोरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय के डीन हैं। शीर्ष अदालत के फैसले में कहा गया है कि उनके पास शिक्षा, साइबर सुरक्षा सक्षम और विशेषज्ञ के रूप में दो दशकों से अधिक का अनुभव है। उनके पास साइबर सुरक्षा नीति, नेटवर्क भेद्यता मूल्यांकन और प्रवेश परीक्षण में विशेषज्ञता है। तकनीकी समिति के दूसरे सदस्य इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डा. प्रभाकरन पी केरल के अमृतापुरी के अमृता विश्व विद्यापीठम में कार्यरत हैं। उन्हें कंप्यूटर विज्ञान और सुरक्षा क्षेत्रों में दो दशकों का अनुभव है। उनकी रुचि के क्षेत्र मैलवेयर का पता लगाना, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा सुरक्षा, जटिल बाइनरी विश्लेषण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग हैं। प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनके कई प्रकाशन हैं।

तकनीकी समिति के तीसरे सदस्य बांबे आइआइटी में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. अश्विन अनिल गुमस्ते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि उन्हें 20 अमेरिकी पेटेंट दिए गए हैं। उन्होंने 150 से अधिक पत्र प्रकाशित किए हैं और अपने क्षेत्र में 3 पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें विक्रम साराभाई अनुसंधान पुरस्कार (2012) और विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (2018) सहित कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं। उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, यूएसए में विजिटिंग साइंटिस्ट का पद भी संभाला है।

एक्सपर्ट टीम को सुप्रीम कोर्ट ने दिए अधिकार

अपने आदेश में मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि विशेषज्ञ पैनल के पास 'पूछताछ, जांच और यह निर्धारित करने की शक्ति होगी कि क्या पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल भारत के नागरिकों के फोन या अन्य उपकरणों पर इकट्ठा किए गए डेटा तक पहुंचने, बातचीत पर नजर रखने, इंटरसेप्ट करने के लिए या जानकारी या किसी अन्य उद्देश्य के लिए और इस तरह के स्पाइवेयर हमले से प्रभावित पीड़ितों या व्यक्तियों के विवरण जानने के लिए किया गया था। उन्होंने कहा कि इस मामले में कमेटी बनाने का काम पहाड़ जैसा था। हमने यह रिटायर्ड जज के विवेक पर छोड़ दिया था कि ऐसे एक्सपर्ट की मदद लें जो साइबर प्राइवेसी के विशेषज्ञ हों।

जानें क्या है पेगासस विवाद ? 

खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय ग्रुप का दावा किया था कि इजराइली कंपनी एनएसओ के जासूसी साफ्टवेयर पेगासस से 10 देशों में 50 हजार लोगों की जासूसी हुई। कहा तो यहां तक जा रहा है कि इस साफ्टवेयर का इस्तेमाल करीब 300 से अधिक लोगों के फोन टेप किए गए हैं।। इसे लेकर भारत की संसद में खूब हंगामा हुआ।

इन्होंने दायर की थी याचिका

इस मामले में पत्रकार एन. राम, शशि कुमार, माकपा के राज्य सभा सांसद जान ब्रिटास, वकील एमएल शर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, आरएसएस के विचारक केएन गोविंदाचार्य ने भी कोर्ट के समक्ष अपनी याचिका पेश की हुई है। कांग्रेस सांसद और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी केंद्र पर आरोप लगाया है कि उनका भी फोन टेप कराया गया है। केंद्र की तरफ से इन सभी आरोपों को खारिज किया गया है। हालांकि, विपक्ष लगातार इस मामले को तूल दे रहा है। 

जानें कैसे पेगासस काम करता है?

साइबर सुरक्षा रिसर्च ग्रुप सिटीजन लैब के मुताबिक, किसी डिवाइस में पेगासस को इंस्टाल करने के लिए हैकर अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। एक तरीका ये है कि टारगेट डिवाइस पर मैसेज के जरिए एक 'एक्सप्लॉइट लिंक' भेजा जाता है। जैसे ही फाने का उपयेाग करने वाला इस लिंक पर क्लिक करता है, पेगासस अपने आप फोन में इंस्टाल हो जाता है।

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