संवादी : बिकाऊ लेखन से है परहेज

लखनऊ। यह सच है कि पैसे और शोहरत की चाह में युवा लेखक फिल्मी लेखन की ओर आकर्षित हैं, दूसरी ओर ऐसे युवा लेखक भी हैं जो फिल्में लिखना तो चाहते हैं पर अपने पैदा किए किरदारों और परिवेश की हत्या की कीमत पर नहीं। यह बात संवादी के 'कहानी जो बिकती है' सत्र में कहानी फिल्म के लेखन से चर्चा में आयीं अद्वैता काला और जेड प्लस फिल्म के लेखक रामकुमार सिंह के साथ गिरिराज किराडू की बातचीत में उभर कर आयी।

अद्वैता काला जहा अपनी कहानियों पर फिल्में बनने पर तो सहमत हैं लेकिन अभिनेता और निर्देशक की माग पर लिखने की बाध्यता से सहमत नहीं हैं। वह अपने लेखन की स्त्री संवेदना और पात्रों के साथ छेड़छाड़ के विरुद्ध हैं। शायद यही वजह है कि वह स्वतंत्र लेखन के बाद टीवी सीरियल के लिए लिखना ज्यादा पसंद करती हैं। रामकुमार सिंह कहते हैं फिल्म के लिए लिखना ठीक है, लेकिन लेखक वहा दोयम और प्राथमिक स्टोरी टेलर निर्देशक हो जाता है। हा, पैसे मिलते हैं जो जरूरत है। गिरिराज किराडू का इस पर व्यंग्यात्मक सुझाव था कि फिल्म लिखना है तो दूसरी नौकरी क ा इंतजाम जरूरी है। इस बात पर अद्वैता काला और रामकुमार सिंह दोनों सहमत दिखे कि फिल्में लिखने के लिए मुंबई जाने के बजाए उनके भीतर का लेखक स्वाभिमानपूर्ण ढंग से अपने शहर में रहकर लिखना पसंद करेगा। हालाकि गिरिराज किराडू का यह मत था कि पिछले पाच वर्षो में कहानी पर फिल्में बनने का दौर शुरू हुआ है लेकिन अब भी लेखक को अपेक्षित स्थान नहीं मिला है।

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