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विशेषज्ञों की राय, कोरोना के इलाज में जरूरी सावधानियों के साथ-साथ दिल व अन्य अंगों का ख्याल भी जरूरी

मानना है कि 40 दिन मरीज की स्थिति पर नजर रखी जानी चाहिए। इस दौरान कुछ समस्याएं खड़ी हो सकती।

कोरोना का सीधा प्रहार चूंकि फेफड़ों पर होता है इसलिए डॉक्टर का पूरा ध्यान सर्दी खांसी बुखार का इलाज करने पर रहता है। कई बार मुंह का स्वाद चला जाता है। आंखें लाल हो जाती हैं। इनका भी इलाज कर लिया जाता है। लेकिन अंदरूनी नुकसान पर ध्यान नहीं जाता।

Vijay KumarTue, 04 May 2021 08:02 PM (IST)

ओमप्रकाश तिवारी, मुंबई : इन दिनों अक्सर खबरें सुनने को मिलती हैं कि कोरोना के इलाज के दौरान मरीज का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया या मरीज किसी अन्य गंभीर बीमारी का शिकार हो गया। जानकार डाक्टरों का मानना है कि कोरोना के इलाज के दौरान समय पर सही जांच अथवा सही दवाएं न मिल पाने के कारण ऐसा हो रहा है। देखने में आ रहा है कि देश भर में कोरोना मरीजों की बड़ी संख्या का इलाज करने के लिए हर प्रकार के डाक्टरों की सेवाएं ली जा रही हैं। यहां तक कि अस्पतालों में प्रशिक्षित नर्सों की भी कमी हो गई है। ऐसे में डॉक्टर अपना पूरा ध्यान अपने मरीज को पाजिटिव से निगेटिव करने में ही लगा रहे हैं। इसके लिए आईसीएमआर या विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुझाई दवाओं एवं मानकों का उपयोग किया जा रहा है। लेकिन इस आपाधापी में कई चीजों का अनुपात गड़बड़ा रहा है, जिसका नुकसान मरीज को उठाना पड़ता है। मुंबई के वरिष्ठ फिजीशियन डॉ.आशीष तिवारी कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय विशेज्ञों का मानना है कि कोविड से ठीक होने के बाद भी 40 दिन मरीज की स्थिति पर नजर रखी जानी चाहिए। इस दौरान कुछ समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

नसों-धमनियों सहित अन्य अंगों में भी सूजन होती है पैदा

डॉ. आशीष कहते हैं कि कोरोना का सीधा प्रहार चूंकि फेफड़ों पर होता है, इसलिए डॉक्टर का पूरा ध्यान सर्दी, खांसी, बुखार का इलाज करने पर रहता है। कई बार मुंह का स्वाद चला जाता है। आंखें लाल हो जाती हैं। इनका भी इलाज कर लिया जाता है। लेकिन इन बाहरी लक्षणों के चक्कर में कोविड द्वारा पहुंचाए जा रहे अंदरूनी नुकसान पर ध्यान नहीं जाता। कोविड अंदर की नसों-धमनियों सहित अन्य अंगों में भी सूजन पैदा करना शुरू कर देता है। 

ध्यान न दिया जाये तो रक्त में थक्के बनने शुरू हो जाते हैं

दूसरी ओर रक्त गाढ़ा और चिपचिपा होने लगता है। यदि समय पर इसका ध्यान न दिया गया, तो रक्त में थक्के बनने शुरू हो जाते हैं। ये थक्के दिल, मस्तिष्क, फेफड़े, गुर्दे कहीं भी जाकर फंस सकते हैं, जिसके कारण हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक जैसी जानलेवा परिस्थितियां अचानक सामने आ जाती हैं, और सिर्फ कोविड के इलाज में उलझे डॉक्टर इनका सामना करने के लिए तैयार नहीं होते। जिनके कारण मरीज को बड़ा नुकसान उठाना पड़ जाता है। इस प्रकार रक्त की तरलता का पता लगाने के लिए ही डी-डायमर टेस्ट करवाया जाता है। ताकि समय रहते मरीज को आवश्यकतानुसार रक्त पतला करने की दवा देकर घातक परिस्थितियों से बचाया जा सके।

शुरुआत में शरीर खुद कोरोना से लड़ना शुरू करता है

डॉ. तिवारी कोविड के इलाज के दौरान स्टेरायड के गलत समय पर इस्तेमाल को लेकर भी सचेत करते दिखाई देते हैं। उनके अनुसार आजकल देखा जा रहा है कि डॉ. कोविड मरीज को इलाज के शुरुआती दौर से ही स्टेरायड देना शुरू कर देते हैं। जबकि शुरूआती दौर में स्टेरायड नहीं देना चाहिए। स्टेरायड के प्रभाव से वायरस को और मजबूती मिल सकती है और मरीज के ठीक होने में देरी लग सकती है। उनके अनुसार शुरुआती दौर में मरीज का शरीर खुद कोरोना वायरस से लड़ना शुरू करता है। उस दौरान हम कोई एंटी वायरल दवा ले सकते हैं, लेकिन स्टेरायड नहीं। 

कोई एंटी वायरल दवा ले सकते हैं, लेकिन स्टेरायड नहीं

इसी प्रकार कोविड के स्पष्ट लक्षणों वाले मरीज के कुछ और टेस्ट करवाने भी जरूरी होते हैं, ताकि उसकी अंदरूनी स्थिति का सही पता लगाकर उचित इलाज किया जा सके। इनमें सीआरपी, इंटरल्यूकीन 6, सीरम फेरिटीन, सीरम एलडीएच, सीरम क्रियेटिनीन और सीबीसी जैसी जांचें मरीज की पूरी स्थिति स्पष्ट कर देती हैं। जिसके अनुसार इलाज करके मरीज को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है।  

इलाज से परिचय के लिए डॉक्टर्स के रिफ्रेशर की जरूरत

आईएमए के सदस्य डॉ.आशीष तिवारी कहते हैं कि कोरोना की पहली लाट से अब तक इसकी प्रकृति में कई परिवर्तन आ चुके हैं और लगातार आते भी जा रहे हैं। जिनसे डेढ़ साल से इलाज कर रहे डॉक्टर भी परिचित नहीं हैं। ऐसे डॉक्टरों को कोरोना की बदलती प्रकृति एवं उसके अनुकूल दवाओं से परिचित कराने के लिए आईसीएमआर जैसी संस्थाओं को इन दिनों हर महीने ऑनलाइन रिफ्रेशर कोर्स आयोजित करने चाहिए। ताकि देश भर के डॉक्टरों को कोरोना के नए स्वरूप एवं उसके इलाज से परिचित कराया जा सके।

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