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Jagran Dialogues: Corona के डबल म्यूटेंट स्ट्रेन, Covishield और Covaxin के बारे में एक्सपर्ट से जानिए

एक्सपर्ट से जानिए कोविड-19 के डबल म्यूटेंट स्ट्रेन, Covishield और Covaxin के बारे में

Jagran Dialogues में मंगलवार को कोविड-19 के डबल म्यूटेंट वैक्सीनेशन प्रोसेस और अलग-अलग वैक्सीन पर जागरण न्यू मीडिया के सीनियर एडिटर Pratyush Ranjan ने ICMR के Epidemiology and Communicable Diseases (ECD) डिविजन के प्रमुख डॉक्टर समीरन पांडा से विस्तार से चर्चा की।

Ruhee ParvezWed, 12 May 2021 12:45 PM (IST)

नई दिल्ली, लाइफस्टाइल डेस्क। COVID-19 Vaccine: कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने देश में कोहराम मचाया हुआ है। पिछले एक महीने में डबल म्यूटेंट की वजह से कोविड-19 महामारी का भारत में सबसे भयावह रूप देखने को मिला है। ये ऐसा वक्त है, जब हमें कोविड-19 से जुड़े सभी प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन करना होगा। साथ ही वैक्सीन जल्द-से-जल्द लगवानी भी ज़रूरी हो गई है। Jagran Dialogues में मंगलवार को कोविड-19 के डबल म्यूटेंट, वैक्सीनेशन प्रोसेस और अलग-अलग वैक्सीन पर जागरण न्यू मीडिया के सीनियर एडिटर Pratyush Ranjan  ने ICMR के  Epidemiology and Communicable Diseases (ECD) डिविजन के प्रमुख डॉक्टर समीरन पांडा से विस्तार से चर्चा की। पेश हैं बातचीत के कुछ अंश:

सवालः कोवैक्सीन, कोविशील्ड और स्पुतनिक-वी नाम की अलग-अलग वैक्सीन्स को किन कंपनियों ने विकसित किया है? इन तीनों में क्या अंतर है और ये शरीर के अंदर जाकर किस तर से काम करती हैं?

जवाब: कोवैक्सीन भारत में बनी हुई है। इसका विकास इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और भारत बॉयोटेक ने मिलकर किया है। वायरस को निष्क्रिय करके इस वैक्सीन को बनाया गया है। भारत बायोटेक की फैक्टरी हैदराबाद में है। कोवैक्सीन को सुई के जरिए लगाया जाता है। इसके दो डोज लगाए जाते हैं और दोनों के बीच चार हफ्ते का अंतर होना चाहिए। 

भारत में सीरम इंस्टीट्युट ऑफ इंडिया लिमिटेड में कोविशील्ड का प्रोडक्शन हो रहा है। सीरम इंस्टीट्युट पुणे में है और कंपनी की फैक्टरी भी वहीं है। यह वैक्सीन जगत की बहुत जानी-मानी कंपनी है। केवल कोविड-19 की वजह से नहीं बल्कि कई बीमारियों को रोकने वाली वैक्सीन यहां बनती हैं। कंपनी द्वारा बनाई गईं वैक्सीन की सप्लाई भारत से बाहर भी होती है। कोविशील्ड में एडेनोवायरस को लिया जाता है। इस वैक्सीन को ऑक्सफोर्ड ने डेवलप किया है। ब्रिटेन में इसे AstraZeneca ने बनाया है। भारत में सीरम इसे बना रही है। भारत में इसे कोविशील्ड नाम दिया गया है। 

स्पुतनिक रूस से आ रही है। भारत में वह डॉक्टर रेड्डीज़ लैब के साथ मिलकर अपनी वैक्सीन ला रही है। ऐसा नहीं है कि स्पुतनिक केवल रूस से वैक्सीन ला रही है। भारत में रेड्डीज इसे बनाएगी। ये तीनों वैक्सीन पूरी तरह सेफ हैं। 

सवाल: भारत में पिछले एक-डेढ़ महीने से डबल म्यूटेंट का काफी असर देखा जा रहा है। क्या इसका कोई डेटा उपलब्ध है कि डबल म्यूटेंट पर इन तीनों वैक्सीन में से कौन कितना प्रभावी है या है भी या नहीं?  

