केरल हाईकोर्ट ने दिव्‍यांग दुष्‍कर्म पीड़िता के 15 सप्ताह के गर्भ के गर्भपात की दी अनुमति

15 सप्ताह की गर्भावस्था वाली पीड़ित महिला को केरल उच्च न्यायालय ने माता-पिता या नागरिकों के कानूनी रक्षक की भूमिका निभाते हुए गर्भपात की अनुमति है। बता दें कि दिव्‍यांग दुष्‍कर्म पीड़िता के गर्भपात की उच्च न्यायालय ने अनुमति महिला की मानसिक स्थिति के आधार पर दी है।

Ashisha SinghTue, 27 Jul 2021 01:47 PM (IST)
केरल हाईकोर्ट ने मानसिक रूप से विकलांग बलात्कार पीड़िता के 15 सप्ताह के गर्भ के गर्भपात की दी अनुमति

कोच्चि, पीटीआई। दुष्कर्म की  शिकार दिव्‍यांग पीड़िता के 15 सप्ताह की गर्भावस्था को केरल उच्च न्यायालय ने 'माता-पिता' या नागरिकों के कानूनी रक्षक की भूमिका निभाते हुए गर्भपात की अनुमति दी है। बता दें कि  पीड़िता के गर्भपात की केरल उच्च न्यायालय ने अनुमति महिला की मानसिक स्थिति के आधार पर दी है। न्यायालय ने कहा कि पीड़ित महिला कोई भी निर्णय लेने में सक्षम नहीं थी। जिस वजह से महिला की मानसिक स्थिति को देखते हुए उच्च न्यायालय ने सरकारी मानसिक स्वास्थ्य केंद्र और तिरुवनंतपुरम में श्री एविटोम थिरुनल अस्पताल को गर्भावस्था के चिकित्सीय समापन की अनुमति दी है।

कानूनी प्रक्रिया के साथ किया जाएगा गर्भपात

दिव्‍यांग दुष्‍कर्म पीड़िता के गर्भावस्था को केरल हाईकोर्ट ने सरकारी मानसिक स्वास्थ्य केंद्र और तिरुवनंतपुरम में श्री एविटोम थिरुनल अस्पताल को समाप्त करने की अनुमति दे दी है। लेकिन पीड़िता का गर्भपात कानूनी प्रक्रिया के साथ किया जाएगा। चूंकि महिला दुष्कर्म पीड़िता है, इस वजह से भ्रूण के ऊतक यानी पेट में पल रहे बच्चे का टिशू सैंपल और डीएनए जांच दुष्कर्म की कानूनी कार्रवाई के लिए बेहद जरूरी है।

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया यह फैसला

न्यायमूर्ति पीबी सुरेश कुमार ने यह निर्णय मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर लिया है। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में कहा गया था कि मानसिक रूप से विकलांग पीड़िता की गर्भावस्था जारी रखने पर महिला के जीवन को कोई खतरा नहीं होता, लेकिन मां और बच्चे के लिए एक यह भारी जोखिम था। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट ने बताया कि यह खतरा इसलिए था क्योंकि पीड़ित महिला कई मनोविकार रोधी (एंटी-साइकोटिक) दवाओं पर है।

केरल उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि मानसिक स्वास्थ्य केंद्र से जुड़े हुए मेडिकल बोर्ड द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि पीड़ित महिला की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी, जिस कारण वह कोई भी निर्णय लेने में असमर्थ है। जिस वजह से न्यायाधीश पीबी सुरेश कुमार ने कहा‌ कि 'इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि मामले में शामिल व्यक्ति एक दुष्कर्म से ग्रस्त  पीड़िता है और मेडिकल बोर्ड की राय पर विचार करते हुए, मेरा विचार है कि इस प्रकार के मामले में, यह संबंधित व्यक्ति के सर्वोत्तम हित में है उसकी गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दें,'

पीड़ित महिला का यह मामला तिरुवनंतपुरम के कझाकुट्टम पुलिस स्टेशन की सीमा के भीतर भटकते हुए पाया गया। इसके बाद महिला को संदिग्ध हालत में देखते हुए पुलिस द्वारा तत्काल महिला को पुनर्वास केंद्र और फिर पेरुर्कडा के मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया था। जहां पर पीड़ित महिला को 4 जून को आठ सप्ताह का गर्भवती पाया गया। जिसके बाद छानबीन करने पर पीड़िता के घर परिवार और रिश्तेदारों का पता नहीं चल सका। स्वास्थ्य केंद्र के अधीक्षक ने इस स्थिति से जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को अवगत कराया। इसके बाद, मामले को गंभीरता से लेते हुए केरल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा रिट याचिका दायर कर पीड़िता के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति मांगी जिसमें वजह बताते हुए याचिका में कहा गया कि पीड़ित महिला दिव्‍यांग है जिससे वह कोई भी निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है।

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