घंटों बैठे रहकर टीवी देखना बन सकता है मोटापे के साथ खर्राटों की भी वजह

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के रिसर्चर्स ने अपनी हालिया रिसर्च में दावा किया है कि एक ही जगह पर बैठे रहने की आदत से ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया हो सकता है। इस वजह से खर्राटे का खतरा 78 परसेंट तक बढ़ जाता है।

Priyanka SinghMon, 26 Jul 2021 06:11 PM (IST)
हाथ में रिमोट लेकर टीवी चलाता पुरूष

अगर आप भी दिनभर में 4 घंटे से ज्यादा टीवी देखने के शौकीन हैं तो अलर्ट हो जाएं। ऐसे लोगों में खर्राटे आने का खतरा 78 परसेंट तक बढ़ जाता है। यह दावा हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के रिसर्चर्स ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। रिसर्चर्स ने 10 से 18 साल के ऐसे 1,38,000 बच्चों पर रिसर्च की। उनकी सेहत कैसी है और वो कितना चलते-फिरते हैं, इस पर भी नजर रखी गई। रिसर्च में सामने आया कि एक ही जगह पर बैठे रहने की आदत से ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया हो सकता है। इस वजह से खर्राटे का खतरा 78 परसेंट तक बढ़ जाता है। इतना ही नहीं, रिसर्चर्स ने सलाह दी है कि ऐसे लोग जो ऑफिस में दिनभर बैठे रहते हैं, उन्हें भी इसकी भरपाई अधिक एक्सरसाइज करके करनी चाहिए।

क्यों खतरनाक है स्लीप एप्निया?

स्लीप एप्निया ऐसी स्थिति है, जब कोई भी एक सांस नली रात में पूरी तरह से ब्लॉक हो जाती है।

ऐसा होने पर नॉर्मल तरीके से सांस लेना मुश्किल हो जाता है। यही स्थिति खर्रोटों में बदल जाती है।

यह खतरनाक इसलिए है क्योंकि अगर समय पर इसका इलाज न कराया जाए तो कैंसर, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक, ग्लूकोमा, स्ट्रोक डायबिटीज होने का खतरा भी बढ़ता है।

विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, देशभर में 30 से 69 साल की उम्र में 100 करोड़ लोग स्लीप एप्निया से जूझते हैं। इसका इलाज कराना जरूरी है।

फिजिकल एक्टिविटीज है जरूरी

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन कहता है, एक इंसान को हर हफ्ते 150 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी जरूर करनी चाहिए।

ऐसे में रिसर्चर्स ने सलाह दी है कि लोगों को डब्ल्यूएचओ की यह सलाह मानने के साथ टीवी देखने का समय 4 घंटे से कम कर देना चाहिए।

इससे खर्राटों का खतरा कम होगा और ब्रीदिंग फंक्शन सामान्य रहेगी।

वैसे, टीवी देखते समय लोग शुगर ड्रिंक्स और स्नैक्स खाना पसंद करते हैं, बैठे-बैठे ऐसा खानपान वजन को बढ़ाने का काम करता है।

ऐसे में वजन बढ़ने पर ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया का खतरा बढ़ता है।

8,733 बच्चों में भी मिले मामले

जिन 1.38,000 बच्चों पर रिसर्च की गई थी उनमें से एक भी ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया का मरीज नहीं था।

रिसर्च के दौरान सामने आया कि जिन बच्चों ने टीवी के सामने रोजाना घंटों बिताए उनमें से 8,733 बच्चों में स्लीप एप्निया की पुष्टि हुई।

Pic credit- unsplash

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