जवाब: यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। घर-घर में इस बात की चर्चा हो रही है। सबको इस बात की जानकारी है कि वायरस जब अपना आंकड़ा बढ़ाने की कोशिश करता है, तो उसमें थोड़ा-थोड़ा बदलाव आ जाता है। ये भी हो सकता है कि फैलने की वजह से वायरस दुबला हो जाते हैं लेकिन कोई-कोई वायरस सशक्त भी हो जाते हैं। डबल म्यूटेंट जल्द-से-जल्द फैलने में सक्षम है। ऐसे में यह सवाल अहम हो जाता है कि ये वैक्सीन इस डबल म्यूटेंट के खिलाफ कारगर साबित होंगे या नहीं। खुशखबरी ये है कि आइसीएमआर ने इस चीज को टेस्ट किया है और यह देखा गया कि कोवैक्सीन और कोविशील्ड डबल म्यूटेंट, यूके वेरिएंट और ब्राजीलियन वेरिएंट के खिलाफ कारगर है। स्पुतनिक के बारे में डेटा उपलब्ध नहीं है। हमें दुविधा में नहीं पड़ना है। हमें वैक्सीन लगवानी चाहिए। हम इस चर्चा में रह जाते हैं कि म्यूटेंट तो आ गया, हम वैक्सीन लगवाएं या नहीं लगवाएं। ये कारगर रहेगा या नहीं। ये गलत चीज़ है।

सवाल: वैक्सीन की प्रभाविकता क्या होती है? इसे कैसे तय किया जाता है? कोविशील्ड और कोवैक्सीन दोनों की प्रभाविकता कितनी है? 

जवाब: प्रभाविकता को इस तरह समझ सकते हैं कि आप शोध के दौरान दो अलग-अलग ग्रुप को लेते हैं। मान लीजिए कि एक ग्रुप में 100 ऐसे लोगों को शामिल किया गया, जिन्हें वैक्सीन लगायी गयी है। दूसरे ग्रुप में 100 ऐसे लोगों को लिया गया, जिन्हें वैक्सीन नहीं लगाई गई है। अब देखना है कि जिस ग्रुप को वैक्सीन लगाई गई है, उसे वायरस से किस तरह का खतरा है। वहीं, जिस ग्रुप को वैक्सीन नहीं लगी है, उसे वायरस से कितना खतरा है। इसी आधार पर प्रभाविकता तय की जाती है। ये वैक्सीन संक्रमण को रोकने में सक्षम नहीं है। लेकिन इस वैक्सीन की वजह से वायरस से अगर आप संक्रमित होते हैं तो आपको ज्यादा गंभीर लक्षण नहीं होंगे। आप इसके जरिए हॉस्पिटलाइजेशन, ऑक्सीजन की जरूरत और दुर्भाग्यपूर्ण मौत को टाल सकते हैं। इसीलिए वैक्सीन लगवाना बहुत जरूरी है। हालांकि, वैक्सीन लगवाने के बाद भी कोई भी व्यक्ति संक्रमित हो सकता है। क्योंकि यह संक्रमण रोकने वाली वैक्सीन नहीं है। लेकिन इसके साथ ही यह बहुत जरूरी है कि हम वैक्सीन लेने के बाद भी मास्क पहनकर चलें। हमें ये नहीं करना चाहिए कि हम वैक्सीन ले लिए तो गैर-जिम्मेदार हो जाएं और बाहर से वायरस लेकर घर आ जाएं। आपको एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते यह करना चाहिए वैक्सीन लगवाने के बावजूद मास्क पहनना चाहिए। इससे दूसरे लोगों को संक्रमण नहीं फैलेगा। वैक्सीनेशन और मास्क लगाकर हम इस जंग को जीत सकते हैं।

सवाल: कुछ लोग बोलते हैं कि कोवैक्सीन ज्यादा प्रभावी हैं, हम तो कोवैक्सीन लगवाएंगे। लोग इंतजार कर रहे हैं कि वे कोवैक्सीन ही लगवाएंगे कोविशील्ड नहीं लगवाएंगे। क्या यह धारणा सही है?

