डिजिटल मीडिया को कंट्रोल करने की कवायद पर जानें एक्‍सपर्ट की राय, क्‍या है सरकार का हलफनामा

पीएम मोदी मानते हैं कि डिजिटल दौड़ में भारत एक मजबूत आधार है। इसलिए इसको खुलेतौर पर अपनाने की जरूरत है। वर्तमान में स्‍मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधा होने की वजह से कोई भी अपने विचार खुल कर बयां करने की ताकत रखता है।

By Kamal VermaEdited By: Publish:Tue, 29 Sep 2020 07:57 AM (IST) Updated:Tue, 29 Sep 2020 07:57 AM (IST)
डिजिटल मीडिया को कंट्रोल करने की कवायद पर जानें एक्‍सपर्ट की राय, क्‍या है सरकार का हलफनामा
भारत को डिजिटल मीडिया के माध्‍यम को परिपक्व होते देखने की जरूरत है

कुणाल किशोर। विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कंटेंट की मनमानी को नियंत्रित करने के उद्देश्य से इसके सरकारी नियमन की चर्चा हो रही है। ऐसे में सबसे पहले हमें डिजिटल मीडिया की सटीक परिभाषा तलाशने की जरूरत है। इस प्रक्रिया में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर व्यक्त किए गए विचारों को डिजिटल मीडिया से दूर करना होगा। कोई भी मीडिया संस्थान चाहे वह जिस भी प्रारूप में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल हो, वह महज एक व्यक्ति द्वारा संचालित नहीं हो सकता, यह एक टीम वर्क है। ऐसे में सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दिए एक हलफनामे पर कहीं न कहीं सरकारी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। सरकार की मानें तो उसकी चिंता वेब न्यूज पोर्टल, चैनल या यूट्यूब चैनल के प्रति ज्यादा है। सरकारी तंत्र का मानना है कि ऐसे चैनल को बिना किसी पंजीकरण या अनुमति के शुरू किया जा सकता है। ये खतरनाक तरीके से राष्ट्रीय संप्रभुता को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

सरकार ने अदालत में यह कहा कि यदि कोर्ट मीडिया को रेगुलेट करना चाहता है तो इसकी शुरुआत डिजिटल मीडिया से करे, न कि मुख्यधारा की मीडिया यानी प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक से। सरकारी हलफनामे में ऐसी कई बातें हैं जो सरकारी समझ पर सवाल खड़ा करती हैं। मसलन हलफनामे में डिजिटल मीडिया की प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ तुलनात्मक अध्ययन में यह तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई है कि प्रिंट मीडिया की पहुंच महज उन इलाकों तक है, जहां पर वह उपलब्ध है या टीवी की पहुंच उन भाषाओं तक है जिसमें वे प्रसारित होते हैं। हलफनामा यह कहता है कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों को सरकारी तौर पर रेगुलेट किया जाता है, जिसके लिए ढेरों कायदे कानून हैं।

सरकार ने हलफनामे में अखबारों और टीवी को महज उनके मौलिक प्रारूप में उपस्थित मान कर उनके वेब पोर्टल, एप्स, यूट्यूब चैनल, फेसबुक पेज के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं की है कि क्या उसे इस तरह के वेब चैनल से भी परेशानी है या नहीं।सरकार की ओर से संसद में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में यह बात सामने आई है कि वह इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी इंटरमीडिएट गाइडलाइन रूल्स 2011 में भी बदलाव लाने की मंशा रखती है जो अन्य संबंधित माध्यमों जैसे गूगल, फेसबुक, ट्वीटर को और जिम्मेदार बनाने की कोशिश करेगी। ऐसे में यह लग रहा है कि कहीं न कहीं वैसे चैनलों को रेगुलेट करने की बात दिखती है जो मौलिक रूप से वेब संस्करण में ही मौजूद हैं, चाहे वह एक यूट्यूब चैनल हो या डिजिटल वेब पोर्टल।

बड़ा खतरा यह है कि स्मार्टफोन जैसे गेमचेंजर डिवाइस के द्वारा हर समय यह आपके साथ कनेक्टेड है। यही इसकी ताकत ज्यादा है। लगभग 63 करोड़ स्मार्टफोन यूजर्स के साथ भारत जैसे देश में सरकार का चिंतित होना सही भी है। यहां यह समझने की जरूरत है कि करोड़ों फेसबुक खातों पर लोग अपने निजी, राजनीतिक, सामाजिक व आíथक विचारों को धड़ल्ले से रख रहे हैं। यूट्यूब चैनलों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। ऐसे में जब ट्वीटर जैसा प्लेटफॉर्म दुनिया के सबसे ताकतवर शासक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड टंप के ट्वीट को हाइड कर सकता है, तो भारत जैसे देश को धैर्य के साथ इस माध्यम को परिपक्व होते देखने की जरूरत है।

हाल में प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र के अपने संबोधन में भारत को डिजिटल दौड़ में एक मजबूत आधार माना है, तो जरूरत इसे खुले तौर पर अपनाने की है। सरकार ने जिन समस्याओं का जिक्र हलफनामे में किया है उसे वर्तमान कानूनों के अंतर्गत भी निपटाया जा सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इंटरनेट जो कि विचारों की आजादी और नए विचारों के लिए जाना जाता है, क्या उसे भी रेगुलेट किया जा सकता है?

(लेखक इंटरनेट व सोशल मीडिया के जानकार हैं)

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