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गुरू पूर्णिमा के मौके पर पकाई जाने वाली पूनम कचौड़ी का क्या है महत्व व इससे जुड़ी कुछ रोचक बातें

पुष्पेश पंत

आजकल तिथि के अनुसार पर्व दर्शाने वाले पंचांग दुर्लभ होते जा रहे हैं। पहले कलाई में बंधी घड़ी और अब मोबाइल ही तारीख, वार, महीना बता देते हैं। इस कारण पारंपरिक महत्व के दिन आकर चले भी जाते है और हमें पता भी नहीं चलता। उनका प्रतीकात्मक महत्व भी अब लोग भूलने लगे हैं। यदि एक मित्र ने यह सवाल नहीं उठाया होता कि यह पूनम कचौरी क्या होती है?' तो 'गुरू पूर्णिमा' वाला प्रसंग बिसराया ही रह जाता।

पूनम कचौरी आषाढ़ पूर्णिमा के अवसर पर श्रीनाथ जी के मंदिर में पकाई जाती है। जो इस दिन भोग में विधेय रूप से शामिल की जाती है। यूं तो कचौरी पुष्टिमार्गी मंदिरों के छप्पन भोग में वर्ष में अनेक बार शामिल की जाती है परंतु पूनम कचौरी दो या चार बार ही प्रकट होती है। आम तौर पर जो कचौरी प्रभु के लिए पकवान का रूप धारण करती है वह मूंग दाल की पीठी से भरी होती है। पूनम कचौरी की विशेषता है इसका उरद दाल की पीठी से भरा होना। कुछ बरस पहले तक इस पर्व पर मध्य उत्तर प्रदेश और पूर्वाचल के देहात-कस्बों में घरों पर बेड़वी रोटी(दाल की भरवां रोटी) और गेहूं के आटे की लपसी बनती थी। इस मौसम में आमों की बहार रहती है सो आम के साथ भी इसकी जुगलबंदी साधी जाती थी।

भगवान की मेहमाननवाजी

गुरू पूर्णिमा के चार दिन पहले पड़ने वाली एकादशी हरिशयिनी एकादशी के नाम से जानी जाती है। आस्थावान हिंदुओं का मानना है कि इस दिन से विष्णु भगवान शेषशैया पर विराजमान होकर चार माह के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं। चतुर्मास के इन चार महीनों में शादी-ब्याह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य नहीं होते थे क्योंकि उन्हें कल्याणकारी आशीर्वाद देने को अन्य देवी-देवता भी सुलभ नहीं रहते। मान्यता यह है कि वह सब भी श्रीकृष्ण के आमंत्रण पर इन चार महीनों में ब्रजभूमि में विश्राम करते है। इन देवताओं की आवभगत में ही यहां तरह-तरह के पकवान परोसने-खाने की परंपरा का सूत्रपात हुआ है।आस्था में छिपी सेहत

इसे यदि सेहत की दृष्टि से देखें तो आस्था का सहारा लेकर आम आदमी को बदलते मौसम के अनुसार अपने खाने में परिवर्तन का संदेश दिया जाता था। वर्षा ऋतु में सूक्ष्म कृमिजनित रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है और यह सर्वविदित है कि गहरे तले वाले व्यंजन विषाणुओं का नाश करते हैं और अधिक टिकाऊ होते हैं। बंगाल और ओडि़सा में अरांधन नामक पर्व यही काम पूरा करता है, वह भी रसोई की साफ सफाई को सुनिश्चित करने की याद दिलाकर।