जवाब: लोगों को इस तरह से नहीं सोचना चाहिए। वैक्सीन गर्भवती महिलाओं के लिए सेफ हैं या नहीं इस बारे में ज्यादा डेटा उपलब्ध नहीं है। ये अलग केस है। लेकिन अन्य व्यस्कों को अगर कोवैक्सीन या कोविशील्ड में से जो भी मिल रहा है, वह लगवा लेना चाहिए। हम यह नहीं बोल सकते हैं कि कोविशील्ड सेफ नहीं है, इसे सपोर्ट करने वाले आंकड़े नहीं हैं। अगर ये सेफ नहीं होती, तो इसे मंजूरी ही नहीं मिलती। फेज़-1 ट्रायल सेफ्टी को लेकर ही होता है। हालांकि, कोई रेयर साइड इफेक्ट किसी भी वैक्सीन में हो सकता है। अभी बहुत जरूरी है कि दूसरी लहर चल रही है कि हमें प्रोटक्शन जल्द-से-जल्द लेना चाहिए। आप दुविधा में मत रहिए और वैक्सीन लगवाइए।

सवाल: ऐसा कहा जा रहा है कि कोवैक्सीन पूरी तरह भारत में विकसित वैक्सीन है, तो क्या यह भारतीय लोगों के लिए अच्छा है क्योंकि यह भारत के लोगों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इस वजह से इसके साइड इफेक्ट कम हैं। इसमें कितनी सच्चाई है?

जवाब: सोशल मीडिया पर ऐसी बातें चलते रहती हैं। हमें कभी-कभी इस बारे में जानकारी मिलती है। देखिए, साइंस एक ऐसा फील्ड है, जिसमें कोई भी देश अकेले कुछ नहीं कर सकता है। मान लीजिए कि भारत में बने कोविशील्ड या कोवैक्सीन को दूसरे देशों में भेजा गया है। साइंस में इंडियन, अमेरिकन या यूके नहीं होता है। हां जरूर, कोवैक्सीन बनाते समय भारतीय वैज्ञानिक, भारतीय कंपनी और आईएसएमआर ने एकसाथ मिलकर इसका विकास किया। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि यह वैक्सीन केवल भारत के लोगों पर कामयाब होगी और अन्य देशों के लोगों पर कारगर साबित नहीं होगी। वैक्सीन साइंस के आधार पर बनता है लेकिन यह हर देश में कामयाब हो सकता है। इसी वजह से हर देश में ड्रग कंट्रोलर या रेगुलेटर होते हैं जो इस बात को देखते हैं कि उनके देश की आबादी पर ये कामयाब हैं या नहीं।

सवाल: वैक्सीन लगवाने के बाद साइड इफेक्ट्स क्यों होते हैं?

जवाब: यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है क्योंकि सभी को चिंता होती है कि मैं वैक्सीन लगवाने जा रहा हूं तो ना जाने किस तरह के साइड इफेक्ट्स हो जाएंगे। वैक्सीन लगवाने के सबसे आम लक्षण हैं सुई लगने की वजह से थोड़ा बहुत दर्द और थोड़ा बहुत बुखार। आप बुखार ठीक करने के लिए पैरासिटामोल खा सकते हैं। इससे इम्युनिटी पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। शरीर मैथेमैटिक्स तो नहीं है। अलग-अलग शरीर है, जो अलग-अलग तरीके से व्यवहार करता है। अगर वैक्सीन लगवाने के बाद कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है तो यह कहना भी गलत होगा कि वैक्सीन ने काम नहीं किया है, इम्युनिटी पैदा नहीं हुआ है। मैं कहना चाहूंगा- आप डरिए मत, ज्यादातर मामलों में हल्का बुखार और दर्द जैसे साइड इफेक्ट देखने को मिले हैं। लेकिन ऐसे खास साइड इफेक्ट नहीं हैं कि हमें डरना चाहिए और वैक्सीन से पीछे हटना चाहिए।

