Chaitra Navratri 2021: या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता.. इस मंत्र के साथ नवरात्र पर करें देवी की उपासना

इस संकट भरे समय में मां की उपासना ही नव ऊर्जा का संचार करेगी।

शक्तिरूपेण संस्थिता.. इस मंत्र के साथ देवी उपासना करेंगी आप पर क्या आपने इस शक्ति को अपने भीतर महसूस किया है? नवरात्र का मर्म भी तो यही है कि हम अपनी शक्ति को पहचानें और मुश्किलों से भरे अंधियारे पथ को आत्मशक्ति की रोशनी से रोशन कर लें

Sanjay PokhriyalTue, 13 Apr 2021 12:34 PM (IST)

नई दिल्‍ली, सीमा झा। नवरात्र का अवसर स्त्री शक्ति का उत्सव भी है। स्त्री जब कुछ करने की ठान लेती है तो करके ही मानती है। दरअसल, स्त्री शक्ति के अनेक रूप हैं। वह सिर्फ शक्ति नहीं, महाशक्ति है। आज हर लड़की, हर स्त्री अपने-अपने तरीके से अपने वजूद को ढूंढ़ रही है और हासिल भी कर रही है। उसके पास हर सामाजिक बुराई से जूझने की शक्ति है। वह काली रूप को भी पहचानती है और अपनी शक्ति को भी। इसीलिए उसने सफलता के हर मुकाम को छुआ है।

लेकिन तब क्या होता है जब वह अपनी शक्ति से अपरिचित होती है। उसे एहसास ही नहीं होता कि वह सबसे अलग है और अपने हर रूप में खास है। चाहे होममेकर हों या कामकाजी उनके अपने दम पर ही उनका संसार है! आखिर क्यों नहीं पहचान पाती वह अपनी शक्ति को। इसके कई कारण हो सकते हैं, पर उन कारणों से पार उसे जाना है। बस वह अपने भीतर संचारित उस शक्ति की ऊर्जा को महूसस करे, मन की परतों में दबी, किसी कोने में सोई पड़ी उस शक्ति को जगा ले तो दुनिया उसकी मुट्ठी में है। याद रहे कि नवरात्र पर देवी उपासना की रीत निभाना तो अच्छा है, पर आज के दौर में आत्मशक्ति की पहचान ही इस पर्व का मुख्य संदेश है।

पीड़िता नहीं हैं आप

आप श्रृंगार करके, ऊंची हील या पसंद के परिधान पहनकर आत्मविश्वास से भर उठती हैं। यह आत्मविश्वास ही आपकी पहचान है, पर एक और चीज है, जो आपको और भी ज्यादा खूबसूरत बना सकती है। वह है चाहे मुश्किलें कितनी बड़ी हों, बाधाओं से ऊंचा उठ जाना, सिर उठाकर चलना और जिंदगी का भरपूर आनंद लेना। यह सही है कि रोज-रोज की मुश्किलों से जूझती, संभलती यह बात भूल जाती हैं आप। जिंदगी की उलझनों को सुलझाते हुए कभी खीझ उठती हैं तो कभी खुद पर गुस्सा भी आता है, पर इन सबसे भी बुरा तब होता है जब आप खुद को पीड़िता मान बैठती हैं।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की पूर्व चेयरपर्सन अरुंधति भट्टाचार्य ने एक साक्षात्कार के दौरान इसी विषय पर अपनी जिंदगी के पन्ने पलटते, अपना अनुभव बांटते हुए बड़ी प्रेरक बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जब कभी मैं पीछे मुड़कर देखती हूं और सोचती हूं कि आखिर यहां तक कैसे पहुंची तो मुङो अपनी मां का एक कथन याद आता है। वह हमेशा कहा करती थीं कि चाहे जितनी कठिनाई आए, भूलकर भी खुद को पीड़िता न मानना, बस अपने भीतर झांक लेना। अरुंधति भट्टाचार्य के मुताबिक, जब भी चीजें आपके मुताबिक न हो रही हों तो उस समय खुद को दोष न दें। बस अपने भीतर झांकें। देखें कि क्या गलत हुआ, कहां कमी रह गई जिसे ठीक करना है। आत्मशक्ति को पहचानने का इससे सुंदर तरीका और क्या हो सकता है।

आपसे है आपकी दुनिया

कोविड-19 संकट ने बदल दी है स्त्रियों की दुनिया। यूं कहें बाहर ही नहीं उसके भीतर भी सब कुछ उलट-पुलट कर रख दिया, पर उसे इस बात का भी तो एहसास हुआ कि चाहे मुश्किलें कितनी ही बड़ी हों, वह हार नहीं मान सकती। हालांकि यह डगर आसान नहीं। अखिल भारतीय आयुíवज्ञान संस्थान, नई दिल्ली की वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सुजाता मिन्हास कहती हैं, कोविड-19 ने तो स्त्रियों के ऊपर कई गुना वार किया है। एक तो पहले ही वह देवी का भार ढोते हुए अपनी परेशानी भीतर दबा लेती है, दूसरे, कोविड ने उससे उसका मी टाइम भी छीन लिया है।

