हीरा तराशने वाले हाथ मनरेगा में नहीं तोड़ेंगे पत्थर, कोरोना संकट खत्म होते ही हम काम पर लौटेंगे

हीरा तराशने वाले हाथ मनरेगा में नहीं तोड़ेंगे पत्थर, कोरोना संकट खत्म होते ही हम काम पर लौटेंगे
Publish Date:Sat, 06 Jun 2020 09:06 PM (IST) Author: Bhupendra Singh

आकाश माथुर. सीहोर। गुजरात के सूरत में हीरे तराशने वाले हाथों को मनरेगा में पत्थर तोड़ना नहीं सुहाया। लॉकडाउन में सीहोर जिले के अपने गांव जहांगीरपुरा लौटे युवाओं ने साफ किया कि उनके हाथों ने हीरों को तराशा है, वे कुदाल नहीं चलाएंगे। जल्द संकट खत्म होगा और वे सभी गुजरात के सूरत लौटकर अपना काम करेंगे।

लॉकडाउन के दौरान सूरत में काम बंद होने से 200 लोग गांव लौट आए

दरअसल, सीहोर जिले के ग्राम जहांगीरपुरा के तकरीबन 200 लोग सूरत में हीरा तराशने का काम करते थे। लॉकडाउन के दौरान काम बंद होने से वे अपने गांव लौट आए हैं। उन्हें उम्मीद है कि जिस तरह से वह हीरे को तराश कर उसमें चमक लाते हैं, ठीक वैसे ही कुछ समय में कोरोना जैसी महामारी के बादल छंट जाएंगे और एक नई रोशनी हमारे जीवन में उजाला लाएगी।

लोगों को आकर्षित करती है हीरे की चमक

कारीगर अनिल लोधी बताते हैं कि हमें हीरा तराशने के काम में बड़ा सुकून मिलता है। उसकी चमक लोगों को आकर्षित करती है। जितनी कुशलता से हीरे को तराशा जाता है, उसकी कीमत उतनी बढ़ती जाती है। तैयार हीरा हांगकांग, दुबई, थाईलैंड, अमेरिका आदि देशों में जाता है। लॉकडाउन में हालात सुधरने के बाद भी हीरा उद्योग जल्द पटरी पर आए ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है।

गुजरात के हीरा उद्योग में 15 लाख कारीगरों को रोजगार मिला हुआ था

उन्होंने बताया कि गुजरात के हीरा उद्योग में विभिन्न जगहों के लगभग 15 लाख कारीगरों को रोजगार मिला हुआ था।

मनरेगा में काम करने से इन्कार,  मजदूरी कम है

लॉकडाउन के दौरान जहांगीरपुरा लौटे युवाओं के नाम से पंचायत ने श्रमिक पंजीयन करना शुरू कर दिए हैं। कारीगर नरेंद्र लोधी, राजू लोधी, महेंद्र राजपूत ने बताया कि हीरा तराशने वाले हाथ अब फावड़ा और कुदाल नहीं चला पाएंगे। हमने मनरेगा में काम करने से साफ मना कर दिया है। मजदूरी इतनी कम है कि परिवार का भरण-पोषण भी अच्छे से नहीं हो पाएगा।

हीरा तराशने के काम में एक से डेढ़ हजार रुपये तक रोज मिलते थे

काशीराम लोधी कहना है कि हीरा तराशने के काम के एक से डेढ़ हजार रुपये तक रोज मिलते थे। उनसे ज्यादा कुशल कारीगरों को चार हजार रुपये रोज तक मिल जाते थे। हर एक कारीगर 15 से 20 हजार हजार रुपये महीना कम से कम कमा ही लेता है।

मनरेगा में काम के इच्छुक नहीं : पंचायत सचिव लोधी

पंचायत सचिव राजेंद्र लोधी ने बताया कि सूरत से लौटकर आए लोगों से आवेदन मांगे गए थे, पर यह लोग मनरेगा का काम करने के इच्छुक ही नहीं हैं। मनरेगा में तकरीबन 192 रुपये प्रति दिन मेहनताना दिया जाता है।

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