डाक्टरों के बचाव में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, कहा- इलाज कर रहे चिकित्सक का विदेश दौरा लापरवाही नहीं

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के एक आदेश को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि विदेश में आयोजित एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के खातिर डाक्टर को जाना पड़ा। इसे मेडिकल लापरवाही नहीं कही जा सकती।

Monika MinalWed, 01 Dec 2021 01:39 AM (IST)
इलाज कर रहे चिकित्सक का विदेश जाना लापरवाही नहीं

नई दिल्ली, प्रेट्र। विदेश में आयोजित किए जाने वाले सेमिनार में हिस्सा लेने के लिए देश से डाक्टरों का आना-जाना लगा रहता है लेकिन इसे मेडिकल लापरवाही करार देना बिल्कुल गलत है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक मामले में यह फैसला सुनाया है।  सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा कि एक चिकित्सक को अपने क्षेत्र में नई जानकारियों से खुद को अपडेट करना होता है। इसके लिए उसे देश-विदेश में सम्मेलनों में शामिल होने की जरूरत होती है।

डाक्टर से मांगा गया था हर्जाना 

दरअसल आज  जस्टिस हेमंत गुप्ता और वी रामसुब्रमण्यन की पीठ ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के एक आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि विदेश में आयोजित एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के खातिर डाक्टर को जाना पड़ा।  इसे मेडिकल लापरवाही नहीं कही जा सकती।  आयोग ने बांबे हास्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च सेंटर और एक डाक्टर को 14.18 लाख रुपये ब्याज के साथ मृतक के कानूनी वारिस को अदा करने का निर्देश दिया था।

मरीज की मौत मेडिकल लापरवाही नहीं- कोर्ट

शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रत्येक मरीज की मौत को मेडिकल लापरवाही नहीं माना जा सकता है। पीठ ने कहा कि महज इसलिए कि डाक्टर विदेश गया था, यह मेडिकल लापरवाही नहीं कही जा सकती। मरीज जिस अस्पताल में भर्ती था, वहां विभिन्न विधाओं के विशेषज्ञ हैं।  अदालत ने कहा कि आयोग का यह कहना प्रतिकूल टिप्पणी है कि डाक्टर ने अपनी अमेरिका और ब्रिटेन यात्रा से पहले कई दिनों तक मरीज को नहीं देखा या उसका उपचार नहीं किया। मरीज का अन्य विशेषज्ञ डाक्टरों द्वारा इलाज किया जा रहा था।

पीठ ने कहा, यह एक ऐसा मामला है जहां मरीज अस्पताल में भर्ती होने से पहले भी गंभीर स्थिति में था लेकिन सर्जरी के बाद भी यदि मरीज जीवित नहीं रहा तब इसे डाक्टर की लापरवाही नहीं कहा जा सकता। यह मेडिकल लापरवाही का मामला नहीं बनता। पीठ ने शिकायतकर्ता की इस दलील को खारिज कर दिया कि चूंकि सर्जरी एक डाक्टर द्वारा की गई थी इसलिए वह अकेले ही मरीज के इलाज के विभिन्न पहलुओं के लिए जिम्मेदार होगा। पीठ ने इसे ‘गलत धारणा’ करार दिया।

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