सवाल: क्या पहले डोज के बाद एंटी बॉडी बनने लगती हैं? अगर ऐसा है तो दूसरा डोज लेने की क्या जरूरत है?जवाब: यह बहुत अहम सवाल है। आप जो वैक्सीन ले रहे हैं वह वायरस का एक रूप है। हालांकि, यह बीमारी नहीं फैला सकता है। यह निष्क्रिय रूप में या मृत अवस्था में होता है या वायरस का छोटा एक टुकड़ा जैसे एडेनावायरस लगाया गया। इन्हें ही ये वैक्सीन के रूप में लगाया जाता है। इन्हें एंटीजेन कहा जाता है। एंटीजेन को देखते ही शरीर का इम्युन सिस्टम दो तरीके से इससे लड़ने के लिए तैयार हो जाता है। शरीर प्रोटीन बनाता है। वहीं होता है न्यूट्रिलाइजिंग एंटीबॉडी। शरीर यही नहीं रूकता। वह कुछ सेल बना लेता है लेकिन आप स्पोर्ट्स में देखते हैं कि फाइनल मैच से पहले एक बार प्रैक्टिस करके नहीं रूक जाते हैं। दूसरा डोज बूस्टर डोज का काम करता है। वैक्सीन के दो डोज के दो या तीन हफ्ते बाद शरीर में पूरी तरह से एंटी बॉडी बन जाते हैं। उसके बाद जब वायरस में सही में शरीर के अंदर आते हैं तो शरीर का इम्युन सिस्टम उसे तुरंत पहचान लेता है।

सवाल: आने वाले समय में क्या तीसरे डोज की जरूरत पड़ सकती है?

जवाब: जब वायरस अपना आंकड़ा बढ़ाते हैं तो उसमें कुछ बदलाव देखने को मिलता है। अब तक के शोध में यह पाया गया है कि कोवैक्सीन हो या कोविशील्ड हो या स्पुतनिक हो, ये सब कामयाब रहेंगे। ये अभी तक के उपलब्ध के आंकड़े पर आधारित हैं। 

सवाल: कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं, जिसमें दोनों डोज लगवाने के बाद भी लोगों की मौत हुई है। हालांकि, यह तादाद बहुत कम है लेकिन अगर ऐसा है तो इसकी क्या वजह हो सकती है?

जवाब: ये वैक्सीन बीमारी के प्रभाव को कम करती है। इस वैक्सीन से यही उम्मीद है कि यह लक्षण और मौत को टालेगी। जिन लोगों की डेथ हुई है, इस पर वैज्ञानिक विश्लेषण करना चाहिए। लेकिन इस वजह से हम वैक्सीन से पीछे रहे ये गलत होगा। 

सवाल: AstraZeneca वैक्सीन से खून में थक्का जमने की भी कुछ शिकायतें आई थीं, ब्रिटेन में या अन्य देशों में। क्या कोविशील्ड से जुड़ा ऐसा कोई केस पाया गया है?  

जवाब: इस बारे में हमें रिपोर्ट मिली है। भारत में कोविशील्ड से ऐसा कोई खतरा वाला सवाल पैदा नहीं देखने को मिला है। ऐसे में अपनी बारी आने पर वैक्सीन लगवाना चाहिए।

सवाल: मधुमेह, दमा, गुर्दे की किसी बीमारी या हृदय रोग से पीड़ित मरीजों को वैक्सीन लगवाना चाहिए या उन्हें अब रूकना चाहिए?