गुरू-शिष्य परंपरा की याद

अब जो सवाल मन में कुलबुलाता है वह यह है कि पूनम कचौरी तथा अन्य पकवानों का गुरू पूर्णिमा से क्या नाता हे। इसकी पड़ताल करने के लिए गुरू के साथ शिष्य के आत्मीय रिश्ते को समझना बेहद जरूरी है। गुरू मात्र अध्यापक का पर्याय नहीं, वह प्रेरक, प्रशिक्षक, पथ प्रदर्शक, प्रोत्साहक एक साथ होता था। गोविंद से भी गुरुतर! जब ब्रह्मचारी शिष्य दीक्षांतोपरांत स्नातक बन घर लौटता तब कृतज्ञता ज्ञापन में यथा साम‌र्थ्य गुरू दक्षिणा समर्पित करता। दक्षिणा शब्द के मूल के साथ अनेक अन्य शब्द जुड़े हैं। दक्षिण दिशा भी है-बहिर्मुखी, दाहिना हाथ भी, दक्षता का अर्थ कौशल भी है जो गुरू कृपा से ही हासिल होता है- एक तरह से गुरू का प्रसाद है। प्राचीन भारत में शिष्य वर्षो गुरुकुल में रहते थे। गुरू के परिवार के सदस्य के रूप में गृहकार्य में हाथ बंटाते। यह अनुशासन भी था और जीवन-यापन के लिए आवश्यक प्रशिक्षण भी। अधिकांश गुरू वनवासी तो थे पर वानप्रस्थी नहीं। उपनिषदों से लेकर पौराणिक आख्यानों में गृहस्थ गुरू परिवारों का उल्लेख मिलता है। गुरू परिवारों तथा उनके साथ रहने वाले शिष्यों के लिए शासक अग्राहार ग्राम दान में देते थे। यह अभयारण्य सरीखे होते थे- करमुक्त, जहां सैनिकों व शिकारियों का प्रवेश निषिद्ध था। जाहिर है गुरुकुलों में बदलते ऋतुचक्र के अनुसार खान-पान बदलता था, जिसके चलते किशोर-तरुण शिष्य वयस्क होने पर भी गुरुकुल का स्वाद भूलते नहीं थे। संभवत: इसी कारण पूनम कचौरी तलने की परंपरा अभी हाल तक अक्षत रह सकी!

ज्ञान दान का दिन

गुरू पूर्णिमा का पर्व अपने सभी गुरुओं को सस्नेह सादर स्मरण करने का दिन है। जिस किसी ने आपको कुछ भी सिखाया हो, सही दिशा दिखलाई हो वह आपका गुरू है। आदिगुरू महेश्वर शिव माने जाते हैं, जिनके बारे में प्रसिद्ध है कि गुरूपूर्णिमा के दिन ही उन्होंने सप्तऋषियों को योग का ज्ञानदान किया था। शिव के अनेक रौद्र और बीहड़ भैरव रूप हैं परंतु शिक्षक गुरू के रूप में उनकी दक्षिणामूर्ति मुद्रा सदैव कल्याणकारी दर्शाई जाती है। नटराज, वीणापाणि, वैद्यनाथ, पशुपति, केदारनाथ जैसे विशेषण हमें याद दिलाते हैं कि संगीत, नृत्य, व्याकरण और भी न जाने कितने अनुशासनों और ज्ञान-विज्ञान की धाराओं का स्रोत शिव हैं। शस्त्रास्त्र संचालन हो या उपद्रवी गंगा को अपने सिर पर धारण कर पर्यावरण का संरक्षण, हलाहल गरल का पान कर घातक संकट से जीव-जंतुओं को जीवनदान कृपालु आदिगुरू के आख्यान के साथ जुड़े ढेरों प्रसंग हैं। इन्हें अक्षरश: सच मानने के बजाय इनका प्रतीकात्मक महत्व कहीं अधिक है। महाभारत को लिपिबद्ध करने वाले कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास को भी इस दिन साभार स्मरण करते हैं। बौद्ध धर्म अनुयाइयों के लिए यह दिन महत्वपूर्ण है क्योंकि गौतम बुद्ध ने इसी दिन सारनाथ में अपना पहला प्रवचन किया था।

त्यागें पूर्वाग्रह के बंधन

भारत में दार्शनिक राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णनन् का जन्मदिन (5 सितंबर) अध्यापक दिवस घोषित किया गया है परंतु इसे सरकारी रस्म अदायगी की तरह ही मनाया जाता है। इसमें गुरू पूर्णिमा जैसी आत्मीय ऊष्मा कहां? अंत में यह भी न भूलें कि सभी गुरू स्नेही उदार या पक्षपात से मुक्त नहीं होते थे। आदिवासी शिष्य एकलव्य से गुरू दक्षिणा में अंगूठा कटवा लेने वाले द्रोण के प्रति श्रद्धा सहज नहीं। कर्ण के प्रति भेदभाव भी उनके अपार ज्ञान को कलंकित ही करता है, ऐसा ही कुछ गुस्सैल परशुराम के कथानक से भी इंगित होता है। वे जातिवादी ब्राह्मण मोह से बुरी तरह ग्रस्त थे, इसी कारण उन्होंने कर्ण को भयंकर श्राप दे दिया था। गुरू पूर्णिमा आज हमें यह अवसर सुलभ कराती है कि हम तटस्थ भाव से पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर शिक्षा, ज्ञान के अनुशासन तथा संस्कार के साथ घनिष्ठ संबंध को समतामूलक समाज और जनतांत्रिक प्रणाली के संदर्भ में दोबारा परिभाषित करने की चुनौती को स्वीकार करें पूनम कचौरी का आनंद लेते हुए!

(लेखक प्रख्यात खान-पान विशेषज्ञ हैं)

Pic credit- Freepik

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