सड़क पार करें मगर ध्यान से, रिपोर्ट में है इससे जुड़ी कई चौकाने वाली बातें

नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। जल्दबाजी में कहीं से भी सड़क पार करने की गलती न करें। बच्चों को भी ऐसा न करने दें। क्योंकि सामने से आ रहे वाहन का समय पर ब्रेक न लगा तो आपकी जान भी जा सकती है। सड़क पार करते समय यातायात नियमों का पालन करें और सुरक्षित रहें।

सिग्नल का इंतजार करें

पैदल सड़क पार करने के लिए ट्रैफिक सिग्नल का इंतजार करें। वॉक का सिग्नल आने या फिर यातायात पुलिस के इशारे के बाद ही सड़क पार करने की लिए बढ़ें। सड़क पार करते समय बाएं ओर दाएं दोनों ओर देखें कि कोई वाहन तो नहीं आ रहा।

चालक से आंखों के माध्यम से संपर्क बनाएं

एक शोध के अनुसार सड़क पार करते समय सामने से आ रहे वाहन चालक से आंखों से संपर्क बनाए रखें। इससे दोनों को एक दूसरे की भौतिक और मनोस्थिति का आभास होता है। इससे हादसे का खतरा कम हो जाता है। फिर भी चालक और सड़क पार करने वाले दोनों को सतर्क रहना चाहिए।

वॉक सिग्नल नहीं तो..

जहां सड़क पर वॉक सिग्नल नहीं है वहां से सड़क पार करना ही नहीं चाहिए। फिर भी सड़क पार करने की मजबूरी है तब ट्रैफिक पुलिस की मदद लेनी चाहिए। सड़क पार करते समय दोनों हाथों से दाएं और बाएं से आ रहे वाहनों को रुकने का इशारा करना चाहिए।

वाहन चालक भी रहें सावधान

वाहन चलाते समय येलो सिग्नल दिखे तो वाहन की रफ्तार कम कर लें। रेड सिग्नल पर गाड़ी रोक लें। ग्रीन सिग्नल पर ही आगे बढ़ें। सड़क किनारे लगे बोर्ड में आगे आने वाले भीड़भाड़ वाले इलाके, चौराहों और स्कूल को देखकर वाहन की गति को संतुलित कर लें।

ग्रामीण सड़कों पर क्या करें

ग्रामीण इलाके की सड़कों पर अगर जेब्रा क्रासिंग या ट्रैफिक सिग्नल जैसी चीजें नहीं हैं तो किसी नजदीकी चौराहे में या खुली सड़क में जाएं, जहां पर पर्याप्त रौशनी हो। यहां सड़क पर दोनों और देख लें जब कोई वाहन न आ रहा हो तभी सावधानी के साथ सड़क पार करें।

बच्चों पर दें ध्यान

एक शोध के अनुसार 6-14 साल तक के बच्चे अकेले सड़क पार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होते हैं। वह वाहन चालक पर अपनी सुरक्षा के लिए निर्भर होते हैं। वाहन करीब आते देख बच्चे हड़बड़ा जाते हैं ऐसे में हादसे की आशंका होती है। इसलिए मातापिता को चाहिए कि बच्चे का हाथ पकड़कर सड़क पार कराएं।

16 सालों में भी नहीं बदली तस्वीर

सड़क हादसों पर यातायात पुलिस हर साल रिपोर्ट तैयार करती है। 2001 से 2017 के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि सड़क हादसों में मरने वालों में राहगीरों के अनुपात में कोई खास अंतर नहीं आया है। साल 2001 में राहगीरों का अनुपात 50.16 फीसद था, जबकि 2017 में यह 44.31 फीसद था। यह अनुपात सबसे कम 2013 में 41.15 फीसद रहा। हर रिपोर्ट में खामियों और अव्यवस्था का जिक्र किया गया। इस रिपोर्ट के आधार पर राजधानी में नई सड़कें बनीं। कुछ जगहों पर लालबत्ती को हटाया गया, लेकिन नतीजों में अप्रत्याशित कमी नहीं आई।

बच्चे और किशोर भी आ रहे चपेट में

सड़क पार करने के दौरान बच्चे और किशोर भी हादसों के शिकार हो रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में दस साल से कम उम्र के 39 बच्चों और 10 से 18 साल के 52 किशोरों की भी सड़क पार करते हुए मौतें हुईं। 2016 में यह आंकड़ा क्रमश: 48 और 50 था। विशेषज्ञों की मानें तो बच्चों में खतरों को भांपने की क्षमता कम होती है। इसी वजह से सड़क पार करने के दौरान जो मानसिक संयोजन होना चाहिए, वह उनके पास नहीं होता है। इसके अलावा कई बार वाहन चालकों की लापरवाही से भी कई मासूम शिकार बन जाते हैं। गत एक नवंबर को हर्ष विहार इलाके में गली में खेल रहे एक सात साल के मासूम को कार चालक ने कुचल दिया। इसमें उसकी मौत हो गई। कार चालक ने घटना के वक्त कान में इयरफोन लगा रखा था।  

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