संक्रमण थामने से ही बनेगी बात, हर्ड इम्युनिटी के लिए 85 फीसद से ज्यादा लोगों में एंटीबाडी की है जरूरत

दो तिहाई आबादी में एंटीबाडी बनने पर ऐसे लोगों की संख्या घटी है जिनके संक्रमित होने का खतरा ज्यादा रहता है। परंतु महामारी जब तक पूरी तरह खत्म नहीं होती सतर्कता का हर कदम उठाना ही होगा। क्योंकि जितना संक्रमण बढ़ेगा वायरस के नए वैरिएंट की तलवार लटकी रहेगी।

Dhyanendra Singh ChauhanMon, 26 Jul 2021 11:15 AM (IST)
अनुमान है कि अगस्त से नवंबर, 2021 के बीच आ सकती है अगली लहर

[डा चंद्रकांत लहारिया]। चौथा सीरो सर्वे बताता है कि अब देश में ऐसे कम लोग रह गए हैं, जिनमें महामारी के संक्रमण का ज्यादा खतरा है। दूसरी लहर से पहले देश में करीब 76 फीसद या 105 करोड़ लोग खतरे की जद में थे, अब यह संख्या करीब 40 करोड़ रह गई है। यह अच्छी खबर है। यह कम संख्या भरोसा दिलाती है कि अगली कोई भी लहर दूसरी लहर से कम घातक रहेगी। हम चिंता और तनाव को कम कर सकते हैं, लेकिन यह अर्थ बिलकुल नहीं कि हमें ढील दे देनी चाहिए। अभी भी 40 करोड़ लोग खतरे की जद में हैं और वायरस का प्रसार थमा नहीं है। हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर खतरे की जद में आने वाले लोगों की संख्या कम हुई है, लेकिन राज्यों और जिलों के भीतर कुछ जगहें ऐसी हो सकती हैं, जहां ऐसे लोगों का प्रतिशत ज्यादा हो। किसी अन्य लहर से पहले राज्य या जिलावार मामले बढ़ सकते हैं।

नए वैरिएंट का बना रहेगा खतरा

हमें यह भी याद रखना होगा कि एंटीबाडी समय के साथ कम होने लगती है। कुछ ऐसे लोग जिनमें अभी एंटीबाडी है, हो सकता है कि अगले कुछ महीने में उनमें एंटीबाडी न रह जाए। एक अहम बात, सीरो प्रिवेलेंस का वायरस से कोई लेना देना नहीं है। वायरस अभी भी फैल रहा है और जब तक इसका प्रसार हो रहा है, नए वैरिएंट का खतरा बना रहेगा। ब्रिटेन इसका उदाहरण है। वहां टीकाकरण से बड़ी आबादी में एंटीबाडी बन गई थी। इसके बावजूद डेल्टा वैरिएंट उभरा और बड़ी संख्या में मामले आए। हालांकि टीका लगे होने का फायदा यह रहा कि अस्पताल में भर्ती होने और जान जाने के मामले कम रहे। भारत को डेल्टा से भी ज्यादा संक्रामक वैरिएंट के लिए तैयारी रखनी होगी। ऐसा वैरिएंट भारत में या किसी भी देश में पनप सकता है।

अगस्त से नवंबर के बीच आ सकती है अगली लहर

अनुमान है कि अगस्त से नवंबर, 2021 के बीच अगली लहर आ सकती है। कुछ लोग इन अनुमानों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। उन्हें इस बात पर आश्चर्य होता है कि अनुमान अलग-अलग क्यों हैं। इसकी वजह यह है कि कोई यह नहीं बता सकता है कि नया वैरिएंट कब उभरेगा। अगर नया वैरिएंट उभर आया और लोगों ने सावधानी नहीं बरती तो अगस्त में ही तीसरी लहर आ सकती है। सीरो सर्वे के नतीजों से अति आत्मविश्वास में आने की जरूरत नहीं है कि लोग सुरक्षा के उपाय करना छोड़ दें। संवेदनशील लोगों में संक्रमण और बीमारी का खतरा बना रहता है। ज्यादा संक्रामक वैरिएंट के आने से ऐसे लोग भी संक्रमित हो सकते हैं, जिनमें एंटीबाडी है। कुछ लोग निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि भारत हर्ड इम्युनिटी की तरफ बढ़ रहा है। हमें समझना होगा कि ज्यादा संक्रामक वैरिएंट होने पर हर्ड इम्युनिटी का थ्रेसहोल्ड भी बढ़ जाता है। फिलहाल हर्ड इम्युनिटी के लिए 85 फीसद से ज्यादा लोगों में एंटीबाडी की जरूरत है और हम इससे दूर हैं।

सीरो सर्वे से बच्चों को लेकर भरोसा बढ़ाने वाली बात आई सामने 

सवाल है कि हमें क्या करना चाहिए? जवाब है कि जब तक दुनिया में महामारी चल रही है, हमें अपने और अपने लोगों की सुरक्षा के लिए मास्क, शारीरिक दूरी और हाथ धोने की आदत को अपनाए रहना होगा, साथ ही टीका लगवाना होगा। सीरो सर्वे से बच्चों को लेकर भरोसा बढ़ाने वाली बात सामने आई है। इसमें कहा गया है कि बच्चों में भी बड़ों की तरह ही सीरोप्रिवेलेंस पाया गया। बच्चों में अन्य की तुलना में बीमारी के गंभीर होने की आशंका कम रहती है। इसकी वजह है कि उनके फेफड़े में वह रिसेप्टर पूरी तरह विकसित नहीं होता है, जो वायरस को फैलने में मदद करता है। इनसे हमें यह पता चलता है कि अगली किसी लहर में बच्चों पर कोई अतिरिक्त खतरा नहीं है। राज्यों के प्रशासन को राष्ट्रीय सर्वे के साथ राज्य एवं स्थानीय स्तर पर सर्वे के आंकड़ों को आधार बनाकर टीकाकरण और अन्य कदमों पर विचार करना चाहिए। जरूरत पड़े तो कुछ चुनिंदा जिलों में अलग से सीरो सर्वे कराया जा सकता है। शहरों और गांवों में सीरो प्रिवेलेंस एक जैसा ही पाया गया। इस आंकड़े का इस्तेमाल सही अनुमान लगाने और देश में मौत के असल आंकड़ों के आकलन में किया जा सकता है।

इस लड़ाई में टीकाकरण कराते हुए और मास्क पहनकर लोग अपना योगदान दे सकते हैं। तकनीक के जानकार लोग विज्ञान आधारित प्रमाण जुटाएं और नीति निर्माता सही योजनाएं बनाकर भूमिका निभाएं। अभी संभलने की जरूरत है। कम से कम 60 से 70 फीसद वयस्क आबादी को टीके की एक डोज लगाने और फिर दूसरी डोज की गति बढ़ाकर महामारी के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

[लेखक जन नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ हैं]

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