जवाब: इन बीमारियों को हम कोमॉर्बिडिटीज कहते हैं। इसका मतलब ये है कि किसी व्यक्ति को कोई बीमारी है उसके साथ कोविड-19 संक्रमण हो जाता है। नेचुरल हिस्ट्री ऑफ द डिजीज साफ तौर पर इस बात की ओर इशारा करता है कि किसी को अगर पहले से गुर्दे की कोई बीमारी है, रक्तचाप है या शुगर है तो उन लोगों को कोविड-19 से ज्यादा खतरा है। उन लोगों में कॉम्पलिकेशन का खतरा ज्यादा रहता है। इसीलिए इन्हें वैक्सीनेशन की शुरुआत में ही वैक्सीन देने के लिए चुना गया। अगर आपको इनमें से कोई बीमारी है तो आपको वैक्सीन लेने से पहले अपने फिजिशियन से यह जानकारी जरूर लेनी चाहिए कि वैक्सीनेशन से पहले या उसके बाद कौन सी दवा छोड़नी है और किस दवा को फिर से शुरू करना है।

सवाल: किसी ने कोविशील्ड की पहली डोज ले ली तो क्या वह दूसरी डोज कोवैक्सीन की ले सकता है या फिर इसका उल्टा कर सकता है? क्या ऐसा करना स्वास्थ्य के लिए ठीक रहेगा नहीं?

जवाब: इस चीज को लेकर अब तक शोध नहीं हुई है कि अलग-अलग वैक्सीन की अलग-अलग डोज ली जा सकती है या नहीं। अगर आप पहला डोज कोवैक्सीन ले रहे हैं तो दूसरा डोज भी कोवैक्सीन की लीजिए और अगर पहला डोज कोविशील्ड की लेते हैं तो दूसरा डोज भी कोविशील्ड की लीजिए।

सवाल: क्या वायरस समय के साथ वैक्सीन रेजिस्टेंट हो जाते हैं। अगर हां तो आने वाले समय में हम इससे कैसे लड़ेंगे?

जवाब: वायरस जब अपना आंकड़ा बढ़ाते हैं तो उसमें कुछ बदलाव आ जाते हैं तो वे वैक्सीन को एस्केप कर सकते हैं। उसी टाइम हम अपने वैक्सीन को चेंज कर सकते हैं। इसके लिए वार्षिक फ्लू टीका का उदाहरण ले सकते हैं। ये एक ही जैसा नहीं होता है। उसमें हम लोग बदलाव कर लेते हैं। इसलिए हम टीके में बदलाव कर लेते हैं। जिस तरह साइंस एडवांस स्टेज पर पहुंच गया है। ऐसा करना मुश्किल नहीं है।

सवाल: अगर किसी ने एक वैक्सीन के दोनों डोज ले लिए हैं और ये सोच लिया कि इसका असर पांच-छह महीने ही रहेंगे। उसके बाद फिर कोई और वैक्सीन लेने की सोचे तो क्या ऐसा किया जा सकता है या ऐसा करना खतरनाक साबित हो सकता है? क्या हमें ऐसा करना चाहिए?

जवाब: हमें खुद ऐसे निर्णय नहीं करनी चाहिए क्योंकि दो डोज के बाद इम्युन मेमोरी बन जाता है। इम्युन मेमोरी एक साल तक रहेगा। इसके बीच आपको देखने को मिलेगा कि वायरस ही नहीं है और वैक्सीन लगवा रहे हैं। ऐसा किसके लिए? ऐसा मत कीजिए। ये सब नहीं करना चाहिए। वैज्ञानिक शोध से जो बात सामने आती है, उसे ही फॉलो कीजिए।

सवाल: 18 साल से कम उम्र के लोगों के लिए वैक्सीन आने में कितना समय लग सकता है?

जवाब: ट्रायल चल रहा है। क्योंकि 18 साल से नीचे के लोग एडल्ट नहीं है तो हम यह जानकारी जुटा रहे हैं कि उनके शरीर पर वैक्सीन का क्या असर होता है। इसकी वजह है कि हमें सबसे पहले सेफ्टी सुनिश्चित करना होगा। 

सवाल: डबल म्यूटेंट क्या है? ऐसे कुछ मामले पाए गए हैं, जहां लोगों को बाहर से बहुत कम कॉन्टैक्ट हुआ है। इसके बावजूद वे संक्रमित हो गए हैं तो क्या यह इतना शक्तिशाली है? लोग इससे कैसे बच सकते हैं?