यह उल्लेखनीय है कि कोविड-19 ने लैंगिक असमानता को और बढ़ा दिया है। वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम की एक हालिया जेंडर गैप रिपोर्ट के मुताबिक, अभी जिस तरह के हालात हैं उसकी भरपाई यानी महिला-पुरुष के बीच समानता लाने में 136 वर्ष लग जाएंगे। वहीं, कोविड-19 की वजह से जो आíथक लैंगिक असमानता पैदा हुई है उसे खत्म होने में तो 250 से अधिक वर्ष लग जाएंगे यानी ऐसे बुरे हालात से निपटना आसान तो नहीं, लेकिन आत्मशक्ति जगा लें तो सब संभव है। इस संदर्भ में स्त्रियां क्या करें के सवाल पर डॉ. सुजाता मिन्हास कहती हैं कि स्त्रियां देवी के बोझ से ऊपर उठें। खुद को कमजोर न समङों और अपना साथ मजबूती से थामे रहें। इसके लिए अपनी जिम्मेदारियों में से कुछ पल चुराने यानी मी टाइम निकालने की कला सीख लें।

नदी हैं आप: युवा लेखिका निकिता चावला कहती हैं कि क्या शक्ति वही है, जो शोर करे, विध्वंस करे और क्षण में सब बदल दे? नहीं। शक्ति नदी की तरह शांत होती है और जरूरत पड़े तो बाढ़ का तांडव भी दिखा सकती है। यही होती है स्त्री। वह देवी के अलग-अलग रूप की तरह है, पर शक्ति को हमारे समाज में आमतौर पर ओजपूर्ण अर्थो में ही समझा जाता रहा है। इसलिए जो स्त्रियां शांत हैं, अपने काम को चुपचाप बिना शोर के अंजाम दे रही हैं, उन्हें शक्तिहीन, कमजोर, अबला आदि मान लिया लिया जाता है। मेरा निजी अनुभव भी यही है। भले ही इस धारणा के खिलाफ लड़ना पड़ा है, लेकिन मुङो पता है कि मैं जितनी मजबूत बनूंगी, उतनी ही सुंदर होगी मेरी दुनिया।

जो मिला है उस पर करें यकीन: फैशन डिजाइनर उर्वशी कौर कहती हैं कि स्वयं की शक्ति में विश्वास करना ही मेरे लिए पूजा है। हमें जो मिला है उसका आदर करना है और बेहतर करना है अपने व दूसरों के लिए। अगर हम इस ज्ञान को समझते हैं तो एक बेहतर इंसान बन सकते हैं। दरअसल, लोग वैज्ञानिकता को भूलकर केवल रीति-रिवाजों में विश्वास करने लगते हैं। वे यह नहीं समझते नहीं कि इन्हें बनाने के वैज्ञानिक कारण क्या हैं? पूजा कर रहे हैं तो इसका कारण जानना जरूरी है। हमारी संस्कृति में वैज्ञानिक तरीके से शक्ति को परिभाषित किया गया है। आज विज्ञान और धर्म में कोई ज्यादा अंतर नहीं है।

और बढ़े स्त्री शक्ति: वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया कहती हैं कि स्त्री शक्ति की आराधना के इस पर्व पर हमें यह कामना करनी चाहिए कि स्त्रियों की शक्ति में और वृद्धि हो। अगर हम स्त्रियों को निर्बल बनाकर रखेंगे तो इस पर्व को मनाने का कोई अर्थ नहीं है साथ ही नौ दिन व्रत रखना भी व्यर्थ है। अपने घर में उपस्थित हाड़ मांस की स्त्री की शक्ति को पहचानें और उसकी शक्ति को और बढ़ाएं। इस पर्व को प्रतीकात्मक नहीं, वास्तविक बनाएं।

लड़कियों को दें आत्मविश्वास का प्रशिक्षण: बनारस हिंदू यूनिवर्सटिी में समाजशास्त्र की प्रोफेसर डॉ. श्वेता प्रसाद कहती हैं कि बचपन से ही लड़कियों को घर पर ही आत्मविश्वास बढ़ाने का प्रशिक्षण देना चाहिए। इससे वे आत्मशक्ति की अहमियत समझ सकती हैं और जिंदगी में आने वाली हर कठिनाई का डटकर मुकाबला भी कर सकती हैं।

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