मुश्किल है भाजपा-शिवसेना का साथ, बयानबाजी ने बहुत दूर कर दिया दोनों दलों को

 ओमप्रकाश तिवारी, मुंबई। महाराष्ट्र में कांग्रेस-राकांपा के भरोसे बैठी शिवसेना अब तक दोनों दलों से समर्थन का पत्र नहीं ले पाई है। इस बीच हालात ऐसे बन गए हैं कि अगर शिवसेना भाजपा की ओर आना भी चाहे, तो आसान नहीं होगा। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के साथ शिवसेना के रिश्ते काफी तल्ख हो चुके हैं। दरअसल, दोनों दलों के एक बार फिर साथ आने के कयास तब लगने शुरू हुए, जब मीडिया में ऐसी खबरें आई कि 50-50 पर सहमति बने तो फिर दोनों का गठबंधन हो सकता है। सावरकर को भारत रत्न देने के मसले पर दोनों दलों की एक राय ने भी इस चर्चा को बल दिया है।

सीएम पद के लिए अड़ने पर गठबंधन टूटा

विधानसभा चुनाव साथ लड़ने के बाद सीएम पद के लिए 50-50 की मांग पर अड़ जाने के कारण भाजपा के साथ शिवसेना का गठबंधन टूट चुका है। राज्य ही नहीं, केंद्र सरकार से भी उसने अपने एकमात्र मंत्री डॉ. अरविंद सावंत को इस्तीफा दिलवा दिया है। अब हाल यह है कि जिनके भरोसे उसने यह जोखिम लिया, उन कांग्रेस-राकांपा की तरफ से अब तक उसे निराशा ही हाथ लगी है। कांग्रेस-राकांपा का समर्थन पत्र नहीं जुटा पाने के कारण 11 नवंबर को राजभवन जाकर भी शिवसेना प्रतिनिधिमंडल को खाली हाथ लौटना पड़ा था। अब भी कांग्रेस-राकांपा कभी न्यूनतम साझा कार्यक्रम, तो कभी अपने आलाकमान की अंतिम मंजूरी के बहाने शिवसेना को बहलाती आ रही हैं।

सोनिया और पवार की मुलाकात के बाद उलझन और बढ़ी

सोमवार को राकांपा प्रमुख शरद पवार और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की मुलाकात के बाद पवार के बयान ने स्थिति को और उलझा दिया। उन्होंने कहा था कि भाजपा-शिवसेना ने साथ चुनाव लड़ा था, सरकार के बारे में उनसे पूछिए। दूसरी ओर सरकार गठन नहीं होने से शिवसेना सहित सभी दलों के नवनिर्वाचित विधायकों की हिम्मत टूटने लगी है। क्षेत्र में उन्हें अधिकार हासिल नहीं हैं। अगले माह होने वाला विधानमंडल का सत्र भी अधर में है।

शिवेसना विधायकों में निराशा

शिवसेना विधायकों को भाजपा से अलग होकर कांग्रेस-राकांपा से हाथ मिलाने का निर्णय रास नहीं आ रहा है, क्योंकि वह कांग्रेस-राकांपा से ही लड़कर जीते हैं। कार्यकर्ताओं का संकट उनसे भी बड़ा है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच राजनीतिक टकराव ही नहीं, कहीं-कहीं निजी दुश्मनी जैसा भी है। पार्टी पर इनका भी दबाव है कि भाजपा के साथ सरकार बनाने का प्रयास हो।

बहुत बढ़ चुकी है तल्खी

 शिवसेना के आला नेता बीते कुछ दिनों में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के विरुद्ध कई बार कड़े शब्दों का इस्तेमाल कर चुके हैं। स्वयं शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे भी अपनी एक प्रेस कांफ्रेंस में भाजपा को अमित शाह एंड कंपनी कहकर मजाक उड़ा चुके हैं। शिवसेना प्रवक्ता एवं सांसद संजय राउत भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को झूठा साबित करते रहे हैं। भाजपा नेतृत्व इस व्यवहार से चिढ़ा हुआ है। पत्रकारों को दी दिवाली पार्टी में पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने नाखुशी जाहिर करते हुए कहा था कि शिवसेना को अपने इस व्यवहार पर खेद व्यक्त करना होगा, तभी वह शिवसेना के साथ सरकार बनाने पर विचार करेंगे।

जल्द बनेगी शिवसेना की सरकार : राउत

इन अनिश्चितताओं के बीच शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने महाराष्ट्र में 170 विधायकों के समर्थन से जल्द शिवसेना के नेतृत्व में सरकार बनने का दावा किया है। राकांपा प्रमुख शरद पवार की टिप्पणी पर राउत ने कहा, 'आप पवार और हमारे गठबंधन की चिंता मत कीजिए। हमारी सरकार बनने में कोई संशय नहीं है। पवार को समझने के लिए 100 जन्म लेना पड़ेगा।' राउत ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन का नया फॉर्मूला देने को लेकर केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आठवले को खुद पर ध्यान देना चाहिए, शिवसेना की चिंता नहीं करें।

मुहम्मद गौरी जैसी विश्वासघाती है भाजपा : शिवसेना

 शिवसेना ने भाजपा की तुलना मुहम्मद गौरी से की है। मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में शिवसेना ने लिखा कि पृथ्वीराज चौहान से कई बार जीवनदान पाने के बाद भी मुहम्मद गौरी ने मौका मिलने पर उनकी हत्या कर दी थी। महाराष्ट्र में शिवसेना ने भी ऐसे ही कृतघ्न लोगों को कई बार बचाया था, जो अब हमारी पीठ पर वार कर रहे हैं। शिवसेना ने अपने सांसदों को सदन में विपक्ष में बैठाए जाने पर भी निशाना साधा। पार्टी ने लिखा, 'राजग की बैठक हुए बिना किसने फैसला लिया कि हमारे सांसदों के बैठने की व्यवस्था बदली जाएगी? पहले लालकृष्ण आडवाणी राजग के प्रमुख थे और जॉर्ज फर्नाडीस संयोजक थे। अब इन भूमिकाओं में कौन है?' शिवसेना ने पूछा कि इस बारे में अन्य सहयोगी दलों को बताया गया था या नहीं।

स्वार्थी हो जाना गलत है : भागवत

 महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना के बीच टकराव पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दोनों दलों को नसीहत दी है। उन्होंने किसी का नाम लिए बिना कहा, 'सबको पता है कि अगर दोनों पक्ष किसी बात पर लड़ेंगे तो दोनों को नुकसान होगा। स्वार्थ अच्छी चीज नहीं है, लेकिन बहुत कम लोग ही स्वार्थ छोड़ पाते हैं। बाते चाहे देश की हो या व्यक्तिगत हो।'

 

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