जवाब: म्यूटेंट वायरस का परिवर्तित रूप है। डबल म्यूटेंट जल्द-से-जल्द फैल सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह ज्यादा खतरनाक साबित होगा। हालांकि, वह खतरनाक रूप अख्तियार कर सकता है लेकिन ऐसा अब तक नहीं हुआ है। तो इसीलिए मैं यह कहना चाहूंगा कि पुराना म्यूटेंट या फिर डबल म्यूटेंट फैलता एक ही तरीके से है। अगर कोई बाहर जाता है लेकिन किसी तरह की ढिलाई बरतता है। फेस मास्क को ठीक ढंग से पहनना जरूरी है। फेस मास्क को अच्छे तरीके से पहनकर इससे बचा सकता है।

सवाल: अभी ब्लैक फंगस के भी मामले हैं। इसकी वजह क्या हो सकती है और इससे कैसे बचा जा सकता है?जवाब: भारत में बहुत सारे राज्यों में ऐसा पाया गया है। कोविड-19 से ठीक हो चुके लोगों के नाक से ब्लैक फंगस या खून का निकलना पाया गया है। ब्लैक फंगस से म्युकोरमाइकोशिश नामक बीमारी होती है। यह एक तरह का फंगल इंफेक्शन है। अगर हम कोई ऐसी दवाई लेते हैं (जैसे स्टेरॉयड्स), जिससे हमारी इम्युनिटी कमजोर हो जाती है तो उससे ये फैल जाता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लोग सोशल मीडिया से लोग ये सीख लेते हैं कि हमें स्टेरॉयड्स इस्तेमाल करना चाहिए। हम दुकान जाकर बिना प्रिस्क्रिप्शन के लिए स्टेरॉयड ले लेते हैं। देखिए, बहुत जल्दी या बहुत ज्यादा स्टेरॉयड लेने या लंबे समय तक स्टेरॉयड लेने से दिक्कत आती है। देखिए, कभी-कभी स्टेरॉयड की जरूरत पड़ती है लेकिन डॉक्टर की सलाह पर ही स्टेरॉयड लेना चाहिए। इसी तरह अगर किसी को डायबिटीज है तो कई बार ऐसा देखा गया है कि कोविड-19 होने पर वह शुगर की दवा लेना छोड़ देते हैं तो दिक्कत हो जाती है। इस वजह से कई बार पर्यावरण में रहने वाले फंगस हमारे अंदर चले जाते हैं। इसलिए तमाम तरीके की सावधानी बरतना जरूरी। 

सवाल: क्या हम पहले की तरह जिंदगी जी पाएंगे? 

जवाब: जरूर, लेकिन ये दो चीज पर निर्भर है। यह केवल वायरस पर निर्भर नहीं है। वायरस म्यूटेट करते हैं। कुछ-कुछ म्यूटेंट जल्द फैल जाते हैं। ये वायरस के व्यवहार हैं। लेकिन हमारे व्यवहार में अगर हम बदलाव नहीं करते हैं और ढिलाई बरतते हैं तो ये जंग हम नहीं जीत पाएंगे। मैं ये कहना चाहूंगा कि हम तीसरी लहर को टाल सकते हैं लेकिन वैक्सीनेशन के साथ-साथ कोविड प्रोटोकॉल के पालन के जरिए हम यह लड़ाई जीत सकते हैं।

सवाल: डबल म्यूटेंट, वैक्सीन और वैक्सीनेशन के साइड इफेक्ट को लेकर कई तरह के फेक न्यूज भी वायरल होते रहते हैं, इससे लोग कैसे बच सकते हैं?

जवाब: मैं कहना चाहूंगा कि सोशल मीडिया पर जो जानकारी आपको मिल रही है, उसकी एक बार छानबीन जरूर करें। इसके अलावा आइसीएमआर या मंत्रालय की ओर से कही जारी बातों पर गौर करें या इनकी वेबसाइट पर दी गई जानकारी को ही फॉलो करें। आप ऑथेंटिक वेबसाइट से ही जानकारी लीजिए। गलत सूचना से गलतफहमियां फैलती हैं। इसीलिए विश्वसनीय स्रोत से जानकारी लेना जरूरी है। 

कोरोना वायरस वैक्सीन के ऊपर आप पूरी चर्चा यहां देख सकते हैं:

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