बुरहानपुर ने केले के पत्तों पर भोजन कराने की परंपरा से प्लास्टिक को हराया

सामूहिक भोज तक में भोजन परोसने के लिए प्लास्टिक की पत्तलों के बजाय केले के पत्तों का उपयोग

मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र के बुरहानपुर जिले में भोजन के मामले में अब दक्षिण भारत की संस्कृति मुस्कुराने लगी है। दरअसल केले की खेती पावरलूम और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए पहचाने जाने वाले बुरहानपुर ने अब पर्यावरण संरक्षण के लिए अनूठा परंपरा का अपनाया है।

Publish Date:Thu, 03 Dec 2020 08:37 PM (IST) Author: Arun Kumar Singh

युवराज गुप्ता, बुरहानपुर। मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र के बुरहानपुर जिले में भोजन के मामले में अब दक्षिण भारत की संस्कृति मुस्कुराने लगी है। दरअसल, केले की खेती, पावरलूम और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए पहचाने जाने वाले बुरहानपुर ने अब पर्यावरण संरक्षण के लिए अनूठा परंपरा का अपनाया है। यहां अब छोटे समारोह से लेकर बड़े सामूहिक भोज तक में भोजन परोसने के लिए प्लास्टिक की पत्तलों के बजाय केले के पत्तों का उपयोग किया जा रहा है। चूंकि बुरहानपुर बड़ा केला उत्पादक क्षेत्र है, इसलिए यहां बहुतायत में केले के पत्ते आसानी से उपलब्ध हैं। धीरे-धीरे इस पूरे क्षेत्र ने इस नवाचार को अपना लिया है। बता दें कि बुरहानपुर ने हाल ही में पर्व-उत्सवों पर दीपदान में उपयोग किए जाने वाले कागज व प्लास्टिक के दोने हटाकर तांबे के दीपक से दीपदान कर नदी संरक्षण का संदेश भी दिया था।

सामूहिक आयोजनों में केले के पत्तों पर करवाया जाता है भोजन

बुरहानपुर में 18 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में केला फसल लगाई जाती है। लोगों ने इन्हीं केले के पत्तों से पर्यावरण सहेजने का प्रयास शुरू किया है। अब पूरे क्षेत्र में सामूहिक भोज व बड़े आयोजनों में पत्तल या प्लास्टिक का उपयोग न करते हुए केले के पत्तों पर भोजन परोसा जाने लगा है। यहां तक कि 3-4 हजार लोगों के लिए होने वाले भंडारों में भी ग्रामीण ट्रैक्टर-ट्रॉली में केले के पत्ते भरकर ले आते हैं और लोगों को इन पर खाना खिलाते हैं। नवरात्र, श्रावण मास, कार्तिक माह, पूर्णिमा, अमावस्या सहित अन्य प्रमुख धार्मिक पर्व व त्योहारों पर होने वाले भंडारों में भी केले के पत्तों पर ही प्रसादी खिलाई जाती है। इस्तेमाल किए गए पत्ते खाद बनाने में काम आते हैं। 

प्लास्टिक को हराने में मिल रही मदद

इतिहासविद मेजर डॉ. एमके गुप्‍ता एवं ग्राम बोदरली के समाजसेवी संजय राठौड़ ने बताया कि शुरुआती दौर में केले के पत्तों का उपयोग छोटे स्तर पर होता था, लेकिन बीते कुछ समय से अंचल में होने वाले बड़े भंडारों-शादी समारोह में भी केले के पत्तों में ही भोजन करवाने की परंपरा बड़े स्तर पर निभाई जा रही है। इससे क्षेत्र में प्लास्टिक का उपयोग कम करने में मदद मिल रही है। आहार विशेषज्ञ डॉ. संपदा पाटिल व प्राकृतिक चिकित्सक डॉ. सचिन पाटिल ने बताया कि केले के पत्ते में भोजन करना गुणकारी और पौष्टिक होता है। केले के पत्ते में परोसे हुए भोजन में केले के गुण भी प्राकृतिक रूप से समाहित हो जाते हैं।

विवाह पत्रिका भी केले के पत्ते से बने कपड़े पर

बुरहानपुर क्षेत्र से मप्र सरकार में पूर्व मंत्री रहीं अर्चना चिटनिस ने अपने बेटे के विवाह समारोह को भी पर्यावरण हितैषी बनाने के लिए केले के तने से बनी विशेष प्लेट व दोने पर ही मेहमानों को भोजन कराया था। तब करीब 10 हजार प्लेट्स का निर्माण किया गया था। विवाह पत्रिका भी केले के पत्ते से बने कपड़े व तुलसी बीज से तैयार करवाई गई थी।

फैक्ट फाइल

- 18 हजार हेक्टेयर में होती है केले की खेती

- 100 से ज्यादा छोटे-बड़े भंडारे प्रतिवर्ष होते हैं जिले में

- 01 लाख के करीब लोगों को भंडारों में कराया जाता है भोजन।

- 200 से ज्यादा शादियों में प्रतिवर्ष के ले के पत्तों में कराया जाता है भोजन।

बुरहानपुर के कृषि उपसंचालक मनोहरसिंह देवके का कहना है कि केले की खेती और इसके अन्य उत्पादों को लेकर कृषि विभाग भी लगातार किसानों व पर्यावरणविदों को प्रोत्साहित कर रहा है। पर्यावरण संरक्षण के लिए यहां के लोग आगे आकर प्रयास कर रहे हैं।

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